लेखक~सुभाषचंद्र
सुप्रीम कोर्ट ED Director संजय कुमार मिश्रा पर सवाल करेगा तो ख़ुद को भी कई सवालों के जवाब देने पड़ेंगे
♂÷कल सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल ने ED Director संजय कुमार मिश्रा को दिए गए तीसरी बार सेवा विस्तार को लेकर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
इससे जनमानस में ग़लत सन्देश जा सकता है कि क्यों न्यायाधीश महोदय ईमानदार व बेहद सख़्त अधिकारी के रुप में ख्यातिप्राप्त संजय कुमार मिश्रा के सेवा विस्तार पर केन्द्र सरकार को इतना आड़े हाथों ले रहे हैं जबकि अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार का विषय है न कि न्यायालय का और संजय मिश्रा के नेतृत्व में ईडी देशभर में बेईमान भृष्टाचारियो के विरुद्ध निर्णायक कार्यवाही में दिन रात एक किये हुए है?
बेंच ने ASG तुषार मेहता पर बरसते हुए पूछा कि “क्या संगठन में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो उनकी जिम्मेदारी निभा सके? क्या कोई व्यक्ति इतना जरूरी हो सकता है कि उसके बिना काम ही नहीं हो सके?” तुषार मेहता को बेंच ने यह भी कहा कि आपके हिसाब से प्रवर्तन निदेशालय में कोई अन्य व्यक्ति योग्य नहीं है, एजेंसी का 2023 के बाद क्या होगा जब वह रिटायर होंगे”
तुषार मेहता ने बहुत समझाया कि मिश्रा का सेवा विस्तार प्रशासनिक कारणों से जरूरी है और STF द्वारा भारत के आकलन के लिए महत्वपूर्ण है, धनशोधन को लेकर भारत के कानून की अगली समीक्षा 2023 में होनी है और यह सुनिश्चित करने के लिए निदेशालय में नेतृत्व की निरंतरता महत्वपूर्ण है कि भारत की रेटिंग नीचे ना गिरे”
मगर बेंच का कहना था कि हमने 2021 के आदेश में साफ़ कहा था कि सेवा विस्तार रिटायर होने के बाद छोटी अवधि के लिए दिया जाए और मिश्रा को आगे कोई विस्तार देने के लिए मना किया था –
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एक बात को समझने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं कि यह सरकार को फैसला लेने का अधिकार है कि किस व्यक्ति की नियुक्ति की जाए और कब तक उसे नौकरी में रखा जाए – आप सरकार के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने की कोशिश क्यों करना चाहते हैं -क्या
सरकार हर विषय पर कुछ करने से पहले आपकी अनुमति लेगी।
यदि सुप्रीम कोर्ट संजय कुमार मिश्रा की नियुक्ति और सेवा विस्तार पर सवाल करेगा तो उसे भी कुछ सवालों के जवाब देने होंगे।
आखिर ऐसा क्या था जस्टिस हिमा कोहली में जो उन्हें हाई कोर्ट से रिटायर होने के एक दिन पहले 31 अगस्त, 2021 को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त कर दिया गया; क्या और कोई हाई कोर्ट का जज इतना काबिल नहीं था उस समय जिसकी नियुक्ति की जाती।
अभी 14 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश के District Judge रूपेश चंद्र वार्ष्णेय को Retire होने के बाद हाई कोर्ट का जज नियुक्त करने की सिफारिश कर दी; क्या और कोई काबिल पदासीन district judge नहीं थे जो एक retired व्यक्ति की नियुक्ति कर दी आपने।
संजय कुमार मिश्रा पर एतराज करने से पहले यह तो सोचा होता कि वह सरकार में किसी के रिश्तेदार नहीं हैं जबकि आपका कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में 40% जजों की नियुक्ति जजों के परिवारों के सदस्यों की क्यों करता है ? क्या जजों के रिश्तेदारों को छोड़ कर कॉलेजियम को अन्य “योग्य” लोग जज बनने के लिए नहीं मिलते।
आप एक-एक हाई कोर्ट में 3 या 4 वकीलों को जज बना देते हैं जबकि उस हाई कोर्ट में सैंकड़ों वकील प्रैक्टिस कर रहे होते हैं। आखिर क्या पैमाना होता है इतने वकीलों में गिनती के जज बनाने के लिए, कोई भी साधारण व्यक्ति को इस प्रक्रिया में शक हो सकता है कि कहीं कुछ….?
जैसे आप चाहते हैं कि जजों की नियुक्ति में बे – रोकटोक हो, उसी तरह आपको सरकारी नियुक्तियों में सरकार के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।
यह सब जानते हैं कि संजय कुमार मिश्रा के कार्यकाल में ED ने उल्लेखनीय व प्रशंसनीय कार्य किया है जिससे देश के भ्रष्टाचारी खासे परेशान हैं और तमाम बड़े नाम जेल के सलाखों के पीछे जा चुके हैं।आप मिश्रा पर ऊँगली उठा कर उन भ्रष्टाचारियों के साथ खड़े नज़र आ सकते हैं जो माननीय उच्चतम न्यायालय व देशहित में उचित नहीं होगा।
आज जब माननीय चीफ़ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ साहब कई बार भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध कड़े तेवर दिखा चुके हैं और कई बार कह भी चुके हैं कि भ्र्ष्टाचार से कहीं कोई समझौता नही होना चाहिये। तो माननीय न्यायालय को भी यह समझते हुए की सरकार भ्र्ष्टाचार के विरूद्ध एक क़ाबिल व कर्तव्यपरायण अधिकारी के पीछे खड़ी है तो उसको कार्य करने देना चाहिए।कुछ जगहों पर नियम भी शिथिल हो सकते हैं।

(लेखक सुभाष चन्द्र विधिक मामलों के जानकार हैं और यह लेखक के निजी विचार हैं)
लेख माननीय उच्चतम न्यायालय की अवमानना की दृष्टि से नही बल्कि भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध कड़े रुख दिखाने वाले न्यायालय के साथ के लिए है




