★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
(इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खण्डपीठ के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर सकती है योगी सरकार?)
{योगी सरकार ने कहा नगर निकाय चुनाव ओबीसी आरक्षण के साथ ही होंगे,जल्द करेंगे आरक्षण के लिए आयोग का गठन}
[गत 5 दिसम्बर को सरकार द्वारा जारी आरक्षण की अधिसूचना में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्देशित ट्रिपल टेस्ट फार्मूले का सरकार द्वारा नही किया गया था पालन]
♂÷उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के फैसले ने माहौल गर्मा दिया है। हाई कोर्ट ने योगी सरकार को आदेश दे दिया है कि वह बिना ओबीसी आरक्षण लागू किए नगर निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी कर दे। दरअसल, योगी सरकार ने 5 दिसंबर को निकाय चुनाव को लेकर आरक्षण की अधिसूचना जारी कर दी थी। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी और कहा गया था कि योगी सरकार ने आरक्षण तय करने में सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट फॉर्म्यूले का पालन नहीं किया है। हाई कोर्ट ने तब तत्काल सरकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया था।
इसके बाद अलग-अलग तारीखों पर मामले की सुनवाई होती रही और सोमवार को कोर्ट ने योगी सरकार को निर्देश दे दिया है कि वह बिना ओबीसी आरक्षण लागू किए ही नगर निकाय की अधिसूचना जारी कर दे क्योंकि समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है और ट्रिपल टेस्ट फॉर्म्यूले के पालन में काफी देरी लग सकती है। हाई कोर्ट के नगर निकाय चुनाव को लेकर दिए गए फैसले के बीच ट्रिपल टेस्ट को लेकर लोगों के मन में सवाल है कि आखिर यह है क्या? आइए, विस्तार से जानते हैं-
क्या है ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला
दरअसल, विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र सरकार 2021 के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निकाय चुनावों के लिए ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए एक फॉर्म्यूला दिया था। इसे ट्रिपल टेस्ट फार्मूला कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निकाय चुनाव में राज्य सरकार ट्रिपल टेस्ट फार्मूले का पालन करने के बाद ही ओबीसी आरक्षण तय कर सकती है।इस ट्रिपल टेस्ट फार्मूले में
- सबसे पहले स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति को लेकर अनुभवजन्य जांच के लिए एक आयोग की स्थापना की जाए। यह आयोग निकायों में पिछ़ड़पेन की प्रकृति का आकलन करेगा और सीटों के लिए आरक्षण प्रस्तावित करेगा।
- आयोग की सिफारिशों के आलोक में स्थानीय निकायों द्वारा ओबीसी की संख्या का परीक्षण कराया जाए और उसका सत्यापन किया जाए।
- इसके बाद ओबीसी आरक्षण तय करने से पहले यह ध्यान रखा जाए कि एससी-एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कुल आरक्षित सीटें 50 फीसदी से ज्यादा न हों।
योगी आदित्यनाथ सरकार पर आरोप है कि उसने 5 दिसंबर को जारी आरक्षण की अधिसूचना में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्देशित ट्रिपल टेस्ट फार्मूले का पालन नहीं किया था। इस संबंध में जब कोर्ट ने सवाल किया तो योगी सरकार ने हलफनामा दाखिल कर अपना जवाब दिया। सरकार का कहना है कि उसने 7 अप्रैल 2017 को विस्तृत प्रक्रिया के साथ निकाय चुनाव के लिए ओबीसी आबादी की पहचान के लिए दिशा निर्देश जारी किए थे, जो ट्रिपल टेस्ट फार्मूले की पहली शर्त है।
इसके बाद ओबीसी के आनुपातिक आरक्षण के नियम को यूपी सरकार सख्ती से पालन कर रही है। 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण न दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का भी पालन किया जा रहा है। हालांकि, साल 2017 के इस ट्रिपल टेस्ट आधारित आरक्षण की व्यवस्था को कोर्ट ने नहीं माना और 5 दिसंबर को जारी आरक्षण की अधिसूचना को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अब ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रियाओं का पालन करने में महीनों लगेंगे। ऐसे में चुनाव में देरी होगी। कोर्ट ने योगी सरकार को आदेश दे दिया कि अब बिना ओबीसी आरक्षण के ही वह निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी करे।
सीएम योगी ने दिया ओबीसी आरक्षण पर आयोग गठन करने का आदेश, सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती है सरकार
योगी सरकार ने कहा कि ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा दिये गये आदेश के खिलाफ जरूरत पड़ने पर सरकार सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती है। इसके साथ ही योगी सरकार ने ये कहा कि यूपी नगर निकाय चुनाव ओबीसी आरक्षण के साथ ही होंगे। सरकार ने कहा कि ओबीसी आरक्षण के लिये जल्द आयोग गठित किया जायेगा।
बता दें कि हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण पर यूपी सरकार के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिन सीटों को सरकार द्वारा ओबीसी घोषित किया गया है, उन पर आरक्षण लागू नहीं होगा और ऐसी सीटें सामान्य श्रेणी में होंगी।
कोर्ट ने कहा कि ट्रिपल टेस्ट के बिना कोई आरक्षण नहीं होगा। हाईकोर्ट ने सरकार के आरक्षण के ड्राफ्ट को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा कि जिन सीटों को सरकार द्वारा एससी आरक्षण घोषित किया गया था वे हाईकोर्ट के आदेश के बाद अनुसूचित जाति के लिए ही रिजर्व रहेंगी। कोर्ट ने 87 पेज का जजमेंट दिया है।




