लेखक~डॉ.के.विक्रम राव
♂÷चार साल पहले आज ही के दिन (22 फरवरी 2017) प्रेषित मेरा पोस्ट दोबारा प्रस्तुत है। तब यूपी विधानसभा का चुनाव हो रहा था। राहुल गांधी तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव साथ—साथ अभियान कर रहे थे। उधर प्रियंका गांधी और डिंपल यादव भी साथ थीं। आज यह पोस्ट ज्यादा सामयिक हो गया है।
”जब खंडन ही मंडन बन जाये”
Samajwadi Party – Indian National Congress के गठबंधन के चुनावी पोस्टरों में Dr. Rammanohar Lohia और Rahul Gandhi की तस्वीरें साथ छपी हैं। ऊपर नीचे।
दिल मसोसता रहा मैं कि मिथक भी कैसे तार्किक बन गया है। विसंगति भी कैसे माकूल बनाई जानी है। अर्थात् Akhilesh Yadav का काम करिश्मा दिखा रहा है, चीख रहा है।
लोहिया जिस राजनेता के आजीवन आलोचक रहे उसी के नाती के बेटे के साथ उनकी फोटो छापी जाय। वह भी एकजुट वोट मांगने हुये। लोहियावादियों की रूह कांपनी चाहिए। यह चुनावी हथकण्डा वैचारिक अवरोहण (अथवा स्खलन) की इन्तिहा है। कौटिल्य ने नन्द वंश से तो लोहिया ने नेहरू वंश से भारत को मुक्त करने का बीड़ा उठाया था। मगर उसी जड़ को लोहिया के लोग खाद खिंला रहे हैं, बजाय छाछ पिलाने के। वोटों के लिये इतना उन्माद? लोहिया बताते थे कि विधान भवन और संसद ही राजनीति का सीमान्त नहीं होता। वे पड़ाव हो सकते हैं, गंतव्य ठिकाने नहीं। मगर अखिलेश यादव मुकाम को ही मंजिल बना बैठे हैं। कांग्रेस उसी की छत बन गई है। अखिलेश यादव को बिना देखे ही दो सदियों पूर्व ब्रिटिश पादरी चार्ल्स कोल्टन ने लिखा था, “मनुष्य विरोधाभास की गठरी है”। लेकिन सपा-कांग्रेस गठबंधन तो शंभू की बरात है। भानुमति के पिटारे तक तो गनीमत रहती।

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसीडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷




