लेखक-अरविंद जयतिलक
पिछले महीने की 21 तारीख से शुरु हुआ 18 वीं लोकसभा का पांचवा सत्र संपन्न हुआ। मानसून सत्र के दौरान लोकसभा की उत्पादकता 31 फीसद और राज्यसभा की 39 फीसद रही। इस मानसून सत्र में 14 सरकारी विधेयक पुनःस्थापित किए गए और कुल 12 विधेयक पारित हुए। 419 प्रश्न शामिल किए गए लेकिन हंगामे के कारण सिर्फ 55 प्रश्न ही लिए जा सके। देखा गया कि सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने कई मुद्दों के जरिए जमकर हंगामा काटा जिससे सत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ। विपक्षी दलों ने सत्र के आरंभ में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सरकार की घेराबंदी की लेकिन सरकार ने सभी सवालों का स्पष्टता से उत्तर देकर उन्हें चुप करा दिया। खुद प्रधानमंत्री मोदी मोर्चा संभालते देख गए। उन्होंने सभी सवालों का जवाब देते हुए मानसून सत्र को विजयोत्सव करार दिया। ऑपरेशन सिंदूर से प्रारंभ हुआ मानसून सत्र भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए खत्म हुआ। अगर विपक्षी दल संसद सत्र को चलाने में सहयोग किए होते तो और प्रभावी ढंग से कामकाज हो सकता था। लेकिन देखा गया कि विपक्षी दल कोई न कोई मुद्दा बनाकर संसद को बाधित करने की कोशिश किए। पहले ऑपरेशन सिंदूर मसले को गरमाने की कोशिश की लेकिन जब यह मुद्दा कारगर साबित नहीं हुआ तो बिहार में चल रहे एसआईआर के मुद्दे को सियासी औंजार बनाया। उन्होंने न सिर्फ सरकार बल्कि संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग पर भी ढेरों संगीन आरोप गढ़े। बेशक विपक्ष को अधिकार है कि वह सरकार से कठिन से कठिन सवाल पूछे। लेकिन संसद को बाधित करना कहां तक उचित है। सच कहें तो विपक्ष की दिलचस्पी सवाल पूछने और जवाब सुनने से ज्यादा सत्र को बाधित करने की रही। उसी का नतीजा रहा कि 120 घंटे चर्चा के बजाए सिर्फ 37 घंटे चर्चा हुआ। विपक्ष के रवैए को लेकर देश में कोई अच्छा संदेश नहीं गया। गौर करें तो मौजूदा सत्र ही नहीं बल्कि विगत दो दशक से लगातार संसद में ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। 13 मई 1952 को जब संसद की पहली बैठक संपन्न हुई थी तब देश के पहले राष्ट्रपति डा0 राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि संसद जनभावनाओं की अपेक्षा की सर्वोच्च पंचायत है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने संसदीय लोकतंत्र को जवाबदेही से जोड़ते हुए संदेश दिया था कि भारत की सेवा का अर्थ लाखों-करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा करना है। लोकसभा के पहले अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर ने जनता और जनप्रतिनिधियों को आगाह करते हुए कहा था कि सच्चे लोकतंत्र के लिए व्यक्ति को केवल संविधान के उपबंधों अथवा विधानमंडल में कार्य संचालन हेतु बनाए गए नियमों और विनियमों के अनुपालन तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि विधानमंडल के सदस्यों में लोकतंत्र की सच्ची भावना भी विकसित होनी चाहिए। सवाल लाजिमी है कि क्या मौजूदा जनप्रतिनिधि डा0 राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरु और मावलंकर की अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा उतर रहे हैं? सवाल यह भी कि क्या माननीयों के आचरण में जनता के प्रति जवाबदेही की सच्ची भावना विकसित हुई है? राजनीतिक दलों विशेषकर जनता के प्रतिनिधियों को इन सवालों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दो राय नहीं कि इन सात दशकों में संसद ने ढे़र सारे उतार-चढ़ाव देखे और अपनी सर्वोच्चता बनाए रखी। देश भी संसदीय लोकतंत्र को लेकर उदासीन नहीं रहा। आज भी लोगों की निष्ठा व आस्था संसद के प्रति बनी हुई है। यहीं कारण है कि बहुलतावादी भारतीय समाज में व्याप्त असमानताओं के बावजूद भी संसद में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है और आवाज मुखर हुई है। संसद ने इन सात दशकों में ढे़र सारे ऐसे निर्णय लिए हैं जो सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सरोकारों के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। सामाजिक मोर्चे पर संसद के कार्यों का मूल्यांकन करें तो निःसंदेह उपलब्धियां स्वागतयोग्य है। मसलन दहेज प्रथा और अस्पृश्यता उन्मूलन जैसी