लेखक-अरविंद जयतिलक
(‘करीने से अजब आरास्ता कातिल की महफिल है,
वो किस दावे से कहते हैं हमारा ही तो ये दिल है’)
मशहूर शायर दाग देहलवी का यह शेर उन सियासी दलों के ऐसे सभी तकरीरों और नेक-नियति को बेपर्दा करता है जो लोकसभा में पेश उस विधेयक के खिलाफ हैं जिनमें उल्लिखित है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी मंत्री पर ऐसी धाराओं में आपराधिक मुकदमा दर्ज होता है जिनमें पांच साल या उससे ज्यादा सजा का प्रावधान है तो ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी होने के 31 वें दिन उन्हें अपना पद छोड़ना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो गिरफ्तारी के 31 वें दिन उन्हें पद से हटा दिया जाएगा। मजेदार बात यह कि जो राजनीतिक दल इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं वे सैद्धांतिक तौर पर राजनीति के अपराधीकरण की खिलाफत का दावा तो करते हैं। लेकिन व्यवहारिक तौर पर उनका सच कुछ और ही है। वे किस्म-किस्म के कुतर्कों के जरिए इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह विधेयक भारत के संविधान के खिलाफ है। इससे कानून का दुरुपयोग होगा और केंद्र सरकार जिस मुख्यमंत्री को हटाना चाहेगी उसे गिरफ्तार करके 30 दिनों तक जेल में ठूंस देगी। फिर उन्हें पद से हटना पड़ेगा। यह तर्क हास्याद्पद ही नहीं बल्कि सच के उलट है। हकीकत यह है कि एक ईमानदार नेता को कोई न तो गिरफ्तार कर सकता है और न ही उसकी कुर्सी छिनी जा सकती है। अगर केंद्र सरकार ऐसा करती है तो अदालत का दरवाजा खुला है। गौर करें तो डर उन्हें लग रहा है जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और कुर्सी से चिपके हुए हैं। सच्चाई यह है कि यह विधेयक संवैधानिक पदों पर आसाीन नेताओं के चरित्र और आचरण को संदेह से परे रखेगा और उनके इस्तीफे से जनता का विश्वास जनतंत्र के प्रति मजबूत होगा। वैसे भी देश में मंत्रियों और नेताओं को लेकर बहुत सकारात्मक सोच नहीं है। लेकिन इस विधेयक के पारित होने के बाद जब मंत्री और नेता अपने पद से इस्तीफा देंगे तो उनका कद बढ़ेगा। इस्तीफा न देने पर ही उनकी जगहंसाई होती है। देखा भी गया कि शराब घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पांच महीनों तक दिल्ली की तिहाड़ जेल की शोभा बढ़ाते रहे लेकिन अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया। इससे उनकी छवि को बट्टा लगा और आगामी विधानसभा चुनाव भी हार गए। इसी तरह दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार में शामिल वी सेंथिल बालाजी भी जेल जाने के बावजूद अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया। वी सेंथिल को तो राज्यपाल द्वारा जबरन हटाया गया। उचित होगा कि इस तरह की नौबत न आने पाए और भ्रष्टाचार में शामिल नेता कानून के तहत इस्तीफा देने के लिए बाध्य हों। किसी से छिपा नहीं है कि देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में ऐसे सैकडों लोग चुनकर आए हैं जिनपर गंभीर आरोप हैं। वे मंत्री भी बने हैं। अगर ऐसे लोगों को सजा होती तो फिर उन्हें अपने पद पर बने रहने का क्या अधिकार है। नजर दौड़ाइए तो एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाम्ॅर्स) अपनी रिपोर्ट में खुलासा कर चुका है कि 151 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपने चुनावी हलफनामों में महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामलों की जानकारी दी है। इनमें 16 मौजूदा सांसद और 135 विधायक ऐसे हैं जिन्होंने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत बलात्कार से संबंधित मामलों की जानकारी दी है। ऐसे मामलों में दस साल की सजा का प्रावधान है और इसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। इन माननीयों में भाजपा के 54, कांग्रेस के 23, तेलुगु देशम के 17 सांसद-विधायकों के अलावा कई अन्य दलों के भी माननीयगण शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 25 सांसदों और विधायकों के साथ पश्चिम बंगाल शीर्ष पर है। अर्थात राज्य के तौर पर सर्वाधिक दागी इसी राज्य से हैं। उल्लेखनीय है कि चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर ने 2019 और 2024 के बीच चुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग को सौपें गए मौजूदा सांसदों और विधायकों के 4809 हलफनामों में से 4693 की जांच की जिसमें यह तथ्य सामने आया है। यह बिडंबना देखिए कि दागी जनप्रतिनिधियों को लेकर सर्वोच्च अदालत लगातार चेतावनी दे रहा है, के बावजूद भी संसद और विधानसभाओं में पहंुचने वाले दागी जनप्रतिनिधियों की संख्या कम नही हो रही है। मतलब साफ है कि राजनीतिक दलों का ऐसे लोगों से परहेज नहीं है। यह स्थिति किसी भी संसदीय लोकतंत्र की जीवंतता के लिए खतरनाक है। