लेखक-अरविंद जयत
-आर्थिक समीकरण के दरम्यान भारत और अमेरिका के बीच दस साल के लिए रक्षा समझौता दोनों देशों के रिश्ते में मिठास घोलने वाला है। अमेरिकी रक्षा सचिव हेगसेथ और भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए उम्मीद जताई है कि इस समझौते से दोनों देशों के सैन्य संबंधों को मजबूती मिलेगी। गौर करें तो यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका द्वारा भारत पर पचास फीसदी टैरिफ लगाने से दोनों देशों के कारोबारी रिश्ते में असहजता उत्पन्न हुई है। पर उम्मीद है कि इस रक्षा समझौते के उपरांत अब दोनों देशों के रिश्ते पर जमी बर्फ पिघलेगी। गौर करें तो यह समझौता पहली बार नहीं हुआ है। यह समझौता वर्ष 1962 से ही चला आ रहा है जब अमेरिका ने भारत-चीन युद्ध में भारत का साथ दिया था। 1984 के एक अन्य समझौते के तहत दोनों देशों के बीच तकनीक हस्तांतरण को लेकर समझौता हुआ। इसी तरह 2004 में दोनों देशों के बीच नेक्स्ट स्टैप्स इन स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप की शुरुआत हुई। गौर करें तो इन समझौते से भारत की रक्षा तकनीकी और सैन्य ताकत में लगातार वृद्धि होती रही है। इन समझौतों के जरिए ही वर्ष 2023 में अमेरिका की कंपनी जीईएयरोस्पेस और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच फाइटर प्लेन के एफ-414 इंजन बनाने का समझौता हुआ जिसके तहत दोनों देशों की कंपनियां भारत में फाइटर प्लेन का इंजन बनाने के लिए सहमत हुई। यह समझौता इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण रहा कि भारत अभी तक एरो-इंजन बनाने में सफलता हासिल नहीं किया है। दुनिया में सिर्फ चार देश ही मसलन अमेरिका, रुस, फ्रांस और ब्रिटेन हैं जिहोंने फाइटर जेट का इंजन बनाने में दक्षता हासिल की है। इसके अलावा भारत को अमेरिका से 31 प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी मिलने पर मुहर लग चुकी है। प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी के जरिए हिंद महासागर में निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा सकेगा। चूंकि हिंद महासागर क्षेत्र से भारत को उर्जा जरुरतों और व्यवसायिक सामानों का आयात-निर्यात होता है ऐसे में निगरानी के लिए प्रिडेटर ड्रोन कवच का काम करेगा। गौर करें तो इस इलाके में तकरीबन 12 हजार जहाजों की मौजूदगी लगातार बनी रहती है। चीन का 80 फीसदी व्यापार इसी रुट के जरिए मलक्का स्ट्रेट से होकर गुजरता है। चूंकि भारत को अमेरिका से मिलने जा रहा प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी मिसाइल से लैस होगा ऐसे में इस इलाके में चीन की बढ़ती हिमाकत का जवाब दिया जा सकेगा। गौर करें तो विगत एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच सामरिक साझेदारी को नया पंख लगा है। गत वर्ष पहले दोनों देशों के बीच रक्षा-सुरक्षा संबंधों को नई ऊंचाई देने के लिए तकरीबन तीन अरब डॉलर रक्षा सौदे का एलान हुआ। इसके तहत भारत अमेरिका से एडवांस मिलिट्री इक्विपमेंट सिस्टम के साथ 6 एएच 64ई अपाचे और 23 एमएच-60 रोमियो हेलीकॉप्टर खरीदेगा। इससे भारतीय वायुबेड़ा को बेहद मजबूती मिलेगी। अमेरिका दुनिया के सबसे अत्याधुनिक और उच्चकोटि के हथियारों जिसमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और रॉकेट और नौसैनिक जहाज शामिल हैं, को भी भारत को देने को तैयार है। ये दोनो हेलीकॉप्टर हर तरह के मौसम में दिन के किसी भी समय हमला करने में निपुण