लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷कुछ माह पहले पुणे के विधायकों के असामयिक निधन के कारण उनकी सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं। इनमें से एक सीट पुणे के सघन क्षेत्र कसबा पेठ की है, तो दूसरी पुणे के बाहरी हिस्से पिंपरी-चिंचवड़ की। पिंपरी-चिंचवड़ की सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है, और यही ध्यान देने की बात है। खासतौर से तीन दलों – शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा को मिलाकर बनी महाविकास आघाड़ी के लिए। पुणे की ये दोनों सीटें भाजपा विधायकों के निधन से रिक्त हुई थीं। इसलिए भाजपा को तो अपने उम्मीदवार खड़े करने ही थे। कायदे से तो इनमें से एक सीट पर अन्य दलों को उम्मीदवार खड़ा ही नहीं करना चाहिए था। क्योंकि कुछ ही महीने पहले इसी प्रकार मुंबई की एक सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान भाजपा ने यह कहते हुए अपना उम्मीदवार वापस ले लिया था कि महाराष्ट्र की परंपरा है कि किसी विधायक या सांसद के निधन के बाद हो रहे उपचुनाव में यदि उसका कोई परिजन खड़ा होता है, तो उसके सामने विपक्षी दल अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा करते। चूंकि अंधेरी पूर्व की सीट पर शिवसेना उद्धव गुट के एक विधायक का निधन हुआ था, इसलिए वहां से उनकी पत्नी के विरुद्ध भाजपा ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी। लेकिन पिंपरी-चिंचवड़ में भाजपा विधायक लक्ष्मण जगताप के निधन के बाद हो रहे उपचुनाव में यही सहृदयता महाविकास आघाड़ी की तरफ से नहीं दिखाई दी। वहां लक्ष्मण जगताप की पत्नी अश्विनी जगताप को जब भाजपा ने उम्मीदवारी दी, तो उनके विरुद्ध महाराष्ट्र और देश के दिग्गज नेता शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया। लेकिन विशेष बात यह नहीं है। विशेष बात तो यह है कि इस सीट पर शिवसेना का भी एक बागी उम्मीदवार खड़ा हो गया है। शिवसेना उद्धव गुट के एक स्थानीय नेता राहुल कलाते ने इस सीट से पर्चा भर दिया है। शिवसेना ने उन्हें राकांपा के पक्ष में उम्मीदवारी वापस लेने के लिए मनाने की भरसक कोशिश की। मुंबई से अपने एक वरिष्ठ नेता सचिन अहीर को उनसे बात करने भेजा। लेकिन राहुल कलाते ने साफ कह दिया कि उनके समर्थक उम्मीदवारी वापस लेने के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए वह चुनाव लड़ेंगे। यानी इस सीट पर महाविकास आघाड़ी में एकता का दावा टायं-टायं फिस हो गया।
वास्तव में यह एक बानगी है महाराष्ट्र में भविष्य में होनेवाले लगभग सभी चुनावों के लिए। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह शिवसेना ने कांग्रेस और राकांपा से हाथ मिलाकर महाविकास आघाड़ी का गठन किया और उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी, इस प्रकार अचानक पाला बदल लेना शिवसेना में निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को कभी पसंद नहीं आया। क्योंकि भाजपा और शिवसेना का गठबंधन 30 साल पुराना हो चुका था। ज्यादातर स्थानों पर वार्ड और ग्रामसभा स्तर पर दोनों दलों के कार्यकर्ता साथ काम करने और कांग्रेस-राकांपा के विरुद्ध लड़ने के आदी हो चुके थे। हालांकि छोटे चुनावों में कई बार भाजपा-शिवसेना आमने-सामने भी लड़ती दिखाई दीं, क्योंकि दोनों को अपना संगठन भी चलाना था। लेकिन विधानसभा और लोकसभा जैसे चुनावों के लिए एक फार्मूला निश्चित हो चुका था। 1990 के आसपास जब शिवसेना और भाजपा नजदीक आए, उसी समय से दोनों दलों की लोकसभा और विधानसभा सीटें भी लगभग तय हो गई थीं। उसी के अनुसार दोनों दल अपनी-अपनी सीट पर मेहनत करते थे और इसका लाभ दोनों को मिलता था। राज्य में विधानसभा की 288 सीटें हैं। अनेक वर्षों से शिवसेना इनमें से 171 पर भाजपा 117 पर चुनाव लड़ती आई थीं। हालांकि भाजपा हमेशा कम सीटों पर लड़कर भी अपनी जीत का प्रतिशत ज्यादा रखने में सफल रही थी। दूसरी ओर शिवसेना द्वारा लड़ी जानेवाली सीटों में 50 से ज्यादा सीटें ऐसी थीं, जिनपर शिवसेना कभी जीत हासिल नहीं कर पाई। 2014 में सीटों के बंटवारे के समय भाजपा इन्हीं 50 सीटों में से कुछ सीटें अपने लिए मांग रही थी, ताकि दोनों दल 144-144 पर चुनाव लड़ सकें। लेकिन तब शिवसेना इसके लिए भी नहीं मानी और सिर्फ एक सीट के विवाद पर गठबंधन टूट गया था।
अब दावे तो महाविकास आघाड़ी की एकता के किए जा रहे हैं। कहा तो जा रहा है कि भविष्य में होनेवाले सभी चुनावों में कांग्रेस-राकांपा-शिवसेना आपस में समझौता करके लड़ेंगे। लेकिन क्या इस बारे में इन तीनों दलों के दिग्गजों ने अपने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से बात भी की है ? जिन सीटों पर शिवसेना, या इन तीनों दलों के कार्यकर्ता वर्षों से खुद चुनाव लड़ने की तैयारियों में जुटे हैं, वे अपनी सीट महाविकास आघाड़ी के ही किसी अन्य दल को देने के लिए भला क्यों तैयार हो जाएंगे ? यानी जो मसला आज पिंपरी-चिंचवड़ विधानसभा उपचुनाव में खड़ा हुआ है, वह भविष्य में पूरे महाराष्ट्र में खड़ा होगा, और इससे निपटना महाविकास आघाड़ी के किसी भी दल के लिए संभव नहीं होगा। पिंपरी-चिंचवड़ ही क्यों ? हाल ही में हुए नासिक के स्नातक क्षेत्र विधान परिषद चुनाव में भी ऐसी ही एक और घटना सामने आ चुकी है। जहां कांग्रेस के बागी उम्मीदवार सत्यजीत तांबे को भाजपा ने बाहर से समर्थन देकर जितवा दिया और राकांपा की उम्मीदवार को मुंह की खानी पड़ी। यानी मुंबई में एक मंच पर हाथ उठाकर एकता का नारा बुलंद करना, और उसे जमीनी स्तर पर चरितार्थ करना, दोनों बातें बिल्कुल अलग-अलग हैं। और शिवसेना में हुई बगावत का सबसे बड़ा कारण यही है। पिछले वर्ष जून में एकनाथ शिंदे के साथ आए 39 विधायकों और उसके कुछ ही दिनों बाद साथ आ गए 13 सांसदों की भी चिंता यही थी कि कांग्रेस-राकांपा के साथ गठबंधन होने पर कहीं उन्हें अपनी ही सीट न गंवानी पड़ जाए।

÷लेखक दैनिक जागरण के महाराष्ट्र राज्य ब्यूरो इन चीफ हैं÷
(साभार दैनिक जागरण)