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने पूर्व और मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ उन लंबित आपराधिक मामलों का निपटारा दो महीने के दरम्यान करने को कहा था जिनके ट्रायल पर रोक लगी हुई थी। तब जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो टूक कहा था कि इस मामले में सुनवाई रोजाना हो और इसे बेवजह न टाला जाए। पीठ ने सभी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को भी ताकीद किया था कि इन निर्देशों के पालन में किसी तरह की बाधा नहीं होनी चाहिए। वे इसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी निपटाएं। अच्छी बात है कि देश की सभी अदालतें ऐसे मामलों में तेजी से सुनवाई करते हुए निर्णय सुना रही हैं। सर्वोच्च अदालत कह चुका है कि भ्रष्टाचार देश का दुश्मन है और संविधान की संरक्षक की हैसियत से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री नहीं चुनेंगे। लेकिन विडंबना है कि अदालत के इस नसीहत का सियासी दलों पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा। इसका प्रमुख कारण है कि सर्वोच्च अदालत ने दागी सांसदों और विधायकों को मंत्री पद के अयोग्य मानने में सीधे हस्तक्षेप के बजाए इसकी नैतिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ दिया है। याद होगा गत वर्ष पहले जब सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के जरिए दोषी सांसदों व विधायकों की सदस्यता समाप्त करने और जेल से चुनाव लड़ने पर रोक लगायी तो राजनीतिक दलों ने किस तरह बखेडा खड़ा किया था। सर्वोच्च अदालत ने राजनीति में आपराधीकरण को रोकने के लिए आदेश दिया था कि उम्मीदवार कम से कम तीन बार अखबार और टीवी चैनल में प्रचार कर अपनी अपराधिक पृष्ठभूमि को सामने लाएं। न्यायालय के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने इस बारे में एक अधिसूचना भी जारी की। लेकिन इस पहल के बावजूद भी राजनीति का अपराधीकरण नहीं रुका है। दरअसल राजनीतिक दलों को विश्वास हो चुका है कि जो जितना बड़ा दागी है उसके चुनाव जीतने की उतनी ही बड़ी गारंटी है। पिछले कुछ दशक में इस राजनीतिक मनोवृत्ति को जबरदस्त बढ़ावा मिला है। लेकिन विचार करें तो इस स्थिति के लिए सिर्फ राजनीतिक दल और उनके नियंता ही जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि इसके लिए देश की जनता भी बराबर की गुनाहगार है। जब देश की जनता ही साफ-सुथरे प्रतिनिधियों को चुनने के बजाए जाति-पांति और मजहब के आधार पर बाहुबलियों और दागियों को चुनेगी तो स्वाभाविक रुप से राजनीतिक दल उन्हें टिकट देंगे ही। नागरिक और मतदाता होने के नाते जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह ईमानदार, चरित्रवान, विवेकशील और कर्मठ उम्मीदवारों को अपना जनप्रतिनिधि चुने। यह तर्क देना उचित नहीं कि कोई भी दल साफ-सुथरे लोगों को चुनावी मैदान में नहीं उतारता है इसलिए दागियों को चुनना हमारी मजबूरी है। यह एक खतरनाक और शुतुर्गमुर्गी सोच है। देश की जनता को समझना होगा कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था में नेताओं के आचरण का बदलते रहना स्वाभावगत प्रक्रिया है। देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तरक्की के लिए जितनी सत्यनिष्ठा व समर्पण राजनेताओं की होनी चाहिए उतना ही जनता की भी है। उचित होगा कि देश के विपक्षी दल संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक का अनावश्यक विरोध कर जेल से संसद और सरकार चलाने की कुत्सित मानसिकता का समर्थन न करें।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)