हैं। चौथी पीढ़ी वाला यह हेलीकॉप्टर छिपी हुई पनडुब्बियों को आसानी से निशाना बना सकता है। इस हेलीकॉप्टर के जरिए भारत को अब अपने समुद्री इलाके को शत्रु मुक्त करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी नेवी के बेड़े में शामिल एमएच-60 रोमियो सी-हॉक हेलीकॉंप्टर की गणना दुनिया के सबसे अत्याधुनिक हथियारों में होती है। अमेरिका भारत को 13 एमके-45 नौसैनिक तोप बेचने का भी एलान कर चुका है। अमेरिका भारत को इसका अपग्रेडेड वर्जन सौंपेगा। यह तोप युद्धपोतों से सतह और हवाई हमले करने में सक्षम है। अमेरिका भारतीय सैनिकों को इन तोपों को चलाने का प्रशिक्षण भी देगा। इन तोपों के मिलने से भारतीय नौसेना की समुद्री ऑपरेशनों की क्षमता बढ़ेगी। गौर करें तो अमेरिका-भारत रक्षा सौदे का बजट जो पिछले एक दशक में 2008 तक शुन्य था वह आज 2025 में बढ़कर 22 बिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है। अगर दोनों देशों के बीच इसी तरह सामरिक सामंजस्य और भरोसा बना रहा तो वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच रक्षा सौदा 30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। गौर करें तो आज अमेरिका भारत के साथ मिलिट्री टू मिलिट्री संबंध व सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इसका प्रमुख कारण उसके द्वारा दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करना है। इसी को ध्यान में रखते हुए उसने 2016 में भारत को ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ के तौर पर मान्यता दिया। याद होगा कि वर्ष 2018 में भारत और अमेरिका के बीच कॉमकासा (कम्युनिकेशंस कमपैटबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर हुआ। इस कारर पर हस्ताक्षर के बाद से अब भारत अमेरिका से अति-आधुनिक रक्षा तकनीक प्राप्त करेगा। अभी तक भारत को अमेरिका से ऐसी कोई तकनीकी नहीं मिलती थी। एफ-16 बनाने वाली अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने भी भारत में अपने नए रोल आउट एफ-21 का निर्माण करने की पेशकश कर चुकी है। उसने भारत से स्वीकारोक्ति चाही है कि अगर वह 114 विमानों की खरीद का आश्वासन देता है तो वह किसी अन्य देश को न तो विमान बेचेगा और न ही उसकी तकनीकी देगा। अगर यह सौदा परवान चढ़ता है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा। इस सौदे पर भारत को तकरीबन 15 अरब डॉलर खर्च करने होंगे। इस सौदे से जुड़े सैन्य उत्पादों का तकरीबन 85 प्रतिशत हिस्सा भारत में तैयार होगा। इससे भारतीय नागरिकों को रोजगार का अवसर उपलब्ध होगा। दोनों देशों के बीच लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट सप्लाई एग्रीमेंट (एलईएमओ) पर भी आगे बढ़ने का संकेत दिया जा चुका है। यह समझौता एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के युद्धपोत और फाइटर एयरक्राफ्ट एक दूसरे के सैनिक अड्डों का इस्तेमाल तेल भराने एवं अन्य साजो-सामान की आपूर्ति कर सकेंगे। इस समझौते को लेकर चीन ने नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि अमेरिका भारत के साथ मिलकर उसकी घेराबंदी कर रहा है। गौर करें तो चीन की बेचैनी यों ही नहीं है। दरअसल उसे डर है कि भारत और अमेरिका मिलकर दक्षिणी चीन सागर में उसकी दादागिरी पर नकेल कस सकते हैं। याद होगा कि चीन को तब भी असहज होना पड़ा था जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के सतत प्रयास से भारत को मिसाइल टेक्नोलाजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल किया गया। एमटीसीआर में शामिल होने के बाद अब भारत दूसरे देशों को अपनी मिसाइल टेक्नोलॉजी बेच सकता है। गौर करें तो किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति को प्रभावित करना या अपने अनुकूल बनाना आसान नहीं होता। वह भी तब जब अमेरिका जैसे ताकतवर देश की विदेश नीति को प्रभावित करनी हो। