लेखक~राजीव मिश्र
फिल्म की रिव्यू या फीडबैक..यह फीडबैक दो भागों में दूंगा, पहला इसका टेक्नोलॉजिकल और फिल्ममेकिंग एस्पेक्ट, और दूसरा इसका कॉन्टेंट और नैरेटिव एस्पेक्ट, यहां अभी पहला भाग
♂÷जब एनएचएस ज्वाइन किया था तो यहां फीडबैक देने का एक फॉर्मल तरीका समझाया गया था जो परंपरागत भारतीय तरीके से जरा डिफरेंट था. भारत में फीडबैक का सबसे प्रचलित तरीका वही था जो स्कूल में मास्टर साहब की छड़ी के माध्यम से समझाया गया था. फीडबैक हमारे लिए निंदा करने और भड़ास निकालने का अवसर होता है. पर यहां के फॉर्मल फीडबैक का एक फॉर्मेट है और उसे ही फॉलो करूंगा…
फॉर्मेट कुछ ऐसा है …
- What was done well
- What you could have done better or differently.
तो पहले यह निबटा लें कि अच्छा क्या था…ज्यादा है नहीं तो फटाफट हो जायेगा…
सबसे अच्छा है संगीत… हॉल की साउंड सिस्टम में “जय श्री राम राजा राम” और “राम सिया राम” सुन कर ही पैसे वसूल हुए (जितने भी हुए). वापस लौटते हुए कार में रिपीट में वही सुनते हुए वापस आया. आज सुबह सुबह यू ट्यूब पर फिर से सुना. अगर कैसेट्स का जमाना रहा होता तो सबसे पहले यह कैसेट खरीदा होता. मनोज मुंतशिर ने संवाद लिखने में जो डुबाया है वह गीत लिखने में रिडीम कर लिया है. डायलॉग्स तो कम ही हैं. एक्शन ही अधिक है. जो पांच सात डायलॉग आपको फेसबुक पर मीम बनकर घूमते दिख रहे हैं, वे ही छपरी टाइप हैं. बाकी ठीक ठाक हैं. एकाध जगह अच्छे भी हैं… युद्ध शुरू होने से पहले श्रीराम का सेना को संबोधन प्रभावशाली है…
सिनेमा में सबसे कमजोर पक्ष क्या है? पहला, फिल्म की कोई स्क्रीनप्ले नहीं है. बॉलीवुड की फिल्मों में होता भी नहीं है. बॉलीवुड में फिल्म का डायलॉग राइटर होता है, स्क्रीनप्ले राइटर पार्ट टाइमर ही होते हैं. स्क्रीनप्ले के बिना जो फिल्म फैल जाती है वह किसी तरह एडिटिंग में रफू की जाती है. बिना स्क्रीनप्ले के चरित्र वेल डिफाइंड नहीं हो सकते, नहीं ही हुए.
एक्टिंग ने भी निराश “नहीं” किया…सबकी एक्टिंग यूनिफॉर्मली खराब है. प्रभास प्रभास हैं, सैफ अली सैफ अली है. कैरेक्टर चाहे कोई भी हो… हॉल में एक बच्चा चिल्लाया… वो देखो! बाहुबली!! सैफ की एक्टिंग ऐसी है कि आंखें बंद करके उसके डायलॉग सुने जाएं तो पता नहीं चलता कि “रेस” देख रहे हैं या “दिल चाहता है”. अच्छा है कि बाकी के कैरेक्टर्स एनीमेशन में हैं, वे चाह के भी खराब एक्टिंग नहीं कर सकते.
फिल्म मार्वल कॉमिक्स की फिल्मों की तरह है. बीच बीच में कहीं हैरी पॉटर की फैंटास्टिक बीस्ट्स हो जाती है, तो कहीं गेम ऑफ थ्रोन्स…मुझे तो मार्वल की फिल्में भी अच्छी नहीं लगती तो इसके अच्छे लगने का सवाल ही नहीं था. लंबे लंबे एनिमेटेड सीन्स के बजाय वह समय काश इतनी समृद्ध कहानी को एक्सप्लोर करने में लगाया होता. वैसे भी रामायण की कहानी में फैंटेसी के एलिमेंट्स तो हैं ही, लेकिन हमारे लिए वह फैंटेसी ही रियलिटी हो रखी है. तो उस कहानी को फिर से किसी और फैंटेसी के रूप में देखना अटपटा लगता है. लगता है कि फिल्म का स्टोरी बोर्ड किसी दस साल के टेक सेवी बच्चे को दे दिया गया है. फिल्म बाई ए टेन ईयर ओल्ड फॉर ए टेन ईयर ओल्ड बनाई गई है. पर भारत की फिल्मों के स्तर की औसत मानसिक आयु लगभग इतनी ही होती है.
