लेखक~मुकेश सेठ
“बिना खड्ग बिना ढाल”नही अनगिनत क्रांतिकारियों ने शीश कटवाए,फाँसी पर झूले,अंग्रेजी गोलियों से छाती तोड़वाये,सर्वोच्च कुर्बानी दी तब जाकर मिली आज़ादी,वह भी खण्डित देश के रूप में
♂÷भारत को ब्रिटिश दासता से खण्डित आज़ादी “बिना खड्ग बिना ढाल” के मायावी तराने से नही मिली बल्कि अनगिनत माँ भारती के अमर बलिदानी ज्ञात अज्ञात सपूतों और कन्धा से कन्धा मिलाकर उस हुकूमत को देश से भागने पर मजबूर कर दिया जिसके बारे में कहा जाता था कि अंग्रेजी राज में सूरज कभी नही डूबता।
देश के कथित इतिहासकारों ने शायद सत्ता के दरबार में लेटकर इतिहास लिख डाला होगा अन्यथा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने तक करोड़ भर से ऊपर क्रांतिकारियों ने फांसी पर झूले,गोली के आगे छाती तोड़ी या शीश कटवाए तो शौर्या महिलाओं ने भी प्राणों की बलि दी है।
मगर दुर्भाग्य देश का यह है कि असल क्रांतिकारियों को इतिहास के पृष्ठों से ग़ायब कर दिया गया या फ़िर न के बराबर जगह दी गयी।
ऐसे ही रणबांकुरी महिला क्रांतिकारी भी हुई है जिनके संघर्ष से दहशत में आ चुकी ब्रिटिश कम्पनी सरकार ने उनको बांध कर आग में जिंदा जला डाला था।
मेजर सॉयर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने अक्टूबर, 1857में स्वतंत्रता के पहले युद्ध के दौरान भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा मुक्त किए गए मुजफ्फरनगर के एक शहर थाना भवन पर हमला किया। वे यह देखकर चकित रह गए कि अपने यूरोपीय समकक्षों के विपरीत, शहर के आसपास के गांवों में महिलाएं सशस्त्र लड़ाइयों में सक्रिय रूप से भाग ले रही थी।
महिलाओं को आतंकित करने के उपाय के रूप में मेज़र सॉयर ने तमाम उपाय अपनाकर अदम्य साहसी व महिला क्रांतिकारियों में आज़ादी की ज्वाला भड़काने और अंग्रेजों के दाँत खट्टे करने में जुटी असगरी बेगम को पकड़ लिया, जो अंग्रेजों से लड़ने के लिए महिलाओं के दल को तैयार कर रही थी और अंग्रेजों ने उसको पकड़कर सार्वजनिक रूप से जिंदा जला दिया जिससे कि क्रांतिकारियों में दहशत व्याप्त हो सके।
अखण्ड भारत की इस लाडली बेटी असगरी बेग़म के अप्रतिम बलिदान को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के तहत सुनहरे शब्दों में लिखा जाना चाहिए था किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से उनके बारे में बेहद ही कंजूसी के साथ इतिहाकारो ने क़लम की स्याही ख़र्चे है।
मालूम हो कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ की बेगम हजरत महल ने जहां विदेशी शासकों के खिलाफ सेनाओं का नेतृत्व किया, वहीं मुजफ्फरनगर में ग्रामीण महिलाओं ने ब्रिटिश सेना से लड़ने के लिए खुद को सशस्त्र रूप में संगठित किया था।
असगरी बेगम के नेतृत्व में इन ग्रामीण महिला क्रांतिकारियों से मुँह की खा रहे मेज़र सॉयर ने सोचा कि असगरी को सार्वजनिक रूप से सबसे भयानक तरीके से मारकर वह भारतीय क्रांतिकारी महिलाओं में डर पैदा कर क्रांति की भड़क रही ज्वाला को शांत करनें में कामयाब हो सकता है लेकिन वह गलत था।
मुजफ्फरनगर के अन्य हिस्सों में महिला क्रांतिकारी हबीबा और जमीला ने मातृभूमि की सेवा के लिए महिलाओं को हथियार उठाने के लिए राजी किया। इन दोनों को भी बाद में अंग्रेजी द्वारा पकड़ लिया गया और फांसी पर लटका दिया गया।
इसके बाद भी निडर होकर अंग्रेजी ताकतों से लोहा लेती रही और वीरगति को प्राप्त किया जिनमें बीबी, नूरी, रहीमी, रनबेरी, शोभा देवी, उमुदा, राज कौर और कई बहादुर महिलाओं ने लड़ते हुए युद्ध के मैदान में अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए।
ज़ालिम अंग्रेजी सत्ता ने मातृभूमि की सेवा में शस्त्र उठाने के लिए मम कौर, भगवानी और आशा देवी को भी फांसी पर लटका दिया।
ये सैकड़ों महिला क्रांतिकारियों में से कुछ नाम हैं जो अंग्रेजों द्वारा क्रूर दमन और बाद में भारतीयों की उपेक्षा के बाद भी हमारे रिकॉर्ड में दर्ज हैं। यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है कि हम उनके नाम राष्ट्रीय चेतना से न मिटने दें और अपने देश के साथ ही दुनियां को बताएं कि हमारी जंगजू महिलाओं ने अपने नेतृत्व में शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य से जमकर लोहा लिया और सर्वोच्च बलिदान भी निर्भीक होकर दिया।

÷लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं÷