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कमाल कर दिखाया है। उन्होंने दशकों पुराने अमेरिका की भारत नीति को बदलकर रख दिया। उसी का परिणाम है कि गत वर्ष पहले अमेरिका की प्रतिनिधि सभा ने भारत के साथ रक्षा संबंध विकासित करने और रक्षा उपकरणों की बिक्री तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मामले में द्विदलीय समर्थन वाले बिल को मंजूरी दे चुकी है। दोनों देशों के बीच संपन्न ‘टू प्लस टू’ वार्ता के तहत अब दोनों देश खुफिया सैन्य जानकारी साझा करने के साथ आर्थिक-कुटनीतिक साझेदारी को नया आयाम दे रहे हैं। दोनों देश कम्युनिकेशंस कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) पर भी अपनी सहमति जता चुके हैं। यह समझौता भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। ऐसा इसलिए कि इस समझौते के बाद भारत पहला गैर नाटो देश होगा जो अमेरिकी मदद से संवेदनशील सुरक्षा तकनीक से लैस होगा। इसके अलावा अब भारत के लिए सी-17 ग्लोब मास्टर, सी-130, पी-81 एयरक्राफ्ट, चिनूक-अपाचे हेलीकॉप्टर हासिल करना भी आसान हो गया है। सच कहें तो इन समझौतों से दोनों देशों के रक्षा संबंध पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद साबित हुए हैं।
सामरिक साझेदारी की नई मिसाल-अरविंद जयतिलक
वैश्विक स्तर पर तेजी से बदल रहे सामरिक-आर्थिक समीकरण के दरम्यान भारत और अमेरिका के बीच दस साल के लिए रक्षा समझौता दोनों देशों के रिश्ते में मिठास घोलने वाला है। अमेरिकी रक्षा सचिव हेगसेथ और भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए उम्मीद जताई है कि इस समझौते से दोनों देशों के सैन्य संबंधों को मजबूती मिलेगी। गौर करें तो यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका द्वारा भारत पर पचास फीसदी टैरिफ लगाने से दोनों देशों के कारोबारी रिश्ते में असहजता उत्पन्न हुई है। पर उम्मीद है कि इस रक्षा समझौते के उपरांत अब दोनों देशों के रिश्ते पर जमी बर्फ पिघलेगी। गौर करें तो यह समझौता पहली बार नहीं हुआ है। यह समझौता वर्ष 1962 से ही चला आ रहा है जब अमेरिका ने भारत-चीन युद्ध में भारत का साथ दिया था। 1984 के एक अन्य समझौते के तहत दोनों देशों के बीच तकनीक हस्तांतरण को लेकर समझौता हुआ। इसी तरह 2004 में दोनों देशों के बीच नेक्स्ट स्टैप्स इन स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप की शुरुआत हुई। गौर करें तो इन समझौते से भारत की रक्षा तकनीकी और सैन्य ताकत में लगातार वृद्धि होती रही है। इन समझौतों के जरिए ही वर्ष 2023 में अमेरिका की कंपनी जीईएयरोस्पेस और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच फाइटर प्लेन के एफ-414 इंजन बनाने का समझौता हुआ जिसके तहत दोनों देशों की कंपनियां भारत में फाइटर प्लेन का इंजन बनाने के लिए सहमत हुई। यह समझौता इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण रहा कि भारत अभी तक एरो-इंजन बनाने में सफलता हासिल नहीं किया है। दुनिया में सिर्फ चार देश ही मसलन अमेरिका, रुस, फ्रांस और ब्रिटेन