भारतीय जनता पार्टी ने जिस दिन सात बार के सांसद व केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया उसी दिन समाजवादी पार्टी का पीडीए समीकरण पटरी से उतर गया। अब अखिलेश यादव केवल बसपा के में अस्तित्व हीन होते जा रहे नेताओं और भाजपा के शामिल दलबदलुओं के भरोसे वर्ष 2027 विधानसभा चुनाव में बेड़ापार करना चाहते हैं। मिशन 2027 लगे अखिलेश यादव कई बार पीडीए की परिभाषा भी बदले लेकिन उनको अभी तक कोई सकारात्मक मार्ग नहीं मिल पा रहा है।जहां तक वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम की बात है तो वह समाजवादी पार्टी के रणनीति से ज्यादा भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी और शिथिलता को जाता है। स्थानीय कार्यकर्ताओं की मंशा को दरकिनार कर भाजपा प्रत्याशियों के चयन में हुई चूक कम, उसका दुष्प्रचार ज्यादा होना सपा के लिये वरदान बन गया। वर्ष 2017 के विधानसभा में हुई हार के सदमें से अखिलेश यादव अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इस हार के बाद उन्होंने 2019 में बहुजन समाज पार्टी से मायावती के शर्तों पर समझौता कर लिया। इटावा की रैली में भरे मंच पर डिंपल यादव ने मायावती के पैर छू कर आशीर्वाद मांगा लेकिन पांच लोकसभा सीट से ज्यादा नहीं बढ़ पाये। वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव भी हारे, 2024 में उनकी लोकसभा सीटें भाजपा से ज्यादा हो गयीं। लेकिन उनका पीडीए का नारा कभी स्थिर नहीं रहा। पहले पिछड़ा-दलित- अल्पसंख्यक (खास कर मुस्लिम) की एकजुटता को पीडीए बताये। फिर पीडीए में पी मतलब पीड़ित, आगे चल कर पी मतलब पंडित फिर महिला, मेले के बच्चे की तरह अवसर के अनुसार जहां जो फिट लगता था उसी को पीडीए कहते गये। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर प्रायः कुछ न कुछ ऐसी टिप्पणी करते सुने और देखे गये हैं जिनके प्रयोग के बाद अखिलेश का सभ्य समर्थक उनसे दूरी बना लेता है। पंकज चौधरी अभी तक अखिलेश यादव पर कोई कडुवा हमला नहीं किये हैं, उनको अखिलेश यादव के हमले का इंतजार है। जिस भाषा मे वह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पर हमला बोलेंगे उससे बेहतर भाषा में उनको उत्तर मिलेगा। भाजपा के रणनीतिकार अभी पंकज चौधरी को अपने योजना के अनुसार घुमा भी नहीं पाये हैं। सूत्रों के अनुसार पंकज चौधरी प्रदेश के कुर्मी बाहुल्य क्षेत्रों में चौपाल लगायेंगे। उनका अपने समाज से सीधा सवाल होगा कि जब भारतीय जनता पार्टी आपको नेतृत्व स्थान पर बैठा रही है तो आप दूसरे दलों में जहां दूसरे नम्बर की राजनैतिक हैसियत की गारंटी नहीं है वहां क्यों लाइन लगा कर अपमानित होने जा रहे हैं। जिसने बेनी प्रसाद वर्मा की लोकप्रियता बर्दाश्त करने की कभी क्षमता नहीं रही। जो गया कुर्मी और ददुआ को पहले कुख्यात और ईनामी दस्यु बता कर समाज मे भय का प्रतीक बनाये वही बाद में गया कुर्मी और ददुआ की लोकप्रियता का उपयोग करके सरकार बनाये। जो बेनी वर्मा को धोखा दे दिये वह आपके होंगे क्या? आजमखान का यदि अखिलेश यादव ईमानदारी से मदत किये होते तो क्या आज आजमखान जेल में सड़ते।जिनकी राजनीतिक धोखेबाजी जानलेवा हो सकती है। उदाहरण के लिये बसपा सुप्रीमो मायावती का गेस्ट हाउस कांड भूलना मुश्किल होगा। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पर मायावती के जान लेने के षड्यंत्र कर्ता का आरोप लगा था। अखिलेश यादव मायावती की पार्टी के नेताओं को तोड़ कर मायावती को अलग-थलग करने को ठानी है। बसपा के भगोड़ों को मिला कर अखिलेश यादव पीडीए का नारा दे रहे हैं। वह यह भूल गये हैं कि दलित समाज यदि अपनी नेता मायावती के साथ गद्दारी करने वालों को सबक सिखाने की ठान लिया तो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की हालत खराब हो जायेगी।
अखिलेश यादव वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव लेकर इतने घबराहट में हैं कि जिस जाति के नेता के साथ मिलते हैं उसको सरकार आने पर नम्बर दो बनाने की गारंटी दे देते हैं। बताते हैं कि पिछले महीने एक नजदीकी मुस्लिम नेता ने पूछ लिया कि आप कितने उपमुख्यमंत्री बनायेंगे,उसके बाद कई महीने उस नेता से मिले ही नहीं। अब वह दूसरी पार्टी में लाइन लगाये हैं।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के नेतृत्व में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अब सपा की टूल किट की छाया से बाहर आने को संघर्षरत है। यही वजह है कि भाजपा के खिलाफ कांग्रेस और अजय राय ने जितना धरना-प्रदर्शन किया उसका आधा भी सपाई नहीं किये होंगे। अखिलेश यादव केवल भाजपा के विरोध में अपना मोर्चा मजबूत करने में उन पार्टियों को निशाना बना रहे हैं जो भाजपा से लड़ने में उनको प्रत्यक्ष-परोक्ष मदद करती रहीं। पिछड़े के गठबंधन के नाम पर ऐन चुनाव के पूर्व वर्ष 2022 में भाजपा सरकार में शामिल तीन-तीन पिछड़े मंत्रियों को तोड़ लिया। स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्म सिंह सैनी व दारा सिंह