लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷फरवरी 2017 के अंतिम सप्ताह में मणिपुर विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए पहली बार इंफाल जाना हुआ, तो मणिपुर की आबोहवा से परिचित हमारे परिचितों ने ताकीद की थी कि ज्यादा रिपोर्टिंग होटल में बैठकर ही कीजिएगा। इधर-उधर जाकर जोखिम उठाने की जरूरत नहीं है। वास्तव में इधर-उधर जाना तब इतना आसान भी नहीं था। क्योंकि उन्हीं दिनों यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) द्वारा लागू की गई आर्थिक बंदी (इकोनामिक ब्लाकेड) चल रही थी। मणिपुर के इतिहास की यह सबसे लंबी, यानी 139 दिनों की आर्थिक बंदी तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा गए दो नए जिले सदर हिल्स एवं जिरीबाम के गठन के निर्णय का विरोध करते हुए शुरू की गई थी। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2 एवं 37 पर शुरू इस आर्थिक बंदी का ही परिणाम था कि इन दोनों राजमार्गों पर ट्रकों की मीलों लंबी कतारें लग गई थीं, और मणिपुर में जीवनोपयोगी वस्तुएं भी नहीं पहुंच पा रही थीं। डीजल-पेट्रोल तो सोने के भाव पानी की बोतलों में भरकर ब्लैक में बेचे जा रहे थे। अमूमन तो टैक्सियां मिलनी ही मुश्किल थीं, मिलती भी थीं तो दो से तीन गुना किराए पर। ऐसी ही एक टैक्सी लेकर एक बार भारत-म्यांमार को जोड़नेवाले मोरे बार्डर पर जाने की हिम्मत जुटाई, तो लौटते हुए अंधेरा होने लगा (पूर्वोत्तर में वैसे भी अंधेरा जल्दी हो जाता है)। एक जगह अचानक कुछ युवाओं का एक झुंड सामने आ गया और गाड़ी रोक दी। मेरे साथ चल रहे एक स्थानीय पत्रकार साथी ने झटके से मेरे मोबाइल फोन मेरे हाथ से नीचे पैर के पास गिरा दिया। ताकि मोबाइल पर उन युवाओं की नजर न पड़ जाए। मेरे साथी कुछ देर स्थानीय भाषा में उन लोगों से कुछ बहस करते रहे। उन्हें कुछ समझाते रहे। फिर कुछ ले-देकर हमें आगे बढ़ने की अनुमति मिली। यह था 2017 तक का मणिपुर।
कुछ वर्ष पहले तक इससे बहुत अलग तस्वीर पूर्वोत्तर के किसी राज्य की नहीं थी। त्रिपुरा के भी कई क्षेत्रों में काफिला बनाकर आगे-पीछे सुरक्षाबलों के वाहनों के संरक्षण में गाड़ियां छोड़ी जाती थीं। 2015-18 के बीच जब भाजपा के तत्कालीन त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर वहां वर्षों से होते आ आर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के बलिदान की नींव पर भाजपा का संगठन खड़ा करने में लगे थे, तो उनके अनेक साथियों को सीपीआईएम की हिंसा में अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी। तब भी किसी को कल्पना नहीं थी कि त्रिपुरा से करीब ढाई दशक पुराना सीपीआईएम का कुशासन खत्म हो सकेगा। लेकिन 2018 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के परिणाम तो चकित करने वाले थे। सीपीआईएम के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की सरकार जा चुकी थी, और कांग्रेस का तो सफाया हो गया था। अब पांच वर्ष बाद फिर उसी त्रिपुरा में पहले से कुछ कम सीटों के साथ भाजपा की सरकार बनने जा रही है। निश्चित रूप से कुछ गलतियां भी हुई हैं भाजपा सरकार से। नहीं तो ये सीटें भी शायद कम नहीं होतीं। मणिपुर और असम में तो पिछले साल ही भाजपा सरकार की दूसरी पारी शुरू हो चुकी है। नगालैंड में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बनने जा रही है। यानी वह पूर्वोत्तर, जो मतांतरित ईसाई बहुल होने के कारण कभी कांग्रेस की स्थायी संपत्ति माना जाता था, अब पूरी तरह से भाजपा की मुट्ठी में आया दिखाई दे रहा है।