हैं जिहोंने फाइटर जेट का इंजन बनाने में दक्षता हासिल की है। इसके अलावा भारत को अमेरिका से 31 प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी मिलने पर मुहर लग चुकी है। प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी के जरिए हिंद महासागर में निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा सकेगा। चूंकि हिंद महासागर क्षेत्र से भारत को उर्जा जरुरतों और व्यवसायिक सामानों का आयात-निर्यात होता है ऐसे में निगरानी के लिए प्रिडेटर ड्रोन कवच का काम करेगा। गौर करें तो इस इलाके में तकरीबन 12 हजार जहाजों की मौजूदगी लगातार बनी रहती है। चीन का 80 फीसदी व्यापार इसी रुट के जरिए मलक्का स्ट्रेट से होकर गुजरता है। चूंकि भारत को अमेरिका से मिलने जा रहा प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी मिसाइल से लैस होगा ऐसे में इस इलाके में चीन की बढ़ती हिमाकत का जवाब दिया जा सकेगा। गौर करें तो विगत एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच सामरिक साझेदारी को नया पंख लगा है। गत वर्ष पहले दोनों देशों के बीच रक्षा-सुरक्षा संबंधों को नई ऊंचाई देने के लिए तकरीबन तीन अरब डॉलर रक्षा सौदे का एलान हुआ। इसके तहत भारत अमेरिका से एडवांस मिलिट्री इक्विपमेंट सिस्टम के साथ 6 एएच 64ई अपाचे और 23 एमएच-60 रोमियो हेलीकॉप्टर खरीदेगा। इससे भारतीय वायुबेड़ा को बेहद मजबूती मिलेगी। अमेरिका दुनिया के सबसे अत्याधुनिक और उच्चकोटि के हथियारों जिसमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल और रॉकेट और नौसैनिक जहाज शामिल हैं, को भी भारत को देने को तैयार है। ये दोनो हेलीकॉप्टर हर तरह के मौसम में दिन के किसी भी समय हमला करने में निपुण हैं। चौथी पीढ़ी वाला यह हेलीकॉप्टर छिपी हुई पनडुब्बियों को आसानी से निशाना बना सकता है। इस हेलीकॉप्टर के जरिए भारत को अब अपने समुद्री इलाके को शत्रु मुक्त करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी नेवी के बेड़े में शामिल एमएच-60 रोमियो सी-हॉक हेलीकॉंप्टर की गणना दुनिया के सबसे अत्याधुनिक हथियारों में होती है। अमेरिका भारत को 13 एमके-45 नौसैनिक तोप बेचने का भी एलान कर चुका है। अमेरिका भारत को इसका अपग्रेडेड वर्जन सौंपेगा। यह तोप युद्धपोतों से सतह और हवाई हमले करने में सक्षम है। अमेरिका भारतीय सैनिकों को इन तोपों को चलाने का प्रशिक्षण भी देगा। इन तोपों के मिलने से भारतीय नौसेना की समुद्री ऑपरेशनों की क्षमता बढ़ेगी। गौर करें तो अमेरिका-भारत रक्षा सौदे का बजट जो पिछले एक दशक में 2008 तक शुन्य था वह आज 2025 में बढ़कर 22 बिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है। अगर दोनों देशों के बीच इसी तरह सामरिक सामंजस्य और भरोसा बना रहा तो वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच रक्षा सौदा 30 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। गौर करें तो आज अमेरिका भारत के साथ मिलिट्री टू मिलिट्री संबंध व सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इसका प्रमुख कारण उसके द्वारा दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित करना है। इसी को ध्यान में रखते हुए उसने 2016 में भारत को ‘प्रमुख रक्षा साझेदार’ के तौर पर मान्यता दिया। याद होगा कि वर्ष 2018 में भारत और अमेरिका के बीच कॉमकासा (कम्युनिकेशंस कमपैटबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर हुआ। इस कारर पर