★ओमप्रकाश तिवारी★
★मुम्बई★
मूर्धन्य साहित्यकार, पत्रकारों ने जमघट कर साहित्य-पत्रिका-पत्रकारिता पर की गहरी मीमांसा
♂÷यह फोटो अपने आप में अद्भुत है। 28 वर्षों से निकल रही साहित्यिक पत्रिका मंथन के साहित्य समग्र विशेषांक के अतिथि संपादक इस बार अग्रज श्री Vimal Mishra जी थे। इसमें उन्होंने ममता कालिया, सूर्यबाला, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मधु कांकरिया, सूर्यभानु गुप्त और कुमार अंबुज जैसे श्रेष्ठ साहित्यकारों की तो रचनाएं छापी हीं, पहला लेख ‘धर्मयुगः यादें बाकी हैं’ सुदर्शना द्विवेदी जी से लिखवाने में सफल रहे। धर्मयुग का अपना एक युग रहा है, जिसने कई दशक तक न सिर्फ भारत बल्कि विदेश तक में पाठकों में पढ़ने की रुचि जागृत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। जब भारत नया-नया आजाद हुआ था, उस दौरान 1950 में भी धर्मयुग की पाठक संख्या 50 हजार से अधिक थी। जबकि उस समय देश की आबादी आज की तुलना में कितनी कम रही होगी। उस समय ‘धर्मयुग’ अपने पुराने नाम ‘नवयुग’ के नाम से निकलता था। तब इसके संपादक हुआ करते थे महावीर अधिकारी। 19 अगस्त, 1951 में जब इसका नाम धर्मयुग हुआ, तो इसके संपादक हो गए थे सत्यकाम विद्यालंकार। 1960 में डॉ. धर्मवीर भारती के आने के बाद धर्मयुग का वह युग शुरू हुआ, जिसकी छाप आज भी हमारी पीढ़ी के दिलोदिमाग पर ताजा है। धर्मयुग बंद हुए जरूर दो दशक से ज्यादा हो रहे हैं, लेकिन इसका खुमार आज भी यत्र-तत्र देखा जा सकता है। खासतौर से हम मुंबई के हिंदीभाषियों में।
यही कारण था कि जब यह विशेषांक निकला तो भाई विमल जी और धर्मयुग के बाद जनसत्ता में भी अपनी छाप छोड़ चुके भाई ओमप्रकाश सिंह ने मिलकर धर्मयुग परिवार के साथ-साथ मुंबई के कुछ और पत्रकारों के साथ एक आयोजन करने का मन बना लिया। स्थान की समस्या हल कर दी बांद्रा स्थित उत्तर भारतीय संघ के युवा अध्यक्ष संतोष सिंह जी एवं इसके उपाध्यक्ष डॉ.राधेश्याम तिवारी जी ने। और लग गया जमघट। करीब तीन घंटे चले इस बतकही टाइप कार्यक्रम में धर्मयुग के जमाने की ऐसी-ऐसी बातें सुनने को मिलीं, कि मन बार-बार यही कहता रहा कि काश ! धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं का वह दौर फिर लौट आए (हो सकता है डिजिटल कचरे से ऊब कर लोग उस तरफ वापसी का मन बना भी लें !)
इसी कार्यक्रम में ‘मंथन’ के विशेषांक के लोकार्पण समारोह का है यह चित्र। जिसमें डॉ.धर्मवीर भारती की पत्नी एवं साहित्यकार पुष्पा भारती जी, धर्मयुग में सहायक संपादक एवं फिर फिल्मफेयर हिंदी के संपादक रहे मनमोहन सरल जी, धर्मयुग के साथ-साथ नवभारत टाइम्स के भी संपादक रहने के बाद अब साहित्यिक पत्रिका नवनीत का संपादन कर रहे विश्वनाथ सचदेव जी, उपन्यासकार सूर्यबाला जी, धर्मयुग का हिस्सा रहे भाई अनुराग चतुर्वेदी जी, हरीश पाठक जी, ओमप्रकाश जी, शहनाज जी, सुदर्शना द्विवेदी जी, विनीत जी तथा नवभारत टाइम्स मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार भाई अनुराग त्रिपाठी जी, विमल मिश्र जी, अंग्रेजी एवं मराठी में समान अधिकार रखनेवाले वरिष्ठ पत्रकार भाई अभिजीत मुळे जी, तथा मुंबई के साहित्यिक कार्यक्रमों का बड़ा सुंदर संचालन करनेवाले अनुज अभय मिश्र जी एवं आकाशवाणी की उद्घोषक कमलेश पाठक के साथ-साथ महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शीतला प्रसाद दुबे जी के साथ मुझ नाचीज को भी साथ खड़े होने का अवसर प्राप्त हुआ। उम्मीद है इस पत्रिका के संपादक श्री महेश अग्रवाल जी साहित्यिक पत्रकारिता के बुझते दीप में इसी प्रकार थोड़ा-मोड़ा तेल डालते रहेंगे। उन्हें इस प्रयास के लिए बहुत-बहुत बधाई।
÷लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र राज्य के ब्यूरो इन चीफ व ख्यातिलब्ध कवि-साहित्यकार-कलमकार हैं÷
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