सामाजिक बुराइयों पर रोकथाम लगाकर संसद ने अपने मानवीय दृष्टिकोण को चरितार्थ किया है। भूमि सुधार और श्रम कानून के माध्यम से वह भूमिहीनों और कामगारों को आर्थिक संबल प्रदान किया है। संसद ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का द्वारा खोला है। मनरेगा कार्यक्रम चलाकर रोजगार क्रांति की शुभारंभ की। संसद ने घरेलू हिंसा पर रोक का कानून बनाकर बच्चों और महिलाओं की रक्षा की। सूचना और शिक्षा के अधिकार कानून से समाज को लैस किया। मौजूदा सरकार ने कई जनहित योजनाओं के जरिए हाशिए पर खड़े लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास किया। धारा 370 को समाप्त कर जम्मू-कश्मीर के लोगों को मुख्य धारा में शामिल किया गया। तीन तलाक की समाप्ति से लेकर महिलाओं को संसद में आरक्षण सुनिश्चित किया गया। महिलाओं के विकास के लिए ढेर सारे कदम उठाए गए। फिर भी संसद द्वारा अभी बहुत कुछ काम किया जाना बाकी है। यह तभी संभव होगा जब जनता के प्रतिनिधि संसद की गरिमा का पालन करते हुए जवाबदेही का आचरण पेश करेंगे। उन्हें समझना होगा कि हजारों कानून बनने के बाद भी देश की जमीनी सूरत पूरी तरह नहीं बदली है। संसद की भूमिका का विस्तार किया जाना जरुरी है। यह तभी संभव होगा जब देश की सर्वोच्च पंचायत में हंगामा खड़ा करने के बजाए गरीबों, मजदूरों, किसानों और आधी आबादी के मुद्दे जोर-शोर से उठाए जाएंगे। आज संसद के स्वरुप, कार्यप्रणाली, प्राथमिकता और उसकी सोच में बदलाव की जरुरत है। देश को जवाबदेह, अनुशासित और कामकाजी संसद चाहिए। आजादी के बाद पहली लोकसभा के पहले साल यानी 1952 में कुल 103 और राज्यसभा की 60 बैठकें हुई। समझा जा सकता है कि संसद कितना अनुशासित और जवाबदेह था। तब संसद में बहस को लोकतंत्र का पवित्र कार्य समझा जाता था। आज स्थिति उलट है। अब तो संसद आए दिन स्थगित होती रहती है। मुद्दों पर गंभीर बहस को लेकर संसद सदस्य कितने गंभीर होते हैं इसी से समझा जा सकता है कि वे सार्थक बहस के बजाए एकदूसरे की कमियां गिनाते हैं। यह स्थिति निराशाजनक है। दुखद स्थिति यह है कि संसद जिसे विशेषकर कानून बनाने वाली संस्था के रुप में जाना जाता है उसकी अभिरुचि आज कानून निर्माण के बजाए सियासी मसलों पर आ टिकी है। एक आंकड़े के मुताबिक पहली लोकसभा में तकरीबन 49 प्रतिशत समय कानून निर्माण पर खर्च होता था। आज यह दर 13 प्रतिशत से भी कम है। यही नहीं संसद में व्यक्तिगत शालीनता और भाषा की मर्यादा भी टुट रही है। अक्सर संसद के माननीय सदस्य उपदेश बघारते हैं कि संसद सर्वोपरि है और उसके मान-सम्मान की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन माननीयगण ही संसद की मर्यादा की धज्जियां उड़ाते दिखते हैं। आज जनता की नजर में संसद के दोनों सदन कठघरे में हैं। राज्यसभा को तो समाप्त करने की मांग भी उठने लगी है। एक समय था जब राज्यसभा जनपक्षधरता वाले राजनीतिज्ञों व कला, साहित्य, विज्ञान व समाजसेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों से गौरान्वित होता था। लेकिन पिछले कुछ दशकों से जिस तरह राज्यसभा भी हंगामे की भेंट चढ़ रहा है उससे उसकी गरिमा का क्षरण हुआ है। अब तो यह कहा जाने लगा है कि राज्यसभा एक कीमती लिबास भर रही गयी है जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। उसकी प्रासंगिकता को गैर-जरुरी और देश पर अनावश्यक भार माना जाने लगा है। इसका मुख्य कारण राज्यसभा के सदस्यों द्वारा लोकसभा के सदस्यों जैसा आचरण का प्रदर्शन है। यह ठीक नहीं है। राज्यसभा के सदस्यों को समझना होगा कि संसद के एक अंग के रुप में राज्यसभा का अपना विशिष्ट महत्व है। वह न केवल लोकसभा में पारित कानूनों पर अपना मुहर लगाती है बल्कि उन पर उसे पुनर्विचार करने का अवसर भी प्रदान करती है। उचित होगा कि संसद के दोनों सदनों के सदस्य संसद को अखाड़ा बनाने के बजाए अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी का विस्तार करें। कोई भी भावना राष्ट्र के भविष्य से बढ़कर नहीं है। देश का भविष्य संसद से तय होता है और माननीय सांसदों को जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्र के पोषण, संवर्धन और समृद्धि के लिए प्रत्येक संसद सत्र की गरिमा और कामकाज की उत्पादकता को बढ़ाएं।

(लेकिन राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)