सबसे बड़ा कॉन्ट्रोवर्शियल प्वाइंट... कॉस्ट्यूम. मैं उन लोगों में नहीं हूं जिन्हें रावण के खिलजी या औरंगजेब लगने से आपत्ति हो. बल्कि आज के युग में रावण का खिलजी की तरह दिखना उचित ही है. मुझे लक्ष्मण और श्रीराम के कवच पहनने से भी आपत्ति नहीं है. मैं रामायण को स्ट्रिक्टली रामानंद सागर के रामायण से बंधा हुआ देखने को बाध्य नहीं पाता कि हर चरित्र वैसा ही लगे जैसा हमने एक बार देख लिया है. हमारी पीढ़ी रामानंद सागर के रामायण से बंधी हुई है, उसके लिए इमेज में परिवर्तन आसान नहीं होगा. लेकिन जब भी सिनेमा फिर से बनता है, उसके कैरेक्टर्स की इमेज नए समय के अनुसार थोड़ी मेकओवर होती ही है. मुझे प्रभास का शारीरिक सौष्ठव, बलशाली शरीर प्रभु राम के चरित्र के अधिक अनुरूप लगा. मैं हमेशा यह शिकायत करता हूं कि हम राम और कृष्ण को उनके पराक्रमी योद्धा रूप में देखने से बचते हैं, और तपस्वी और गौपालक रूप में ही देखना चाहते हैं. हमें कृष्ण हमेशा बंसी बजाते ही दिखते हैं, चक्र चलाते नहीं रुचते. मुझे राम का यह पराक्रमी शक्तिशाली मेकओवर अधिक आकर्षक लगा. अपनी अपनी पसंद है...
अंत में सिनेमैटिक एक्सपीरियंस… कुल मिला कर तीन घंटे बिना घड़ी देखे कट गए. मुझे यह फिल्म सिनेमा की दृष्टि से उतनी ही घटिया लगी जितनी बॉलीवुड या साउथ की औसत फिल्में लगती हैं. उससे अधिक नहीं. आरआरआर तो देख ही नहीं पाया था, इसको देखने में कोई सरदर्द नहीं हुआ.
समस्या यह नहीं है कि इस फिल्म में आर्टिस्टिक लिबर्टी ली गई है… विदिन रीजनेबल लिमिट्स, ली ही जानी चाहिए. समस्या यह है कि आर्टिस्टिस्टिक क्रिएटिविटी है ही नहीं. बॉलीवुड में वह टैलेंट ही नहीं है जो इस फिल्म के साथ न्याय कर सके. जैसे गांधी पर फिल्म बनी तो वह एटनबरो ने बनाई, अगर मनमोहन देसाई ने बनाई होती तो कैसी बनी होती? तो क्या रामकथा पर फिल्म बनाने का काम भी किसी एटनबरो, किसी स्पीलबर्ग को आउटसोर्स कर दें? फिलहाल तो जो बॉलीवुड का स्तर है, उस हिसाब से यह फिल्म पार फॉर द कोर्स ही बनी है. औसत है, उतनी ही बुरी है जितनी बॉलीवुड की फिल्में होती हैं. जितनी भव्य रामकथा को होना चाहिए उतनी तो नहीं ही है, जितनी बुरी बताई जा रही है उतनी भी बुरी नहीं है. जिस देश में आरआरआर सुपरहिट होती है, जहां के सुपरस्टार जितेंद्र और मिथुन रहे हैं वहां यह फिल्म ठीकठाक चल ही जायेगी, आश्चर्य नहीं है…

÷लेखक लन्दन में चिकित्सक हैं÷




