लेखक-अरविंद जयतिलक
आज प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी डॉक्टर सलीम अली का जन्मदिवस है। डॉक्टर सलीम अली को ‘भारत के पक्षी पुरुष’ के रुप में जाना जाता है। डॉक्टर सलीम अली को भारत भर में पक्षियों का व्यवस्थित सर्वेक्षण के लिए जाना जाता है। उन्होंने पक्षियों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं जिससे भारत में पक्षी विज्ञान को समझने और बढ़ावा देने में मदद मिली है। उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्डस’ बेहद लोकप्रिय है। उनके उल्लेखनीय योगदानों में भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य जिसे केवलादेव नेशनल पार्क कहा जाता है, की स्थापना है। उन्होंने साइलेंट वेली नेशनल पार्क को एक बांध परियोजना से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1958 में पद्म भूषण और 1976 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। लेकिन चिंता की बात यह है कि उनके सतत प्रयासों और जागरुकता के बावजूद भी भारत में पक्षियों की आबादी तेजी से घट रही है। वर्ष 2020 में संयुक्त राष्ट्र की ‘स्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स की रिपोर्ट से भी उद्घाटित हुआ था कि भारत में 79 प्रतिशत पक्षियों की तादाद घट गयी है। यह रिपोर्ट इसलिए विश्वसनीय है कि 867 प्रकार के पक्षियों का अध्ययन कर उनके दीर्घावधि (25 साल) और लघु अवधि (5 साल) के आंकड़े जुटाए गए और निष्कर्ष पर पहुंचा गया। भारत के पक्षियों की स्थिति रिपोर्ट 2023 में कहा गया है कि 60 प्रतिशत प्रजातियों की गिरावट और निवास स्थान का नुकसान हुआ है। पर अच्छी बात यह है कि विगत वर्षों से गौरैया की संख्या स्थिर रही है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले ढ़ाई दशकों में गौरैया की संख्या में कोई विशेष कमी नहीं आयी है। हालांकि दिल्ली, मुंबई समेत आधा दर्जन शहरों में इनकी संख्या घटी है। देश में प्रवासी पक्षियों का आना भी कम हो रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में ओखला बर्ड सेंचुरी में प्रवासी पक्षियों का आगमन लगातार कम हो रहा है। पक्षी विज्ञानियों की मानें तो बर्ड सेंचुरी के आसपास बढ़ते वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की वजह से प्रवासी पक्षी यहां आना पसंद नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा दलदली और जल वाली भूमि का लगातार घटते जाना भी एक प्रमुख कारण है। जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध पश्चिमी घाटों पर वर्ष 2000 से अब तक पक्षियों की संख्या में 75 प्रतिशत तक कमी आयी है। याद होगा कि अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने वर्ष 2013 में भारत में देखे जाने वाले पक्षियों की दस प्रजातियों को बेहद गंभीर रुप से संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल किया था। इनमें ग्रेट साइबेरियन क्रेन, गोडावण,, सफेद पीठ वाला गिद्ध, लाल-सिर वाला गिद्ध, जंगली उल्लू, स्पून बिल्ड सैंडपाइपर और सफेद पेट वाला बगुला प्रमुख था। इन पक्षियों की आबादी में गिरावट की मुख्य वजहों में आवास का नुकसान, संशोधन, बिखंडन, पर्यावरण प्रदूषण को प्रमुख रुप से जिम्मेदार माना गया। ग्लोबल वार्मिंग ने पक्षियों के अस्तित्व को और भी अधिक संकट में डाल दिया है। गौरतलब है कि भारत में विभिन्न प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं जिनमें गौरैया, कौआ, तोता, तीतर, चर्खी, शामा, भुजंगा, बया, मुनिया, लाल तूती, गिद्ध, कठफोड़वा, नीलकंठ, बसंता, महोखा, पतरिंगा, हरियल, हुदहुद और बटेर जैसे पक्षी आमजन के बेहद करीब माने जाते हैं। लेकिन इन लोकप्रिय पक्षियों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। पक्षियों के संरक्षणकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि दुनिया की सबसे वजनदार पक्षियों में से एक सोन चिरैया की प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है। सोन चिरैया लगभग एक मीटर ऊंची होती हैं और इनका वजन 15 किलो होता है। सोन चिरैया को कभी भारत और पाकिस्तान की घास भूमियों पर देखा जाता था लेकिन अब ये एकांत भरे क्षेत्रों में ही देखने को मिलते हैं। पक्षी विज्ञानियों की मानें तो पृथ्वी पर मानव की गतिविधियों और जंगलों के विनाश के कारण पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं। पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि वर्ष 1500 से अब तक तकरीबन पक्षियों की 190 प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं। बिडंबना है कि विलुप्त होने की दर लगातार बढ़ती जा रही है। पक्षी विज्ञानियों के मुताबिक विश्व भर में तकरीबन 10000 प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें से कुल 1200 प्रजातियां ऐसी हैं जो कि विलुप्त होने के कगार पर हैं। भारत से इतर बात करें तो हवाई द्वीप के लगभग 30 प्रतिशत पक्षियों की प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं। इसी तरह गुआम द्वीप पर पक्षियों की 60 प्रतिशत प्रजातियां पिछले तीन दशक के दौरान विलुप्त हुई हैं। पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि पक्षियों की विलुप्ती के कई कारण हैं। उनमें उनके आवास का नष्ट होना, पक्षियों के भोजन के स्रोत का खत्म होना, प्राकृतिक आपदाएं, मौसम में बदलाव मुख्य कारण हैं। पक्षियों के शिकार और उनके अंडों के इस्तेमाल का कुप्रभाव भी उनकी तादाद पर पड़ता है। कभी-कभार तो किसी परभक्षी प्रजाति के आने के कारण भी पक्षियों की तादाद पर संकट मंडराने लगता है। अमूमन देखा जा रहा है कि मानव जाति कृषि कार्य से अधिक उत्पादन हासिल करने के लिए जमकर कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहा है। ये कीटनाशक पक्षियों के लिए जहरीले साबित होते हैं और इसकी वजह से पक्षियों के अंडे नहीं बन पाते हैं। लिहाजा धीरे-धीरे उनकी प्रजातियां विलुप्त हो जाती है। पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि पक्षियों की कई प्रजातियां बेहद संवेदनशील होती हैं और इन्हें अनुकूल वातावरण में रहने की आदत होती है। किंतु वातावरण में थोड़ा भी बदलाव होता है तो उनके जीवन पर संकट मंडराने लगता है। भारत प्रवासी पक्षियों मसलन साइबेरियन क्रेन, ग्रेटर फ्लेमिंगो और डेमॉस्सेल क्रेन जैसे पक्षियों के लिए घर जैसा है। अति सुंदर व मनमोहन प्रवासी पक्षी हर वर्ष सर्दियों और गर्मी के मौसम में भोजन, प्रजनन और घोंसले के शिकार के लिए भारत आते हैं। गौर करें तो सर्दियों के मौसम में तो भारतीय उपमहाद्वीप के विशेष क्षेत्र मसलन झील, आर्द्रभूमि या बैकवाटर प्रवासी पक्षियों का बसेरा बन जाता है। आज की तारीख में जो पक्षी पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं उनमें डोडो, तस्मानियन इमु, कैरोलिना परेकीट, अरबी शुतुर्गमुर्ग, संदेश वाहक कबूतर विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। उचित होगा कि इन विलुप्त हो रहे पक्षियों को बचाने की दिशा में प्रयास तेज हो ताकि पक्षियों का कलरव तेज हो सके।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