हस्ताक्षर के बाद से अब भारत अमेरिका से अति-आधुनिक रक्षा तकनीक प्राप्त करेगा। अभी तक भारत को अमेरिका से ऐसी कोई तकनीकी नहीं मिलती थी। एफ-16 बनाने वाली अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने भी भारत में अपने नए रोल आउट एफ-21 का निर्माण करने की पेशकश कर चुकी है। उसने भारत से स्वीकारोक्ति चाही है कि अगर वह 114 विमानों की खरीद का आश्वासन देता है तो वह किसी अन्य देश को न तो विमान बेचेगा और न ही उसकी तकनीकी देगा। अगर यह सौदा परवान चढ़ता है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा सौदा होगा। इस सौदे पर भारत को तकरीबन 15 अरब डॉलर खर्च करने होंगे। इस सौदे से जुड़े सैन्य उत्पादों का तकरीबन 85 प्रतिशत हिस्सा भारत में तैयार होगा। इससे भारतीय नागरिकों को रोजगार का अवसर उपलब्ध होगा। दोनों देशों के बीच लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट सप्लाई एग्रीमेंट (एलईएमओ) पर भी आगे बढ़ने का संकेत दिया जा चुका है। यह समझौता एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के युद्धपोत और फाइटर एयरक्राफ्ट एक दूसरे के सैनिक अड्डों का इस्तेमाल तेल भराने एवं अन्य साजो-सामान की आपूर्ति कर सकेंगे। इस समझौते को लेकर चीन ने नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि अमेरिका भारत के साथ मिलकर उसकी घेराबंदी कर रहा है। गौर करें तो चीन की बेचैनी यों ही नहीं है। दरअसल उसे डर है कि भारत और अमेरिका मिलकर दक्षिणी चीन सागर में उसकी दादागिरी पर नकेल कस सकते हैं। याद होगा कि चीन को तब भी असहज होना पड़ा था जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के सतत प्रयास से भारत को मिसाइल टेक्नोलाजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल किया गया। एमटीसीआर में शामिल होने के बाद अब भारत दूसरे देशों को अपनी मिसाइल टेक्नोलॉजी बेच सकता है। गौर करें तो किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति को प्रभावित करना या अपने अनुकूल बनाना आसान नहीं होता। वह भी तब जब अमेरिका जैसे ताकतवर देश की विदेश नीति को प्रभावित करनी हो। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कमाल कर दिखाया है। उन्होंने दशकों पुराने अमेरिका की भारत नीति को बदलकर रख दिया। उसी का परिणाम है कि गत वर्ष पहले अमेरिका की प्रतिनिधि सभा ने भारत के साथ रक्षा संबंध विकासित करने और रक्षा उपकरणों की बिक्री तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मामले में द्विदलीय समर्थन वाले बिल को मंजूरी दे चुकी है। दोनों देशों के बीच संपन्न ‘टू प्लस टू’ वार्ता के तहत अब दोनों देश खुफिया सैन्य जानकारी साझा करने के साथ आर्थिक-कुटनीतिक साझेदारी को नया आयाम दे रहे हैं। दोनों देश कम्युनिकेशंस कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) पर भी अपनी सहमति जता चुके हैं। यह समझौता भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। ऐसा इसलिए कि इस समझौते के बाद भारत पहला गैर नाटो देश होगा जो अमेरिकी मदद से संवेदनशील सुरक्षा तकनीक से लैस होगा। इसके अलावा अब भारत के लिए सी-17 ग्लोब मास्टर, सी-130, पी-81 एयरक्राफ्ट, चिनूक-अपाचे हेलीकॉप्टर हासिल करना भी आसान हो गया है। सच कहें तो इन समझौतों से दोनों देशों के रक्षा संबंध पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद साबित हुए हैं।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




