लेखक~मुकेश सेठ
क्रांतिकारी जमींदार पति को धोखे से अंग्रेजों द्वारा बलिदान कर दिए जाने से अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध रणभूमि में उतर पड़ी थीं अहिरानी जिरियावती जी
♂÷जालिम ब्रिटिश हुकूमत से दो/दो हाथ कर लोहा लेने में हिन्द के लाल ही नही बल्कि भारत की भूमि को अपने लहू से सींचकर स्वतंत्रता दिलाने में अप्रतिम वीरता व बलिदान वीरांगनाओं ने भी दिया है।
ऐसी ही एक चिरस्मरणीया वीरांगना अहिरानी जिरियावती देवी जी भी रहीं हैं।
जिन्होंने अपने वीर क्रांतिकारी जमींदार पति का धोखे से अंग्रेजों द्वारा मार दिए जाने पर रणचण्डी का रूप धर लिया था।
अमर बलिदानी जिरियावती देवी जी का जन्म एक संपन्न अहीर परिवार में हुआ था और इनका पाणिग्रहण संस्कार गोविंदपुर गाँव के अहीर जमींदार श्री नरसिंह गोप जी से हुआ था।
सम्पन्न अहीर परिवार मे जन्म लेने के कारण जिरियावती जी के पिता ने इन्हे शस्त्र विधा और घुड़सवारी की शिक्षा बालकाल से ही दिलवाई थी। शादी के बाद इनके पति श्री नरसिंह गोप जी ने अपनी अहिरानी का विशेष ख्याल रखते थे और खाली समय मे बंदूक चलाने की भी शिक्षा देते थे।
नरसिंह गोप जी बड़े रईस थे, आसपास के कई गाँव की जमींदारी उनके अधीन था। स्वतंत्रता आंदोलन में वो काफी सक्रिय रहते थे, जिस वजह से वहां के अंग्रेज अधिकारियों से उनके संबंध ठीक नही थे। उन्होंने अंग्रेज सरकार द्वारा लिए जाने वाले टैक्स को भी देना बंद कर दिया। अंग्रेजों ने इनके जमींदारी गोविंदपुर इस्टेट को जब्त करने का फ़ैसला कर लिया। इलाके में नरसिंह गोप जी बहुत लोकप्रिय थे उन्होंने फिरंगियों को रोकने के लिए छोटा सैन्य दल तैयार कर लिया। इन्ही नागरिक सेना के दम पर वो अपनी जमींदारी संभाल रहे थे।
देश मे 1942 में बम्बई से अगस्त क्रांति आंदोलन प्रारम्भ हुआ ,जिस आंदोलन को भारत छोड़ो आंदोलन भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस आंदोलन के कारण ही अंग्रेजो के पाँव भारतीय सरज़मी से उखड़ गए थे और बर्तानिया हुकूमत पांच साल भी उसके बाद भारत पर शासन नही कर पाए थे, क्योकि अगस्त क्रांति या भारत छोड़ो आंदोलन मे पहली बार महात्मा गांधी ने भी ‘करो या मरो’ का नारा दिया था। जिसमें बड़ी संख्या मे भारत-माता के सपूतों नें अंग्रेजो से लड़े और बड़ी कुर्बानी भी दी।
अंग्रेजो के खिलाफ, भारतीयों ने देशभर में आंदोलन शुरू कर दिया था, इधर भागलपुर में श्री नरसिंह गोप जी ने भी सैकड़ों लोगों की सैन्य दल तैयार कर अंग्रेजो के ठिकानो पर हमला करना शुरू कर दिया। अंग्रेज, श्री नरसिंह गोप जी और जिले के विभिन्न हिस्सों में हो रहे उग्र आंदोलन से परेशान हो गए तो उन्होंने बातचीत करने के लिए नरसिंह गोप जी को बुलाया और यह भी भरोसा दिलाया की उनकी मांगों को पूरा किया जाएगा।
शाम का वक्त था नरसिंह जी अपने साथियो के साथ अंग्रेजी अफसरो से मिलने पहुँचे पर धूर्त फिरंगियों के मन मे कुछ और बात ही चल रही थी, उन्होंने नरसिंह जी और उनके साथियो पर गोलियों की बौछार करवा दी थी।
घायल नरसिंह जी जैसे तैसे अपने घोड़े के साथ वहाँ से निकल गए, खून से लथपथ नरसिंह जी अपने ड्योढ़ी पर पहुँचते है, अपने पति की ऐसी हालत देख पतिव्रता जिरियावती देवी दौड़े पड़ी और उनके पास जाती है। नरसिंह गोप जी ने धर्मपत्नी से बताया कि कैसे उनके साथ अंग्रेजी सरकार ने धोखा किया और छल से गोली मार दिया। इतना कहकर श्री नरसिंह गोप जी ने वीरगति ले ली।
वीरांगना अहिरानी जिरियावती देवी ने अपने बलिदानी पति नरसिंह जी के रक्त से तिलक कर प्रतिज्ञा की कि जब तक भारत माता को फिरंगियों से मुक्त नही मिल जाती तब तक वह चैन से नही बैठेगी।
अगले दिन 24 अगस्त वर्ष 1942 को 16 अंग्रेजी सिपाहियों को अंग्रेजी सरकार ने जिरियावती देवी और उसके पुत्र को गिरफ़्तार करने भेजा परवीरांगना जिरियावती देवी ने ग्रामीणों के साथ मिलकर उनसे मुकाबला किया और अपनी बंदूक से 16 गोरे सिपाहियों को गोली मार दिया। ये घटना आस पास के पूरे इलाके मे फैल गई, क्योंकि आसान नहीं होता एक महिला होने के बावजूद पुरुष प्रधान समाज में विद्रोही बनकर अमर हो जाना। लगभग एक महीने तक जिरियावती देवी जी और गोविंदपुर के लोगो ने अंग्रेजो के नाक मे दम कर दिया था।
21 सितम्बर वर्ष 1942 को रात्रि के समय अंग्रेजों की पुलिस फोर्स ने अचानक गोविंदपुर को घेर गोलीबारी शुरू कर दी, गांव से निकलना मुश्किल था। इसी गोलीबारी के बीच सिर मे गोली लगने से वीरांगना जिरियावती देवी जी भी वीरगति को प्राप्त हो गईं।
वीरांगना जिरियावती देवी जी का नाम गोविंदपुर के लोगो के बीच आज भी अजर अमर है।
ऐसी अहीर वीरांगना को अनन्तिम नमन है जिन्होंने बर्तानिया हुकूमत के बूटों तले रौंदे जा रहे भारत भूमि को स्वतंत्र कराने में अपना सर्वोच्च बलिदान देकर अमरत्व प्राप्य हुईं।

÷लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं÷




