(आलोक तिवारी)
(मथुरा)
एआरटीओ के संरक्षण में चल रहा है पूरा खेल? सरकारी या निजी—कर्मचारियों की स्थिति अस्पष्ट, वेतन का स्रोत भी बना रहस्य
संभागीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) मथुरा में वर्षों से सक्रिय जीतेश शर्मा, हेमंत सहित दर्जनों व्यक्तियों की तैनाती को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
रजिस्ट्रेशन सहित कई महत्वपूर्ण विभागीय कार्य इन लोगों द्वारा किए जाते रहे हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि ये सरकारी कर्मचारी हैं, संविदाकर्मी हैं या किसी निजी नेटवर्क के माध्यम से कार्यालय में सक्रिय हो गए हैं।
विभागीय नियमों के मुताबिक बिना वैध आदेश, स्वीकृति और नियुक्ति-पत्र के किसी भी व्यक्ति को सरकारी कार्यालय में जिम्मेदारी सौंपना पूरी तरह नियमों के विपरीत है। इसके बावजूद दर्जनों ‘अनधिकृत कर्मियों’ की कार्यालय में मौजूदगी और सक्रिय भूमिका प्रशासनिक व्यवस्था व पारदर्शिता पर गहरे प्रश्न चिह्न लगा रही है। सूत्रों का दावा है कि इनमें से किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, जिससे मामले में संदेह और गहरा हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन लोगों का वेतन किस स्रोत से दिया जा रहा है? क्या ये लोग विभागीय कोष से भुगतान पा रहे हैं, या किसी निजी व्यवस्था के जरिए संचालित किए जा रहे हैं? आरटीओ प्रशासन इस मुद्दे पर लगातार चुप्पी साधे हुए है, जिससे आशंकाएं और भी मजबूत हो रही हैं।
इसी क्रम में “खन्ना” नामक व्यक्ति द्वारा आरटीओ कार्यालय में फिटनेस से संबंधित जिम्मेदार कार्य किए जाने ने भी कर्मचारियों और आम जनता के बीच हलचल बढ़ा दी है। यदि ये व्यक्ति सरकारी पद पर नहीं हैं, तो आखिर किस अधिकार और आदेश के तहत इतने संवेदनशील सरकारी कार्यों को अंजाम दे रहे हैं?
स्थानीय नागरिकों और विभागीय सूत्रों का कहना है कि यह मामला गंभीर अनियमितताओं और संभावित संरक्षणवाद से जुड़ा प्रतीत होता है। लोगों का सवाल साफ है कि क्या यह पूरा तंत्र एआरटीओ के संरक्षण में फल-फूल रहा है?
जनता ने शासन से मांग की है कि तत्काल उच्च स्तरीय जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि किस नियम और किस अधिकृत आदेश के आधार पर ये दर्जनों व्यक्ति मथुरा आरटीओ कार्यालय में कार्यरत हैं, और उनके वेतन तथा भूमिका का वास्तविक स्रोत क्या है।
यह मामला अब तेजी से तूल पकड़ता जा रहा है और प्रशासन की चुप्पी कई नई शंकाओं को जन्म दे रही है।




