लेखक~मुकेश सेठ
बीजापुर सल्तनत के सुल्तान आदिल शाह प्रथम के साथ चाँद बीवी का हुआ था निक़ाह 1580 में सुल्तान की मौत के बाद सल्तनत की घोषित हुई राज्य संरक्षक
अकबर के बेटे मुराद जब चाँद बीवी को परास्त नही कर पाया तब शहंशाह अकबर नें मोर्चा संभालते हुए उनके साथ साज़िश कर करवाई चाँद बीवी की हत्या
♂÷इतिहास में देश के उन मर्दानी योद्धाओं को उनकी सल्तनत-राज्य चलाने व शत्रुओं से बचाने के लिए दिए गए बलिदान,संघर्ष,अकल्पनीय कष्ट और सैन्य नेतृत्व के साथ रणक्षेत्र में जिस प्रकार बड़े बड़े शहंशाहों के सामने भी तनकर लड़े चाहे भले ही वीरगति को प्राप्त हुए किन्तु न तो झुकी न तो टूटी।
ऐसी ही एक चिर स्मरणीया जीवट योद्धा रहीं चाँद बीवी।
जिनकी निपुण युद्ध कला,कौशल ने बार-बार लोगो की पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार किया है, लेकिन उनके द्वारा अपने से अनगिनत बड़े शहंशाह अकबर से भी मातृभूमि की रक्षा व रियाया की सुरक्षा के लिए जो दुस्साहस उन्होंने किया,उनको इतिहास में इतिहासकारों नें वह स्थान नहीं दिया जो पुरुष योद्धाओं को मिलता रहा। मध्यकालीन भारत के इतिहास में ऐसी ही वीरांगना थी ‘चांद बीबी उर्फ़ चांद खातून उर्फ़ चांद सुल्ताना।’
भारत के इतिहास में सिर्फ योद्धाओं का योगदान नहीं बल्कि वीरांगनाओं का भी उतना ही योगदान रहा है। इतिहास में वीरांगनाओ का योगदान अतुल्यनीय है पर इस पितृसत्तात्मक समाज से वे भी कैसे अछूती रहती।
मध्यकालीन भारत के इतिहास में ऐसी ही वीरांगना थी ‘चांद बीबी उर्फ़ चांद खातून उर्फ़ चांद सुल्ताना।’ उनका जन्म सन् 1500 में अहमदनगर (अब महाराष्ट्र में) हुआ था। चांद बीबी के पिता अहमदनगर के तीसरे शासक हुसैन निज़ाम शाह थे। इनकी मां खुंजा हुमायूं एक घरेलु महिला थी, लेकिन बचपन में पिता की अचानक मौत के बाद उनका राज-काज उनकी मां ही देखती थी। बचपन में अच्छी घुड़सवार के रूप में मशहूर होने वाली उन्होंने फारसी, अरबी और मराठी भाषा में भी अपना प्रभुत्व हासिल किया
उनके पिता की मौत के कारण 14 साल की उम्र में ही इनका विवाह बीजापुर सल्तनत के अली आदिल शाह प्रथम से कर दिया गया था। शादी के बाद वह अपने पति के साथ राज्य और सेना के काम को भी देखती। 1580 में आदिल शाह की मौत के बाद उनकी गद्दी पर बैठने वालो में होड़ मच गई। आखिरकार अली आदिल शाह के भतीजे इब्राहीम आदिल शाह को बीजापुर की गद्दी पर बैठाया गया और चांद बीबी को राज्य-संरक्षक का ओहदा मिला। इस बीच उनके विश्वसनीय मंत्री कमाल खान ने चांद बीबी को उनके ओहदे से हटाने की कई कोशिशें की। आखिरकार उसने सुल्तान इब्राहिम को गद्दी से हटाकर उन्हें और चांद बीबी को जेल में डालकर खुद सुल्तान बन गया। लेकिन वह अपनी भी गद्दी नहीं बचा पाया और चांद बीबी द्वारा नियुक्त किए गए इख्लास खान ने तानाशाही लागू कर दी। राज्य को कमज़ोर होता देख पड़ोसी राज्यों ने बीजापुर पर हमला कर दिया जिसके बाद इख़्लास खान को एकबार फिर चांद बीबी की शरण में जाना पड़ा। चांद बीबी ने इस हमले से बचने के लिए मराठाओं की मदद ली।
इसी बीच चांद बीबी के पिता के राज्य अहमदनगर के निज़ाम की हत्या कर दी गई, साथ ही उनके भाई को मुगल सल्तनत के राजकुमार मुराद ने मार डाला। वहां की गद्दी पर जब संकट गहराया तो वह अहमद नगर को रवाना हो गई। औरतें चाहे जहां भी हो, जिस भी हाल या स्थिति में हो लेकिन शादी होने के बाद भी वे अपने परिवार पर आई मुसीबतों का हल खोजने की कोशिश ज़रूर करती हैं। शादी के बाद ये समाज चाहे जितना उन्हें पराया कहे। ठीक उसी तरह चांद बीबी भी अपने परिवार की परेशानी हल करने के लिए किया। संकट की घड़ी व्यक्ति के धैर्य की परीक्षा की घड़ी होती है, उनके सामने ये दोहरे संकट का समय था जिसका उन्होंने बड़ी सूझ-बूझ और साहस के साथ सामना किया।
