लेखक: डॉक्टर राजीव मिश्र
गलगोटिया मामले में मुझे एक बात कहनी है जिसका संबंध इस मामले से उतना नहीं है जितना इस प्रश्न से है कि समाज में सरकार की क्या भूमिका लेजिटिमेट है।
लोग कह रहे हैं कि सरकार को पहले इस समिट में आने वाले सभी प्रतिभागियों की जाँच कर लेनी चाहिए थी।
यहाँ पर एक विसंगति की ओर इशारा करना चाहूंगा – पब्लिक के माइंड में सरकार की छवि एक सर्व शक्तिमान सर्वज्ञानी ऑथोरिटी की तरह है जो कुछ भी कर सकती है पर सरकार अपने आप में कुछ भी नहीं है।सरकार जो कुछ भी करती है, वह कोई व्यक्ति करता है एक व्यक्ति एक नियम बनाता है, एक व्यक्ति एक निर्णय लेता है।
हर निर्णय हमेशा नॉलेज डिपेंडेंट होता है, और हर निर्णय के पीछे certain amount of knowledge होता है. नॉलेज एक कॉस्टलेस चीज नहीं होती है।जितना अधिक महत्व का निर्णय होता है उसके पीछे उतना अधिक नॉलेज होता है और उसका उतना अधिक कॉस्ट होता है। जब तक निर्णय का महत्व उस नॉलेज के कॉस्ट से अधिक होता है तब तक उतना अधिक कॉस्ट जस्टिफाइड है।
यदि निर्णय एक युद्ध शुरू करने का है, या न्यूक्लियर हथियारों के प्रयोग का है तो इस निर्णय के पीछे कितना बड़ा भी नॉलेज कॉस्ट हो, वह जस्टिफाइड है लेकिन एक टेक्नोलॉजी समिट में एक यूनिवर्सिटी के पार्टिसिपेशन के निर्णय के पीछे आप कितना नॉलेज इन्वेस्ट करना चाहेंगे। लोगों का कहना है कि सरकार को एक सिलेक्शन प्रॉसेस रखना चाहिए था कि कौन कौन क्या प्रदर्शित कर रहा है पर यह निर्णय कौन लेगा!
निर्णय सरकारें नहीं लेती, निर्णय एक व्यक्ति लेता है परिणाम यह होगा कि एक टेक्नोलॉजी समिट पर निर्णय लेने का काम एक IAS करेगा जिसकी स्पेशलिटी शायद एंथ्रोपोलॉजी या साइकोलॉजी होगी, लेकिन सामान्य धारणा है कि गवर्नमेंट एक सर्व शक्तिमान संस्था है। “गवर्नमेंट चाहे तो क्या नहीं कर सकती”तो गवर्नमेंट इंजीनियर्स की एक फौज बना सकती है जो उसके लिए यह निर्णय लें कि कौन सी संस्था इस समिट में क्या प्रदर्शित करेगी और इंजीनियर्स की एक और फौज बैठ कर यह डिसाइड करेगी कि किन पैरामीटर्स पर यह डिसीजन लिया जाएगा।
ये इंजिनियर्स AI पर काम करने वाले दूसरे इंजिनियर्स का काम जज करेंगे और आप अपेक्षा करेंगे कि ये स्वयं AI में कुशल होंगे तो ये इंजिनियर्स खुद ही क्यों नहीं AI प्रोजेक्ट्स बना लेते। अगर गवर्नमेंट इतने सारे कुशल इंजिनियर्स की फौज सिर्फ एक ए आई समिट रखने के लिए बना सकती है तो गवर्नमेंट खुद ही इस बिजनेस में क्यों नहीं उतर आए।
जब हम हर बात में सरकारी कंट्रोल की अपेक्षा रखते हैं तो एक छोटे से इंटरवेंशन की बदौलत सरकार के हस्तक्षेप का दायरा बढ़ता जाता है। सरकार उन कामों को करने उतर आती है जो उसका काम नहीं है और दुनिया में कोई भी काम कॉस्टलेस नहीं होता।
जब सरकार ऐसे काम करने आती है जो उसका काम नहीं है तो बदले में वे काम नहीं करती है जो उसका मूल काम हैं।
एक समाज जिसे हर बात में सरकारी कंट्रोल और इंटरवेंशन की आवश्यकता होती हो वह एक फंक्शनल समाज नहीं हो सकता है।
फिर सरकार एआई का बिजनेस नहीं करती तो सरकार को क्या पड़ी है कि वह ऐसे समिट ऑर्गनाइज करे, जब बिजनेस कंपनियां करती हैं तो प्लेटफॉर्म सरकार क्यों उपलब्ध कराए!
क्योंकि जब कंपनियां बिजनेस करती हैं तो सरकार वसूली करती है, जिससे सरकार का खर्चा चलता है।
सरकार की अपनी गरज है,और बिजनेस करना सबके बस की बात नहीं है।

(लेखक लंदन में चिकित्सक हैं)




