लेखक-अरविंद जयतिलक
चीन अपनी नापाक हरकतों से बाज आने को तैयार नहीं है। उसने जिस तरह शंघाई एयरपोर्ट पर भारत नागरिक पेमा वांग थोंगडोक से बदसलूकी करते हुए उनके पासपोर्ट को इनवैलिड की और प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन ने भारत द्वारा अवैध रुप से स्थापित तथाकथित अरुणाचल प्रदेश को कभी मान्यता नहीं दी है, बेहद आपत्तिजनक और रिश्तों में खटास पैदा करने वाला है। यह उचित है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मसले पर कड़ा रुख अपनाते हुए चीन को दो टूक सुना दिया है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। विचार करें तो यह पहली बार नहीं है जब चीन ने अरुणाचल के मसले पर वितंडा खड़ा करने की कोशिश की है। याद होगा कि पिछले वर्ष उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अरुणाचल दौरे के दौरान सेला टनल की शुरुआत पर ऐतराज जताया था। तब भी विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उसके कुतर्क को बेतुका और हास्यादपद् बताते हुए उसे आईना दिखा दिया था और कहा था कि अरुणाचल भारत का एक स्वाभाविक हिस्सा है। बहरहाल चीन की कुटिल मंशा से साफ है कि वह भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाना नहीं चाहता है। उसके इस असंवेदनशील रुख के कारण ही 1976 से चला आ रहा सीमा विवाद किसी तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंच सका है और टकराव होता रहा है। वह मैकमोहन रेखा को भी स्वीकारने को तैयार नहीं है। जबकि ब्रिटिश भारत और तिब्बत ने 1913 में शिमला समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रुप में मैकमोहन रेखा का निर्धारण किया था। गौर करें तो इस सीमा रेखा का निर्धारण हिमालय के सर्वोच्च शिखर तक जाता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी की वास्तविक स्थिति भी कमोवेश यही है। इस क्षेत्र में हिमालय प्राकृतिक सीमा का निर्धारण नहीं करता क्योंकि यहां से अनेक नदियां निकलती और सीमाओं को काटती हैं।
वर्तमान स्थिति यह है कि दोनों देश एलएसी पर निगरानी कर रहे हैं। ऐतिहासिक संदर्भों में जाए तो तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमाओं का ठीक से रेखांकन नहीं होने से अक्टुबर, 1913 में शिमला में अंग्रेजी सरकार की देखरेख में चारो देशों के अधिकारियों की बैठक हुई। इस बैठक में तिब्बती प्रतिनिधि ने स्वतंत्र देश के रुप में प्रतिनिधित्व किया और भारत की अंग्रेजी सरकार ने उसे उसी रुप में मान्यता दिया। आधुनिक देश के रुप में भारत के पूर्वोत्तर हिस्से की सीमाएं रेखांकित न होने के कारण दिसंबर 1913 में दूसरी बैठक शिमला में हुई और अंग्रेज प्रतिनिधि जनरल मैक मोहन ने तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमा को रेखांकित किया। आज के अरुणाचल का तवांग क्षेत्र मैकमोहन द्वारा खींची गयी रेखा के दक्षिण में होता था। इसलिए तिब्बती सरकार बार-बार उसपर अपना दावा करती रही। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकारने से उत्तर से पूर्वोत्तर तक कहीं भी भारत और चीन की सीमा नहीं मिलती थी। इस तरह उत्तरी-पूर्वी सीमा को एक प्राकृतिक सुरक्षा मिली हुई थी। लेकिन स्वतंत्र भारत की नेहरु सरकार की अदूरदर्शी नीति ने स्वतंत्र तिब्बत को बलिदान हो जाने दिया। पीकिंग पर साम्यवादियों का कब्जा होने के उपरांत 23 मई, 1951 को तिब्बत के दलाई लामा सरकार के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के अधिकारियों के बीच 17 सूत्रीय कार्यक्रम पर समझौता हुआ। इस समझौते को दलाई लामा तिब्बत के स्वतंत्र अस्तित्व की समाप्ति के रुप में देखते हुए भारत से रक्षा की गुहार लगायी। लेकिन तत्कालीन नेहरु सरकार पर चीन के साथ दोस्ती का भूत सवार था। नेहरु सरकार ने अंग्रेजी दस्तावेजों का हवाला देकर तिब्बत पर चीन की अधिनस्थता की बात स्वीकार ली। नतीजा माओ के रेडगार्डों ने तिब्बत पर चढ़ाई कर एक वर्ष के अंदर पूरे तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। आज की तारीख में सिक्किम-तिब्बत सीमा को छोड़कर लगभग पूरी भारत-चीन सीमा विवादित है। भारत और चीन के बीच विवाद की वजह अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश की संप्रभुता भी है। पश्चिमी सेक्टर में अक्साई चिन का लगभग 3800 वर्ग किमी भू-भाग चीन के कब्जे में है।
अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व में विशाल निर्जन इलाका है। इस क्षेत्र पर भारत का अपना दावा है। लेकिन नियंत्रण चीन का है। दूसरी ओर पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी पर अपना दावा कर उसे अपना मानता है। अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भारतीय सांसद को वीजा नहीं देता है। भारत की मनाही के बावजूद भी वह कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी करता रहा है। साथ ही पाकिस्तान से गलबहियां कर वह भारतीय संप्रभुता को भी चुनौती भी परोसता है। गुलाम कश्मीर में सामरिक रुप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र पर वह अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। यहां तकरीबन हजारों चीनी सैनिकों की मौजूदगी बराबर बनी रहती है। वह इन क्षेत्रों में निर्बाध रुप से हाईस्पीड सड़कें और रेल संपर्कों का जाल बिछा रहा है। सिर्फ इसलिए की भारत तक उसकी पहुंच आसान हो सके। दरअसल चीन की मंशा अरबों रुपये खर्च करके कराकोरम पहाड़ को दो फाड़ करते हुए गवादर के बंदरगाह तक अपनी रेल पहुंच बनानी है ताकि युद्धकाल में जरुरत पड़ने पर वह अपने सैनिकों तक आसानी से रसद पहुंचा सके। वह नेपाल, बंगलादेश और म्यांमार में भी अपना दखल बढ़ा रहा है। वह श्रीलंका में बंदरगाह बना रहा है जो भारतीय सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है। अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार श्रीलंका को साधकर चीन के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया है। तथ्य यह भी कि चीन अफगानिस्तान में अरबों डालर का निवेश कर तांबे की खदानें चला रहा है। फिलहाल अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार है और उसके भारत से रिश्ते मजबूत हैं। भारत अफगानिस्तान के विकास के लिए कई परियोजनाओं के साथ ढ़ेर सारे मानवीय कार्यक्रम चला रहा है। इस कारण अब चीन अलग-थलग पड़़ता जा रहा है। चीन म्यांमार की गैस संसाधनों पर भी कब्जा करने की फिराक में है। पर अच्छी बात है कि म्यांमार भारत के साथ है। उचित होगा कि भारत चीन पर दबाव बनाने के लिए अब तिब्बत के मसले पर अपना रुख कड़ा करे।
तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व ही भारत की सीमाओं की रक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। अगर भारत तिब्बत की स्वतंत्रता और मानवाधिकार हनन के मसले को अन्तरराष्ट्रीय कुटनीति की तीव्र आंच पर रखता है तो सच मानिए चीन की पेशानी पर बल पड़ना तय है। तिब्बत की स्वतंत्रता चीन की कमजोर नस है और भारत इसे मानवाधिकार हनन का नश्तर बनाकर चीन की हेंकड़ी का सफल ऑपरेशन कर सकता है। चीन सामरिक रुप से अहम पैंगोंग त्सो झील के निकट एक और नए पुल का निर्माण करने की फिराक में है। उसकी मंशा इस पुल के जरिए अपने सामरिक हथियारों को आसानी से भारतीय सीमा तक पहुंचाना है। इसका खुलासा सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों से हो चुकी है। चीन की यह साजिश भारत के लिए चिंता का शबब इसलिए है कि यह नया पुल वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से महज 20 किलोमीटर दूर है।
गौरतलब है कि चीन पहले ही पैंगोंग झील पर एक पुल का निर्माण कर चुका है। चीन की बढ़ती आक्रामकता और दुस्साहस को देखते हुए अब उचित होगा कि भारत भी चीन के साथ पूर्व की किसी स्वीकारोक्ति से बंधा न रहे। इसलिए कि चीन जम्मू-कश्मीर और अरुणांचल प्रदेश दोनों पर अपनी कुदृष्टि गड़ाए है। याद होगा गत वर्ष पहले उसने प्रस्ताव रखा था कि भारत अगर अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके को उसे सौंप देता है तो वह बदले में अक्साई चीन का इलाका दे सकता है। लेकिन भारत ने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। जम्मू-कश्मीर में उसकी दुस्साहसपूर्ण गतिविधियां इसलिए चिंता पैदा करने वाली है कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का आंगन उसके लिए खोल दिया है। उसी का नतीजा है कि इस्लामाबाद से चीन के उरुमची तक आवागमन तेज हो गया है। उचित होगा कि अब भारत बीजिंग-इस्लामाबाद के नापाक गठजोड़ का मुंहतोड़ जवाब दे। इसलिए भी कि आज दुनिया भारत के साथ है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