दक्षिण भारत के कुछ राज्य युद्ध से पहले ही मुगलों के अधीन हो गए, लेकिन चांद बीबी ने झुकना कहां सीखा था। उन्होंने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया, यह जानते हुए भी कि इसका अंजाम युद्ध ही होगा।
अहमदनगर पहुंचने के बाद उन्हें ख़बर मिली कि ‘मुग़ल सम्राट अकबर’ ,जो कि उस समय उत्तर भारत के शक्तिशाली सम्राट थे ,अपने साम्राज्य को बढ़ाने की लालसा से दक्षिण भारत पर भी फहत हासिल करना चाहते थे। अपने इसी मनसूबे को पूरा करने के लिए उसने अपने दूतों को अहमदनगर समेत दक्षिण भारत के हिस्सों में भेजा। दक्षिण भारत के कुछ राज्य युद्ध से पहले ही मुगलों के अधीन हो गए, लेकिन चांद बीबी ने झुकना कहां सीखा था। उन्होंने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया, यह जानते हुए भी कि इसका अंजाम युद्ध ही होगा। यह उनके स्वाभिमान का ही परिचायक है।
एक महिला द्वारा अकबर जैसे एक शक्तिशाली शासक का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया जाना उसके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। नतीजतन अकबर ने अपने बेटे मुराद को सैन्य बल के साथ अहमदनगर की तरफ कूच करने को कहा। चांद बीबी ने यहां पर अपनी बुद्धिमानी और साहस का परिचय देते हुए अहमदनगर की सेना का नेतृत्व किया। वह अहमदनगर के किले को बचाने में तो सफल रहीं, लेकिन यह सिलसिला यहां कहां थमने वाला था। जब शाह मुराद को लगा कि चांद बीबी नहीं झुकेंगी तो उसने अपने सैन्य बल की संख्या बढ़ाकर युद्ध करने का फैसला किया। इस बड़े आक्रमण को भांप कर एक कुशल सेनानायक की तरह चांद बीबी ने अपने भतीजे इब्राहिम आदिल शाह और गोलकोण्डा के मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह से अपील की कि दोनों साथ मिल जाएं ताकि मुगलों की विशाल सेना का सामना किया जा सके।
चांद बीबी की योजना के अनुसार इब्राहिम को अपने साथी सोहेल खान के साथ मिलकर 25,000 लोगों का एक सेना तैयार करनी थी। ऐसा करने के साथ ही चांद बीबी की ही सलाह पर येख्लास ख़ान की शेष सेना के साथ गठबंधन कर लिया गया और मुहम्मद कुली क़ुतुब शाह की सेना के 6,000 सैनिकों को अपनी सेना में शामिल कर लिया। इन सारी कुटनीतियों की मदद से चांद बीबी के युद्ध कौशल और नेतृत्व क्षमता का पता चलता है।
इन सैनिकों के मिलने से चांद बीबी के पास एक अच्छी सेना तैयार हो गई जो मुगलों को मात देने में सक्षम थी। लेकिन दुर्भाग्य से उनका विश्वसनीय सेनापति मुहम्मद खान मुगलों से मिल गया और युद्ध की सारी रणनीति मुगलों को बता दी। लेकिन दक्कन की यह सेना इतनी मज़बूत हो गई थी कि आक्रमण का अगला प्रयास खुद सम्राट अकबर ने किया। इस बीच चांद बीबी को हटाने के कई षड्यंत्र जारी थे, उनकी सेना अस्थिर थी। किसी ने यह बात फैला दी कि चांद बीबी मुगलों से युद्ध की जगह बातचीत करने का विकल्प चुन रही हैं। जब यह बात फैल गई कि चांद लड़ाई की तैयारी नहीं कर रही तो सेना और रईसों ने उन्हें उखाड़ फेंकने की साजिश रची और उनकी हत्या कर दी। चांद बीबी को अपनों से धोखा मिला। उन पर अकबर ने विजय प्राप्त कर ली थी फिर भी वह उनकी वीरता, साहस और युद्ध कौशल का प्रशंसक बन गया गया।शत्रुओं को नाकों चने चबवा देने वाली चांद बीबी युद्ध भले ही हार कर वीरगति को प्राप्त हुईं हों पर उनका नाम इतिहास में एक वीरांगना के रूप में अमिट-अमर हो गया जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को प्रेरणा देती रहेगी।
हालांकि इतिहास प्रेमियों को सदैव कसक व दर्द रहेगा कि इतिहासकारों की क़लम नें उनको क्यों नही और पन्ने दिए जिसकी वह बेहद माकूल हक़दार थी।





