लेखक~मुकेश सेठ
छत्रपति शिवाजी महाराज के परम प्रतापी सुपुत्र राजे सम्भाजी महाराज की आज है जन्मतिथि, स्मरण कर रहा राष्ट्र
23 वर्ष की उम्र से ही सम्भाजी नें मुग़लों के ख़िलाफ़ 69 और पुर्तगालियों के विरुद्ध 15 युद्ध में विजय हासिल कर पिता शिवाजी महाराज के द्वारा छोड़े गए साम्राज्य का किया था विस्तार
सम्भाजी महाराज की हत्या के बाद बादशाह औरंगजेब नें कहा कि था कि अगर मेरे 4 बेटों में से एक भी तुम्हारे जैसे तो हिंदुस्तान कब का मुग़ल सल्तनत में समा चुका होता
♂÷वर्ष 1680 में जब मुग़ल बादशाह औरंगजेब को पता चला कि छत्रपति शिवाजी महाराज का देहांत हो गया है तो वो दक्षिण जीतने की इच्छा लिए आगरा से उठकर मराठों की वीर भूमि औरंगाबाद पहुंच गया। औरंगजेब को एक दिन निजामशाही और दो दिन आदिलशाही को खत्म करने में लगे लेकिन रणक्षेत्र में सामना होना था 23 साल के नए छत्रपति शूरवीर संभाजी से।
उस समय औरंगजेब दुनिया का सबसे ताकतवर बादशाह माना जाता था। वो ना सिर्फ दुनियां के सबसे बड़ा भू-भाग पर हुक़ूमत कर रहा था बल्कि उसके पास दुनियां की सबसे बड़ी पांच लाख की सेना थी।
औरंगजेब इतना क्रूर बादशाह था कि उसका छोटा बेटा मोहम्मद अकबर उसकी क्रूरता से तंग आकर सम्भाजी महाराज की शरण में जा पहुँचा था,जिसे सम्भाजी नें अपने दरबार में स्थान दिया था।
अगले 9 सालों में वीर संभाजी महाराज ने पुर्तगालियों के खिलाफ 15 और मुगलों के खिलाफ 69 छोटे-बड़े युद्ध जीते थे। मराठा साम्राज्य की जो सीमा उनके पिता छत्रपति शिवाजी महाराज छोड़ कर गए थे वो उससे कई गुना बढ़ाकर आगे ले जा चुके थे। गुजरात से लेकर गोवा तक भगवा फहरा रहा था। साल 1689 में सगे साले की गद्दारी के चलते छत्रपति सम्भाजी महाराज अपनी पत्नी और बच्चे समेत बंधक बनाए गए।उन्हें जोकर के कपड़े पहनाकर परेड कराते हुए मुगल खेमे में लाया गया।
बादशाह औरंगजेब ने जिंदा रहने के लिए उनके सामने दो शर्त रखी, पहला पूरा मराठा साम्राज्य मुगलों को सौंप दिया जाए या इस्लाम स्वीकार कर लिया जाए। बंधक बने संभाजी का जवाब था अगर औरंगजेब अपनी बेटी की निकाह भी मुझसे करा दे तो भी इस्लाम स्वीकार नहीं करूंगा।
इसके बाद शुरू हुआ तीन सप्ताह तक चलने वाला बेइंतहा अत्याचार, पहले ही दिन उनकी दोंनो आंखें फोड़ी गई, इसके बाद उनकी जीभ काटी गई,हाथ पैर की उंगलियों के नाखून उखाड़ दिए गए, फिर खाल उतारी गई अंत में तीसरे हफ़्ते उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिया गया।
औरंगजेब इसके बाद करीब 20 साल मराठों का खत्म करने का सपना लिए औरंगाबाद में ही पड़ा रहा फ़िर भी दुनियां की सबसे बड़ी सेना वाले बादशाह हिन्दू पदपादशाही समाप्त नहीं कर पाया।
औरंगजेब के मरने के 40 साल बाद पेशवाओं ने जरूर मुगल बादशाहों को पेंशन पर रखा और उनकी रक्षा की। मराठों एवं अंग्रेजों में वर्ष 1684 में जो समझौता हुआ, उसमें छत्रपति संभाजी महाराज ने एक ऐसी शर्त रखी थी कि अंग्रेजों को मेरे राज्य में दास (ग़ुलाम) बनाने अथवा ईसाई धर्म में दीक्षित करने हेतु लोगों का क्रय करने की अनुज्ञा नहीं मिलेगी
परमवीर और अपने धर्म पर मर मिटने वाले सम्भाजी महाराज के लिए लिखा गया कि
~ देश धरम पर मिटने वाला शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी एक ही शंभू राजा था।।
तेजपुंज तेजस्वी आंखें निकल गयीं पर झुका नहीं।
दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।
दोनों पैर कटे शंभू के ध्येय मार्ग से हटा नहीं।
हाथ कटे तो क्या हुआ सत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।
जिह्वा कटी खून बहाया धरम का सौदा किया नहीं।
वर्ष तीन सौ बीत गये अब शंभू के बलिदान को।
कौन जीता कौन हारा पूछ लो संसार को।।
मातृभूमि के चरण कमल परजीवन पुष्प चढ़ाया था।
है राजा दुनिया में कोई जैसा शंभू राजा था।।’ –
संभाजी द्वारा औरंगजेब को लिखा पत्र
“बादशाह सलामत सिर्फ मुसलमानों के बादशाह नहीं हैं। हिंदुस्तान की जनता अलग-अलग धर्मों को मानने वाली है उन सबके भी वह बादशाह हैं।वो जो सोच कर दक्कन आये थे, वो मकसद पूरा हो गया है, इसी से संतुष्ट होकर उन्हें दिल्ली लौट जाना चाहिए। एक बार हम और हमारे पिताजी उनके कब्ज़े से छूट कर दिखा चुके हैं, लेकिन अगर वो यूं ही ज़िद पर अड़े रहे, तो हमारे कब्ज़े से छूट कर दिल्ली नहीं जा पाएंगे। अगर उनकी यही इच्छा है तो उन्हें दक्कन में ही अपनी क़ब्र के लिए जगह ढूंढ लेनी चाहिए।”
संभाजी की नृशंस हत्या के बाद बादशाह औरंगजेब ने कहा था कि
अगर मेरे चार बेटों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता, तो सारा हिंदुस्तान कब का मुग़ल सल्तनत में समा चुका होता।”
आज देश, वीर शिरोमणि अमर बलिदानी शम्भाजी महाराज के जन्मतिथि पर उन्हें सत सत नमन कर रहें हैं।
÷लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं÷