चौहान कैबिनेट मंत्री होते हुये सपा में चले गये थे। चुनाव हुआ तो स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी अपना-अपना विधानसभा चुनाव हार गये। दारा सिंह चौहान जीते तो लेकिन थोड़े ही दिनों में उन्होंने फिर से अखिलेश यादव को छोड़ कर भाजपा की सदस्यता ले लिया। इससे पहले भाजपा गठबंधन में लड़े सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर जिन्हें योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त करके बाहर किया था, अखिलेश यादव ने बाद में उनसे चुनावी गठबंधन किया था। लेकिन जब 2022 में अखिलेश यादव की सरकार नहीं बनी तो ओम प्रकाश राजभर वह एक बार फिर भाजपा गठबंधन में शामिल होकर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के कैबिनेट में मंत्री बन गये। दारा सिंह चौहान भी सपा छोड़ कर वापस भाजपा में आ गये। इसके लिये उनको बड़ी राजनैतिक और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ी। सपा से त्यागपत्र देकर जब वह उसी सीट पर हुये उपचुनाव में लड़े तो बुरी तरह पराजित हुये। चूंकि उत्तर प्रदेश के अधिकांश दलबदलू गृहमंत्री अमितशाह से डीलिंग करते हैं इस लिये दारा सिंह चौहान को भाजपा ने न सिर्फ विधानपरिषद में भेजा बल्कि उन्हें सपा से गद्दारी के इनाम में कैबिनेट मंत्री बनाया। इन सभी दल बदलुओं को अपने साथ लाने के बाद भी भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा से पिछड़ गयी।
यूपी की राजनीति में कुर्मी समाज का दम इसी से जाना जा सकता है कि उत्त्तर प्रदेश से लोकसभा में यूपी से 11 कुर्मी सांसद चुने गये हैं। जिनमें सबसे ज्यादा समाजवादी पार्टी से 7, भाजपा से 3 और अपना दल से 1 सांसद हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी ही वह ताकत है जो सबसे सजग होकर वोट करता है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में सबसे अधिक संख्या कुर्मी विधायकों की हैं।विभिन्न टाइटिल के साथ यह संख्या लगभग चालीस बताई जाती है। प्रदेश टीम बनने के बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव की निगाह यूपी भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी की गतिविधियों पर रहेगी। सात बार के सांसद केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री होने के बाद पंकज चौधरी यूपी भाजपा के अध्यक्ष बने हैं। निर्विवाद छवि सबको जोड़ कर चलने की सांगठनिक कला के चलते वह अभी तक जहां रहे वहां लोकप्रियता के शिखर पर रहे हैं। अखिलेश यादव 2027 के चुनाव की दृष्टि से चाहे जितने दांव-पेंच चलेंगे पंकज चौधरी अपनी विनम्रता से उसको काटने की क्षमता रखते हैं। यूपी भाजपा में केशव प्रसाद मौर्य के रूप में पिछड़ों का बहुत बड़ा चेहरा है। केशव प्रसाद की ताकत को पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जानता है।2022 में जब योगी आदित्यनाथ की सरकार से तीन-तीन पिछड़े नेता ऐन मौके पर पार्टी की पीठ में छूरा घोंप कर सपा में शामिल हो गये थे तब उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अकेले सपा के रणनीतिकारों की लुटिया डुबो दी थी। इसी कारण सपा प्रमुख अखिलेश यादव सबसे ज्यादा भाजपा नेता केशव प्रसाद मौर्य पर हमलावर रहते हैं।
माना जाता है कि केशव मौर्य के पास अखिलेश यादव के हर माया जाल का काट है। वह सीधे यादव परिवार से टकराते हैं, लेकिन पार्टी उन्हें मजबूत करने के बजाय बहुत मझौले दर्जे के विभाग देकर झुला रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार पार्ट एक मे लोकनिर्माण विभाग में रहते हुई उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने जनप्रतिनिधियों व कार्यकर्ताओं के काम को हाथ खोल कर मदद किया था। जिसके कारण उत्तर प्रदेश भाजपा में जितने सांसदों, विधायकों व कार्यकर्ताओं की भीड़ केशव प्रसाद मौर्य के यहां लगती है उतनी किसी के घर नहीं लगती। यादव, कुर्मी, लोध के बाद पिछड़ी जातियों में जिस जाति का दबदबा दिखा वह मौर्य-कुशवाहा-सैनी का रहा। भाजपा ने लोध समाज के कल्याण सिंह को दो बार मुख्यमंत्री बनाया था। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुये राजनैतिक गणितबाजों ने बताया कि मौर्य और कुर्मी यदि भाजपा में मुख्यमंत्री नहीं हुये तो शायद और किसी दल में उन्हें अवसर मिलेगा। लोकसभा के चुनाव में अखिलेश यादव ने अपने परिवार के अलावा अन्य यादव नेताओं को हाशिये पर ढकेल कर टिकट बांट लिया था।सपाध्यक्ष अखिलेश यादव को भी इस बात का डर है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को रोकने के नाम पर परिवार के बाहर के यादवों के साथ यदि टिकट नहीं दिया तो इस बार यादव नेता बगावत कर सकते हैं। अभी तक एक परिवार को आगे बढ़ाने के लिये यादव नौजवान लगातार अपनी महत्वाकांक्षा को मारते रहे। यदि 2027 में यादव नवयुवक सोच समझ कर निर्णय नहीं किये तो प्रदेश की राजनीति में वह बहुत हाशिये पर जा सकते हैं।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं और यही उनके बिजी विचार हैं)