इसका कारण है केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद वहां हो रहा विकास। किसी भी राज्य की आम जनता आमतौर पर शांतिप्रिय होती है। वह चैन से रहना चाहती है। अपना रोजी-रोजगार करके अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहती है। कुछ वर्ष पहले तक ये अवसर ही पूर्वोत्तर में मौजूद नहीं थे। वहां सरकार से ज्यादा सक्रिय तो ईसाई मिशनरियां थीं, जिनके अहसान तले दबकर लगभग पूरा पूर्वोत्तर मतांतरित हो चुका है। न रेल की सुविधा थी, न हाइवे थे। हवाई मार्ग भी इतने टेढ़े-मेढ़े, कम और खर्चीले थे कि आम आदमी उनका उपयोग करने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। पहले की सरकारें जहां पूर्वोत्तर को भारत से अलग-थलग समझकर उनके साथ एक सौतेला सा व्यवहार करती आई थीं, वहीं मोदी सरकार ने इस क्षेत्र को अपनी ताकत समझा और उस पर ध्यान देने के लिए ही ‘लुक ईस्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ जैसी नीतियां बनाईं। पहले जहां पूर्वोत्तर को वर्षों किसी प्रधानमंत्री के दर्शन नहीं होते थे, वहीं पिछले नौ वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी पूर्वोत्तर की अनगिनत यात्राएं कर चुके हैं। कभी किसी नई योजना का शिलान्यास करने के बहाने, तो कभी उसी योजना का लोकार्पण करने के बहाने। उनके मंत्रिमंडल को भी साफ निर्देश है कि हर 15 दिन में कोई न कोई मंत्री पूर्वोत्तर के दौरे पर जरूर जाएगा। और इसका पालन भी हो रहा है। जब हर 15 दिन पर कोई मंत्री पूर्वोत्तर के किसी न किसी राज्य में जाता है, तो कुछ न कुछ देकर ही आता है। या पहले घोषित अपने विभाग की किसी योजना की समीक्षा करके आता है। इससे पूर्वोत्तर की सरकारों और वहां की अफसरशाही में भी चेतना बनी रहती है, और काम आगे बढ़ता रहता है। इसी सक्रियता का परिणाम है कि पहले जहां पूर्वोत्तर के सिर्फ दो राज्य रेल नेटवर्क से जुड़े थे, वहीं आज वहां के सभी राज्य रेल नेटवर्क से जुड़ गए हैं। हाइवेज इतने अच्छे बन गए हैं कि अरुणाचल प्रदेश में भी अब रेसिंग कारें और मोटरसाइकिलें दौड़ती देखी जा सकती हैं। इनमें से ऐसा कोई राज्य नहीं है, जो विमान सेवा से न जुड़ा हो। भाजपा इन मल्टीमोड संपर्कों को हीरा (HIRA) कहकर संबोधित करती है। यानी एच से हाइवे, आई से आईवे (इंटरनेट), आर से रोडवे और ए से एयरवे।
लेकिन ये विकास तभी संभव था, जब सबसे पहले पूर्वोत्तर में चल रहे अलगाववाद और आतंकवाद पर काबू किया जाता। स्थायी रूप से इस समस्या को निर्मूल करने का जो काम कभी अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने शुरू किया था, मोदी सरकार ने पहले पांच वर्ष इसी असंभव से लक्ष्य को पाने में लगाए। विभिन्न अलगाववादी समूहों से संपर्क करना। उनसे आमने-सामने बैठकर बात करना। उनका पक्ष सुनना। जायज बातें मानना और नाजायज को दृढ़तापूर्वक मना करना। जहां जरूरत हो पैकेजेज देना। यही नहीं, किसी भी तरीके से उद्दंडता न छोड़ने वाले आतंकी समूहों के कैंपों को पड़ोसी देशों की जमीन पर जाकर भी नष्ट करना। इन तरीकों का ही परिणाम है कि अब पूर्वोत्तर में चल रहे केंद्र और राज्य के विकास कार्य निर्बाध पूरे हो पा रहे हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े इन विकास कार्यों का सीधा लाभ अब वहां की स्थानीय जनता को मिल रहा है तो पर्यटकों की संख्या भी बढ़ने लगी है। इसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों को मिल रहा है। उनकी रोजी-रोजगार के साधन बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर इन चुनावों में बहुत बड़ी भूमिका वह लाभार्थी वर्ग भी निभा रहा है, जो मोदी सरकार द्वारा खुलवाए गए जन-धन खातों के जरिए देशभर में लाभान्वित हो रहा है। पहले तो इस प्रकार का लाभ आधा-तिहाया ही लोगों तक पहुंच पाता था, या वह भी नहीं पहुंचता था। यहां तक कि ये चुनाव परिणाम इस बात के भी संकेत हैं कि अब ईसाइयत में मतांतरित हो चुका वहां का बड़ा जनजातीय समुदाय भी किसी धर्मगुरु या किसी सरकार के बहकावे में आकर अपने हितों से मुंह मोड़नेवाला नहीं है। वह भले ही किसी भी मत का माननेवाला हो। लेकिन मतदान वह स्वहित को ध्यान में रखकर ही करेगा।

÷लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र के ब्यूरो इन चीफ़ हैं÷



