लेखक-ओ.पी. पाल
भारत की प्रगति का पहिया अब केवल पुरुष प्रधान नीति-निर्माण पर नहीं, बल्कि महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और उनके नेतृत्व पर टिका है। आज देश के छोटे गाँवों से लेकर महानगरों तक, महिलाएं न केवल अपनी किस्मत बदल रही हैं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को एक नई दिशा दे रही हैं। यह बदलाव महज कागजी नहीं है, बल्कि यह खेतों में चलती मशीनों, कार्यालयों में होते फैसलों और स्थानीय पंचायतों में गूँजती आवाजों में साफ झलकता है। आज के समय में न्याय की सुलभता ने महिलाओं को अपनी बात रखने की हिम्मत दी है। कानूनी सुधारों और नीति-निर्माण में बढ़ते प्रतिनिधित्व ने उन्हें एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जिससे वे आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में बिना किसी डर के अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं। हर वर्ष 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में वर्ष 2026 की ‘अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तिकरण के लिए वास्तविक कार्रवाई’ पर केंद्रित है। भारत जैसे-जैसे अपनी विकास यात्रा पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसमें स्पष्ट है कि महिलाओं को अब केवल ‘भागीदार’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘निर्णायक’ के रूप में देखा जा रहा है। परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। अधिकार और न्याय के साथ की गई ‘वास्तविक कार्रवाई’ ही वह बीज है, जो आने वाले समय में एक सशक्त और समृद्ध भारत का वृक्ष तैयार करेगा।
भारत में महिलाओं को लेकर आज कहानी बदल चुकी है। अब हम ‘महिलाओं के विकास’ से आगे बढ़कर ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ के युग में प्रवेश कर चुके हैं। स्वयं सहायता समूह और स्थानीय शासन के तहत आज देश में करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं। इस पहल में भविष्य की कृषि क्षेत्र में 1,261 करोड़ के बजट के साथ 15,000 स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन संचालन के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। देश में 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवार अब 90.90 लाख स्वयं सहायता समूहों का हिस्सा हैं। इन समूहों ने 12.18 लाख करोड़ रुपये के संस्थागत ऋण तक पहुँच बनाई है, जो ग्रामीण उद्यमशीलता में एक क्रांति है। देश में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं अब प्रति वर्ष कम से कम एक लाख रुपये कमाने के लक्ष्य (लखपति दीदी) की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक तकनीक के ‘इकोसिस्टम’ का हिस्सा बना रही है। यह केवल पैसे बचाने का जरिया नहीं, बल्कि उद्यमशीलता का एक बड़ा मंच बन चुका है। यही नहीं आधुनिक तकनीक के तहत डिजिटल बैंकिंग से लेकर आधुनिक कृषि यंत्रों तक, महिलाओं की पहुँच ने उन्हें पारंपरिक बंधनों से मुक्त किया है और औपचारिक वित्तीय प्रणालियों और मुद्रा ऋण जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों के लिए सफलता के नए द्वार खोले हैं।
भविष्य की दिशा तय करती महिलाएं
तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र यानी क्लासरूम से लेकर प्रयोगशालाओं और स्पेस मिशन तक, भारतीय महिलाएं आज भविष्य की दिशा तय कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 केवल अतीत के संघर्षों को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह उस गहरे बदलाव को पहचानने का अवसर है जो हमारे समाज में आ चुका है। आज महिलाएं खेतों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक भारत की विकास यात्रा को नया आकार दे रही हैं। आज महिलाएं खेतों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक भारत की विकास यात्रा को नया आकार दे रही हैं। यह ‘वास्तविक कार्रवाई’ ही एक ऐसे समाज का निर्माण करेगी जो समावेशी, न्यायपूर्ण और सशक्त होगा। नतीजन परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। भारत की विकास यात्रा अब केवल विकास दर (जीडीपी) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर टिकी है कि महिलाएं कितनी सशक्त हैं। निर्णय लेने की शक्ति से लेकर ड्रोन उड़ाने तक, भारतीय महिलाएं आज न केवल अपनी प्रगति लिख रही हैं, बल्कि एक विकसित और समावेशी भारत की दिशा भी तय कर रही हैं।
