लेखक-अरविंद जयतिलक
भारतवर्ष वंदेमातरम् के 150 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है। चारो ओर वंदेमातरम् की गूंज से भारतीयता का सनातन भाव गुंजायमान है। लेकिन विडंबना है कि राष्ट्र गीत वंदेमातरम् का उच्चतर भाव कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा है। वे कुतर्कों का सहारा लेकर किस्म-किस्म की प्रवंचना से विरोध का प्रस्तावना खींच रहे हैं। यह ठीक नहीं है। उन्हें समझना होगा कि वंदेमातरम् किसी धर्म या मजहब का समर्थन या विरोध का भाव नहीं है। यह मातृभूमि के प्रति समर्पण, त्याग और बलिदान का वह निश्छल भाव है जिसे विचारों का हथियार बनाकर आजादी के दीवानों ने मातृभूमि को आजाद कराया। राष्ट्रगीत वंदेमातरम केवल शब्द भर नहीं हैं बल्कि इसमें राष्ट्र की संस्कृति, इतिहास, कला, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान का वह भाव समाहित है जो भारत राष्ट्र की निरंतरता और चेतना को उद्घाटित करता है। इसके प्रकटीकरण से राष्ट्र की गरिमा और गौरव में वृद्धि होती है। बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित वंदेमातरम गीत की पंक्तियों में भारतीयता का ओज और राष्ट्रप्रेम के प्रति अटूट जज्बा है। यह गीत अपने आगोश में संपूर्ण भारत की विविधता और विशेषता को समेटे हुए है। इसमें मातृभूमि के प्रति अनुरक्ति, समर्पण और उदात्त भावनाएं निहित हैं। शास्त्रों में माता और मातृभमि को सर्वोपरि माना गया है। कहा गया है कि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी‘ यानी माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। वंदेमातरम में यही भाव निहित है। वंदेमातरम गीत के इतिहास में जाएं तो 7 नवंबर 1876 को बंगाल के कांतल पाड़ा गांव में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस वंदेमातरम गीत की रचना की। 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में सम्मिलित किया गया। 1896 में रविद्रनाथ टैगोर ने पहली बार वंदेमातरम को बंगाली शैली में लय और संगीत के साथ कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन में गाया। मूल रुप से वंदेमातरम के प्रारंभिक दो पद संस्कृत में थे और शेष गीत बांगला में। वंदेमातरम का अंग्रेजी अनुवाद सबसे पहले अरविंद घोष ने किया। दिसंबर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया और बंगाल विभाजन के समय यह गीत राष्ट्रीय नारा बन गया। 1906 में वंदेमातरम देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रविंद्र नाथ टैगोर ने इसका संशोधित रुप प्रस्तुत किया। 1923 में कांग्रेस अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा इस्लाम की भावना के विरुद्ध बताकर वंदेमातरम गीत का विरोध किया गया। लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरु, सुभाषचंद्र बोस, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और आचार्य नरेंद्र देव की समिति ने 28 अक्टुबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में इस राष्ट्रगीत के दो पहले पैराग्राफ को राष्ट्रगीत के रुप में स्वीकृति दे दी। 14 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ वंदेमातरम गीत के साथ और समापन राष्ट्रगान ‘जनगणमन’ के साथ हुआ। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1905 में वंदेमातरम गीत के संबंध में लिखा है कि-‘आज लाखों लोग एक बात के लिए एकत्र होकर वंदेमातरम गाते हैं, मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरित यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नहीं करता है।’ 1936 में भी गांधी जी ने वंदेमातरम गीत के बारे में कहा कि-‘कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनेक सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है। अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन विशेषणों को यथार्थ में बदलें। मुझे कभी ख्याल नहीं आया कि यह गीत सिर्फ हिंदुओं के लिए रचा गया है।’ ध्यान रखना होगा कि आजादी के दौरान के अलावा 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में जब अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस का अधिवेशन शुरु हुआ तो इस अधिवेशन में श्यामजी वर्मा, मैडम कामा, विनायक सावरकर जैसे क्रांतिकारियों ने भारत की स्वतंत्रता पर संकल्प पारित करने के लिए भाषण से पहले आधुनिक भारत के पहले राष्ट्रीय झंडे को फहराया और इस झंडे के मध्य में देवनागरी लिपि में वंदेमातरम लिखा। यहां ध्यान देना होगा कि 1906 से 1911 तक यह गीत पूरा गाया जाता था। इस गीत में वह ताकत थी कि ब्रिटिश हुकूमत को बंगाल का विभाजन का फरमान वापस लेना पड़ा। क्रांतिकारियों ने इस वंदेमातरम आदर्श नारे को अपने संस्कार में ढ़ाला और गीत के जरिए आजादी की जंग को गति देकर भारतीय जनमानस में जागृति पैदा की। लोगों को लामबंद किया और ब्रिटिश राजसत्ता को उखाड़ फेंका। भगत सिंह, मदनलाल ढींगरा, राजगुरु और बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने वंदेमातरम की आवाज लगाकर फांसी के फंदे को चूम लिए। गौर करें तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के हर देश में राष्ट्रगीत का गायन होता है। इस्लामी देशों में भी राष्ट्रगीत को समादर प्राप्त है और वह मातृभूमि को समर्पित है। अरबी में मातृभूमि को मादर-ए-वतन कहा जाता है जिसका मतलब मां से है। फारसी में मातृभूमि की उपमा मां से की गयी है। यमन के राष्ट्रगीत में झरनों की तुलना मां के दूध से गयी है। मिश्र के राष्ट्रगीत में मातृभूमि की तुलना मां से की गयी है। इसी तरह मलेशिया, सूडान, अरब, जार्डन सभी देशों में राष्ट्रगीत की परंपरा है और उसे किसी न किसी रुप में मातृभूमि और मां से जोड़ा गया है। तो क्या फिर यह समझा जाए कि ये मुस्लिम देश इस्लाम की भावना का अनादर कर रहे हैं? बिल्कुल ही नहीं। फिर आज वंदेमातरम के 150 वर्ष के जश्न पर ऐतराज और काली सियासत क्यों? क्यों न माना जाए कि कुछ मुठ्ठी भर लोग वंदेमातरम गीत पर सवाल खड़ा करके क्रांतिकारियों का अपमान कर रहे हैं? उन्हें समझना होगा कि वंदेमातरम गीत राष्ट्रीयता का स्वर है। साथ ही क्रांतिकारियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी। इसका विरोध आजादी के दिवानों का विरोध है। साथ ही राष्ट्रीयता की भावना पर कुठाराघात भी। यह ठीक नहीं है कि कुछ सियासी दल और तथाकथित संगठन अपने राजनीतिक फायदे के लिए वंदेमातरम गीत को राजनीतिक संकीर्णता के दायरे में रखकर इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ प्रचारित कर रहे हैं। भला इस गीत से किसी मजहब और संप्रदाय को किस तरह चोट पहुंच सकता है? उचित होगा कि वे संकीर्णताओं के केंचूल से बाहर निकलकर राष्ट्रगीत वंदेमातरम पर काली सियासत न करें। इससे राष्ट्र का नुकसान होता है। सामाजिक वातावरण विषाक्त बनता है। गौर करें तो वंदेमातरम का विरोध कोई प्रवृत्ति नई नहीं है। याद होगा कि गत वर्ष पहले उत्तर प्रदेश राज्य की संभल लोकसभा सीट से निर्वाचित सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने वंदेमातरम के गायन को इस्लाम की भावना के खिलाफ बताया था। इन्हीं महोदय में 2013 में जब वे बीएसपी सांसद थे तब भी उन्होंने वंदेमातरम का अपमान कर देश के करोड़ों लोगों की भावना से खिलवाड़ किया था। तब वे राष्ट्रगीत वंदेमातरम का धुन बजने पर सदन से उठकर चले गए थे। उनके इस शर्मनाक कृत्य से देश अवाक रह गया था। तब तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने उनके इस हरकत की निंदा की थी और जवाबतलबी भी की। गत वर्ष पहले मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने भी वंदेमातरम् के गायन पर पाबंदी थोप दी थी लेकिन जब संपूर्ण देश भर में इस निर्णय की आलोचना हुई तब यू-टर्न लेते हुए फैसला लिया गया कि हर महीने के पहले कार्य दिवस पर पुलिस बैंड की धुनों पर वंदेमातरम गाया जाएगा। याद होगा गत वर्ष पहले जब मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम् को तमिलनाडु के स्कूलों में सप्ताह में कम से कम दो बार गायन को अनिवार्य किया गया तब भी कुछ सियासी दलों ने हायतौबा मचाना शुरु किया था। इसे मजहबी फ्रेम में फिट कर इस्लाम की भावना के विरुद्ध सियासी शोर में बदलने की कोशिश की गई। आज की तारीख में भी कुछ ऐसा ही उपक्रम देखने को मिल रहा है। कुछ सियासी दल और राष्ट्रविरोधी संगठन वंदेमातरम गीत पर अनावश्यक वितंडा खड़ा कर देश का माहौल खराब कर रहे हैं। यह ठीक नहीं है। देश के जनमानस को ऐसे प्रपंचियों और अराजकवादियों से सतर्क और सावधान रहना होगा।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




