लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज की भारत यात्रा ने दोनों देशों के रिश्ते को मिठास से भर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी और ओलाफ शोल्ज ने द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा के साथ ही आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ने की प्रतिबद्धता जतायी है। गौर करें तो दोनों देशों के निकट आने से न सिर्फ स्वच्छ उर्जा, कारोबार, निवेश, नई प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय उर्जा, हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी क्षेत्र में काम करने में सहूलियत होगी बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व पर भी नकेल कसने में मदद मिलेगी। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी और शोल्ज ने रुस-यूक्रेन युद्ध पर भी विस्तार से चर्चा की है लिहाजा उम्मीद किया जाना चाहिए कि युद्ध को रोकने की दिशा में ठोस पहल करेंगे। ऐसा इसलिए कि लोकतांत्रिक मूल्य, आतंकवाद, अलगाववाद, बहुपक्षवाद, नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में सुधार को लेकर दोनों देशों के उद्देश्य साझा हैं। याद होगा अभी पिछले वर्ष ही प्रधानमंत्री मोदी ने जब चार देशों-जर्मनी, स्पेन, रुस और फ्रांस की यात्रा की तब जर्मनी के साथ साइबर नीति, विकास योजनाएं, स्थायी शहरी विकास, रेल संरक्षा, क्लस्टर प्रबंधन, डिजिटलाइजेशन, कौशल विकास समेत जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर हस्ताक्षर कर मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जतायी ।तब भी जर्मनी ने आतंकवाद से मुकाबले के लिए भारत के साथ मिलकर काम करने और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारतीय सदस्यता के दावे का समर्थन किया। तब दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की वकालत और विकास की गति तेज करने के संकल्प के साथ यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने से उत्पन आर्थिक प्रभावों को अपने अनुकूल बनाने के उपायों पर भी चर्चा की। यह रेखांकित करता है कि दोनों देशों के रिश्ते बेहद प्रगाढ़ हैं। गौर करें तो जर्मनी और भारत के बीच कुटनीतिक साझेदारी वर्ष 2000 से है। वैश्विक स्तर पर जर्मनी, यूरोप में भारत का विशालतम व्यापार साझीदार देश के अलावा 7 वां विशालतम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का स्रोत और दूसरा प्रमुख प्रौद्योगिकी साझीदार राष्ट्र है। 2021-22 में दोनों देशों के बीच करीब 25 अरब डाॅलर का आपसी कारोबार हुआ था जो एक साल पहले 21.76 अरब डाॅलर था। अच्छी बात है कि जर्मन चांसलर शोल्ज ने वादा किया है कि उनकी सरकार भारत के आईटी एक्सपर्ट के लिए जर्मनी के वर्क वीजा को आसान करेगी। निःसंदेह इस पहल से कारोबार को मजबूती मिलेगी। जर्मनी यूरोप का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है और यूरोपिय संघ में इसकी भागीदारी तकरीबन 20 फीसदी है। यूरोपीय यूनियन को जारी रखने का दारोमदार भी जर्मनी पर ही है। जहां तक भारत और जर्मनी के बीच आर्थिक संबंधों को सवाल है तो भारत-जर्मन विकास सहयोग द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण घटक है। जर्मनी संघीय गणराज्य 1958 से ही भारत-जर्मन द्विपक्षीय विकास सहयोग कार्यक्रम के तहत सहायता करता आ रहा है। जरुरत पड़ने पर वह भारत को वित्तीय सहायता के अलावा किफायती ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराता है। जर्मन गवर्नमेंट्स डवलपमेंट बैंक केएफडब्लू के जरिए भी वह भारत को अनुदान देता है। पिछले पांच दशक में जर्मन विकास सहयोग के माध्यम से वह स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण, लघु तथा मध्यम उद्यम विकास, अवसंरचना विकास, आर्थिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की भरपूर मदद कर रहा है। व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत-जर्मन सहयोग द्विपक्षीय भागीदारी के सबसे गतिशील पहलुओं में से एक है। यही वजह है कि भारत-जर्मन सहयोग में उद्योग आधारित व्यवसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण को विशेष महत्व दिया जा रहा है और भारत उसका पर्याप्त लाभ उठा रहा है। इस सहयोग से भारतीय अर्थव्यवस्था को विभिन्न क्षेत्रों में कुशल श्रम बल प्राप्त हो रहा है। 