राजनैतिक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी
देश में आज राजनैतिक दृष्टि से भी महिलाएं उड़ान भर रही हैं। भारत के पंचायती राज संस्थानों में लगभग 50 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएं हैं। स्थानीय शासन स्तर पर बड़ी संख्या में महिलाएं अब निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में स्थानीय निकायों का संचालन कर रही हैं। महिला नेताओं ने शासन के एजेंडे को स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे बुनियादी मुद्दों की ओर मोड़ा है, जिससे समुदायों का समग्र विकास हो रहा है। भारत ने अपनी आजादी के पहले दिन से ही महिलाओं को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया था। यह उस समय की एक साहसिक वैश्विक मिसाल थी, क्योंकि तब दुनिया के कई विकसित राष्ट्र भी महिलाओं को वोट देने के अधिकार पर हिचकिचा रहे थे। इस संवैधानिक दूरदर्शिता ने भारतीय महिलाओं को गणतंत्र की शुरुआत से ही एक ‘निर्णायक’ की भूमिका में रखा।
शिक्षा बनी सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी
शिक्षा के क्षेत्र में आए बदलावों ने सशक्तिकरण की एक मजबूत नींव तैयार की है। सरकार की विभिन्न पहलों के परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन 2014-15 के 1.57 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 2.18 करोड़ हो गया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों में यूजीसी, नेट, जेआरएफ शोधार्थियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत को पार कर गई है। यह दर्शाता है कि आधुनिक अनुसंधान और नवाचार की बागडोर अब महिलाओं के हाथों में है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की पहल वंचित समुदायों की लड़कियों के लिए शिक्षा के द्वार खोल रही है, जिससे सामाजिक असमानता की खाई कम हो रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा तक उनकी समान पहुँच ने ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ को वास्तविकता में बदल दिया है।
आर्थिक और सामाजिक विकास की धुरी
भारत में 1990 के दशक के बाद से भारत की नीतियों में एक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ आया है। आज महिलाओं को केवल सुरक्षा या कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें आर्थिक और सामाजिक विकास के मुख्य स्टेकहोल्डर के रूप में पहचाना जाता है। एक महिला का स्वास्थ्य पूरे परिवार की खुशहाली का केंद्र माना गया है। भारत सरकार ने ‘मातृ स्वास्थ्य’ को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 4.26 करोड़ महिलाओं को सीधे वित्तीय सहायता पहुँचाई गई है। वहीं ऐसे निरंतर प्रयासों का सबसे सुखद परिणाम मैटरनल मॉर्टेलिटी रेश्यो में आई भारी गिरावट है, जो वर्ष 2014-16 की दर 130 से घटकर 2021-23 में 88 पर आ गई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि हजारों माताओं के जीवन सुरक्षित होने का द्योतक है। ये सभी योजनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक संयुक्त ‘इकोसिस्टम’ के रूप में काम कर रही हैं। जब एक महिला को धुएं से मुक्ति मिलती है, घर में पानी मिलता है और कार्यस्थल पर सुरक्षा का अहसास होता है, तब वह अपनी पूरी ऊर्जा शिक्षा, उद्यम और नेतृत्व में लगा पाती है। यही वह बुनियाद है जिस पर विकसित भारत की इमारत खड़ी हो रही है।
सुरक्षा और न्याय: भयमुक्त सशक्तिकरण
किसी भी देश में सशक्तिकरण तभी संभव है जब वातावरण सुरक्षित हो। मिशन शक्ति के तहत ‘वन स्टॉप सेंटर’ जैसे तंत्र महिलाओं को संकट के समय कानूनी और चिकित्सा सहायता प्रदान कर रहे हैं। कार्यस्थल पर सुरक्षा के तहत पीओएसएच अधिनियम, 2013 के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित किया जा रहा है। वहीं सामाजिक सुधार कीदृष्ट से देश में जनवरी 2026 तक 2,153 बाल विवाहों को प्रभावी ढंग से रोका गया है, जो समाज की बदलती सोच का प्रतीक है। जनवरी 1992 में एक सांविधिक निकाय के रूप में स्थापित राष्ट्रीय महिला आयोग ने भारत में महिलाओं के कानूनी हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका प्राथमिक कार्य केवल कानूनों की निगरानी करना नहीं, बल्कि समय के साथ उनमें आवश्यक सुधारों का सुझाव देना भी है। यह आयोग सुनिश्चित करता है कि संविधान द्वारा दी गई समानता की गारंटी धरातल पर भी प्रभावी रहे।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)



