लेखक~मुकेश सेठ
♂÷कुछ शताब्दियों पूर्व के इतिहास के पृष्ठों को पलटें तो दिलचस्प व गहन ज्ञान का स्मृतिकोष मस्तिष्क में बनता है।इस्लाम मज़हब की जन्मभूमि
आज के सऊदी अरब की कहानी एक कॉफी हाउस से शुरू होती है।
यह वाक्य तो खैर ध्यान खींचने के लिए लिखा है, मगर इसकी कुछ पृष्ठभूमि भी है। हमने फ़्रांसीसी क्रांति से लेकर रूसी क्रांति तक ऐसे बैठक केंद्रों की भूमिका देखी है, जहाँ बैठ लोग गुफ़्तगू करते, विमर्श करते थे।
गुफ़्तगू शब्द फ़ारसी के गुफ़्तार से उपजा है, जिसका अर्थ संवाद या वार्तालाप से है।
सोलहवीं सदी के इस्तांबुल में ऐसे कहवा-ख़ाना (कॉफी हाउस) खुलने शुरू हुए जहाँ लोग मस्जिद से निकल कर जमा हो जाते। यहाँ उन दिनों कॉफी के साथ तंबाकू का सेवन आम था। यह तंबाकू लाने का श्रेय यूरोपियनों को ही जाता था और बाद में तुर्की के लोग खुद उगाने लगे थे।
आज भी तुर्की जो कि अब तुर्किये के नाम से जाना जाने लगा है कि लोग सिगरेट फूँकते बहुधा मिल जाएँगे, और इस मामले में यह अनूठा इस्लाम बहुल मुल्क कहा जा सकता है। हालाँकि इन पंक्तियों के लिखते समय जो राष्ट्रपति एर्दोगान हैं, उन्होंने कई बार अपील की है कि इस्लाम में तंबाकू हराम है। मगर सदियों से वहाँ की हवा में फैला तम्बाकू का धुआँ भला एक पल में कैसे छँट जाए।
16 सितंबर 1633 को मिलाद-उन-नबी के मौके पर सुल्तान अहमद मस्जिद (Blue mosque) में एक-एक कर दो मौलवियों ने ख़ुत्बा पढ़े। पहले आए सिवासी अफ़ंदी। उन्होंने इस्लाम में तरीक़त (सूफ़ीवाद) के महत्व को समझाया, और इस बात पर बल दिया कि जीवन-शैली अगर भटकी हुई भी हो, तो तरीक़त उसे रास्ते पर ला सकती है। यह एक उदारवादी नज़रिया था जिसके अनुसार बिना नमाज़ पढ़े, बिना खान-पान या पहनावे में बड़ा बदलाव किए भी कोई मज़हब का पालन कर सकता था।
उनके ठीक बाद एक अन्य मौलवी ने ख़ुत्बा पढ़ना शुरू किया। उन्होंने कहा कि इस्लाम भटकता जा रहा है। जो क़ायदे बताए गए थे, उनका अनुसरण नहीं किया जा रहा। काफ़िर यूरोपीय प्रभाव में आकर लोग तंबाकू फूँक रहे हैं। लोग व्यभिचारी हो रहे हैं। इसका हल यह अहले तरीक़त नहीं, बल्कि अहले शरियत है। इस सल्तनत को एक मज़हबी क़ायदे से चलने की ज़रूरत है, अन्यथा बहुत जल्द यह फ़िरंगी (ईसाई) हाथों में जा सकता है। इन मौलवी का नाम था- कादिज़ादे मुहम्मद।
यह एक रूढ़िवादी-प्रगतिवादी का शाश्वत विवाद दिखता है, जो पूरी दुनिया में कमोबेश है। मुझे एक पाकिस्तानी फ़िल्म याद आती है- ‘ख़ुदा के लिए’ (2007)। इसके आखिरी अंश में दो मौलवी कुछ इसी तरह का विवाद करते हैं, जिनमें एक कहते हैं कि इस्लाम में मूसीक़ी (music) हराम है, और दूसरे इसे तर्क सहित काटते हैं। इन दूसरे मौलवी का किरदार नसीरुद्दीन शाह ने निभाया था।
खैर, सत्रहवीं सदी के मस्जिद में हुए उस वाद-विवाद के बाद जनता हमेशा की तरह कहवा-ख़ाने की तरफ़ निकली। वहाँ कॉफ़ी और तंबाकू पर चर्चाएँ होने लगी कि क्या सही है? अहले शरियत या अहले तरीक़त? क्या कादिजादे साहब का अंदेशा ठीक है? क्या हम इस्लाम से भटक रहे हैं? क्या उनके बताए तरीक़े से हमारी आज़ादी और मसलन यह कहवा-ख़ाना न छिन जाएँगे?
इन विमर्शों के बाद दो गुट बँटने लगे। पहले जो सूफ़ियाना जीवन और दर्विशों में भरोसा रखते थे। वह सुलभ भी था, और उन्मुक्त भी। दूसरे वे जो कादिजादेली कहलाए, और उन्होंने शरियत से चलने का निर्णय लिया। उस समय के सुल्तान मुराद चौथे (Murad IV) के लिए भी अहले-शरिया ज़्यादा मुफ़ीद था। उन्हें लगता था कि इस तरीके से न सिर्फ़ विदेशियों से लड़ना आसान होगा, बल्कि साम्राज्य के अंदर भी अनुशासन आएगा।
अनुशासन जल्द ले भी आया गया। मिस्र और मदीना को छोड़ कर बाकी के साम्राज्य के कहवा-ख़ाना पर पाबंदी लग गयी। एक व्यक्ति ने जब मुराद के अतिवाद का विरोध किया, तो उसके हाथ बाँध कर सार्वजनिक रूप से मारने की सजा दी गयी। यह चीजें इस्तांबुल के लिए नयी थी, जहाँ शरियत पहले नहीं रही थी। इसका विरोध तुर्की के अनेक अफ़ंदी (विशिष्ट व्यक्ति/Lords) ने भी किया। नतीजतन कहवा-ख़ाने खुल गये, तंबाकू फूँके जाने लगे, दर्विश क़ायम रहे, जनजीवन पहले की तरह ही रहा।
मगर जब धुआँ उठता है तो आग पूरी तरह बुझती कहाँ है।
अगली सदी में इस्तांबुल से कहीं दूर अरब के रेगिस्तान में दो लोग मिले। एक का नाम था मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब। दूसरे थे मुहम्मद बिन सऊद।
इन दोनों महानुभाव लोगों के विचार,आचरण, व्यवहार व तहज़ीब नें सऊदी अरब समेत समस्त इस्लामी जगत को बहुत ही प्रभावित किया।

÷लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं÷