31 मई, 2011 को नई दिल्ली में व्यवसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण के सहयोग के लिए ही भारत-जर्मन अंतर शासकीय आयोग की बैठक हुई थी। उल्लेखनीय है कि 2001 में भारत और जर्मनी के बीच व्यापार संबंधों के सरलीकरण के बारे में जानकारी के प्रसार के उद्देश्य से जीआइआरटी यानी जर्मन-इंडिया राउंडटेबल की स्थापना हुई। जीआइआरटी नियमित औपचारिक बैठकों के माध्यम से भारत-जर्मनी के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के साथ सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है। आपसी कारोबार पर गौर करें तो भारत जर्मनी से मशीनें, वायुयान, रसायन, तकनीकी वस्तुएं, सिंथेटिक सामग्री और रसायन आयात करता है और धातु उत्पाद, रसायन और औषधि उत्पाद, कपास, कपड़ा, चर्म और चर्म उत्पाद इत्यादि निर्यात करता है। इससे दोनों देशों का व्यापार तेज गति से बढ़ रहा है। भारत से जर्मनी को भेजे जाने वाले सामग्रियों में सूचना प्रौद्यौगिकी से जुड़ी वस्तओं के निर्यात में भारी वृद्धि हुई है। गत वर्ष जर्मनी की एक महत्वपूर्ण समाचार पत्रिका ‘डेर स्पीजले’ ने जर्मन साफ्टवेयर कंपनियों द्वारा अपतटीय विकास के लिए भारत को प्रथम देश के रुप में चिंहित किया। भारत में जर्मन निवेशकों की अभिरुचि लगातार बढ़ रही है। भारत में तकरीबन 1800 जर्मन कंपनियां काम कर रही हैं। भारत सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मामले में सर्वोत्तम आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बीएमडब्लू, फिनचर, एलियांज, बाॅश, ड्यूक बैंक, बायर, फाॅक्स बैगन और कार्ल जेइस जैसी अनगिनत कंपनियां भारत में स्थापित हैं। वह अपना भरपूर कारोबार कर रही हैं। इस मामले में भारतीय कंपनियां भी पीछे नहीं है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के एक आंकड़े के मुताबिक भारत ने जर्मनी में 40 से अधिक परियोजनाओं की पहल की है जिनमें से दो दर्जन से अधिक साफ्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हैं। भारतीय कंपनियां या तो जर्मन कंपनियों का अधिग्रहण कर रही हैं या जर्मनी में अपनी फ्रेंचाइची स्थापित कर रही हैं। इन प्रमुख कंपनियों में ग्रेफाइट इंडिया, टाटा आटो कंपोनेंट सिस्टम, रेनबैक्सी, डा0 रेडी लैब्रोट्रीज एनआइआइटी, महिंद्रा एंड महिंद्रा का नाम विषेश रुप से उल्लेखनीय हैं। जर्मनी में 200 से अधिक भारतीय कंपनियों के दफ्तर हैं। इन कंपनियों ने वहां 7 अरब डाॅलर से अधिक का निवेश किया है। अगर जर्मनी में भारत की सभी कंपनियों के कर्मचारियों की संख्या गिना जाए तो यह 30 हजार के आसपास ठहरती है जो रोजगार के क्षेत्र में यह एक नई संभावना है। चूंकि भारत ने बीमा क्षेत्र में एफडीआइ बढ़ाने के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी आर्थिक सुधार को गति दी है इससे जर्मनी की भारत में अभिरुचि बढ़नी तय है और वहां के निवेशक भारत में पैसा लगाने को जरुर प्रेरित होंगे। अगर वे निवेश के प्रति उन्मुख होते हैं तो निःसंदेह भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। दोनों देश पहले ही बहुप्रतिक्षित भारत-यूरोपिय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं और एक स्वर में उच्च शिक्षा में संयुक्त अनुसंधान व हरित उर्जा समेत अन्य मसलों पर रचनात्मक भूमिका निभाने को तैयार है। उल्लेखनीय है कि इस समय जर्मनी में 14000 भारतीय छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और जर्मनी के 800 छात्र भारत में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच 150 संयुक्त शोध प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। जर्मनी ने 2014 में वैश्विक नजाकत को समझते हुए परमाणु सामग्री नियंत्रण व्यवस्था में भारत को एक पूर्णकालिक सदस्य के रुप में स्थान दिलाने के लिए जमीन तैयार करने और भारत में हरित उर्जा गलियारा स्थापित करने के लिए एक अरब यूरो यानी 7000 करोड़ रुपए उपलब्ध कराने का एलान पहले ही कर चुका है। इससे अक्षय एवं गैर परंपरागत स्रोतों से प्राप्त बिजली के ट्रांसमिशन की व्यवस्था में भारत को मदद मिलेगी। भारत और जर्मनी 2001 से सामरिक साझेदार हैं और भारत को इसका निरंतर फायदा मिल रहा है। याद होगा 2015 अप्रैल में प्रधानमंत्री मोदी की जर्मनी यात्रा के तुरंत बाद जर्मन चांसलर एंजेला मार्कल भारत आयी थी और उस दौरान दोनों देशों के बीच 18 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। तब जर्मनी ने विज्ञान और तकनीक क्षेत्र के विकास में योगदान के अलावा सौर उर्जा कार्यक्रम में 2.2 अरब डाॅलर निवेश की हामी भरी थी। देखें तो इन वर्षों में भारत और जर्मनी दोनों ही अपने वादे की कसौटी पर खरा उतरे हैं और दोनों देशों के बीच भरोसे की जमीन मजबूत हुई है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




