लेखक~राजीव मिश्र
आखिरी पोस्ट, इसके कॉन्टेंट और नैरेटिव पर
♂÷फिल्म की कहानी रामकथा के सिर्फ इतने भाग को छूती है… श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनवास के लिए वन में गए. वहां एक राक्षस रावण ने सीता का अपहरण करके उन्हें लंका में ले जाकर रखा. श्रीराम वानरराज सुग्रीव से मिले और उनकी वानर सेना को लेकर लंका पर आक्रमण कर दिया. उन्होंने रावण को मार कर सीता माता को मुक्त करा दिया।
इतने संक्षेप में रामकथा किसे सुनाई जा सकती है? 5-10 वर्ष के बच्चों को. तो इतनी ही कहानी सुनाई गई है और उसको एनीमेशन और वीएफएक्स की सहायता से दिखाया गया है जो 5-10 वर्ष के बच्चों के मानसिक स्तर के ही अनुकूल लगती है. आगे उसमें जो डिटेल्स हैं वे बचकाने हैं और मूल कथा के डिटेल्स से बहुत अधिक भटकते हैं, लेकिन मूल कथा नहीं भटकती. चरित्रों का मूल स्वरूप नहीं भटकता, लेकिन उनका बाहरी स्वरूप बच्चों के कॉमिक्स के कैरेक्टर्स जैसा है.
यह ट्रीटमेंट रामकथा के साथ न्याय करता है? बिल्कुल नहीं करता… पूरी कहानी में कहीं भी रामायण की कथा के किसी भी फिलोसॉफिकल एस्पेक्ट को छुआ भी नहीं गया है. यह कथा कही और सुनी क्यों जानी चाहिए, यह विचार भी नहीं किया गया है. फिल्म से रामकथा की आत्मा गायब है. एक बेहद कॉम्प्लेक्स कथा को उसके सारे nuances के बिना, अत्यधिक सरलीकृत करके कह दिया गया है. डिटेलिंग में बहुत अधिक लिबर्टी ली गई है, जो अनावश्यक ही नहीं अर्थहीन भी है.
पर क्या इसमें मुझे श्रीराम के चरित्र के प्रति श्रद्धा का अभाव दिखा? मैं कहूंगा, नहीं! कथा चाहे कितनी भी सरल करके कही गई है, मूलभाव श्रीराम के प्रति श्रद्धा का, हीरो वरशिप का ही रहा. श्रीराम उज्ज्वल चरित्र के पराक्रमी, शक्तिशाली और न्यायप्रिय ही दिखे, और रावण एक अहंकारी अन्यायी और नीच चरित्र ही दिखा. फेसबुक पर आजकल भक्ति का जो भूचाल आया पड़ा है कि ऐसा लगता है दो चार भक्तगण रोज अपना दायां हाथ काट के भगवान शिव को अर्पित कर देते होंगे और वह अगले दिन वापस उग जाता होगा… और इंद्र का सिंहासन 7.5 रिक्टर स्केल के भूकंप से डोलता ही रहता होगा. इतने प्रचंड भक्ति भाव के स्टैंडर्ड्स पर फिल्म खरी नहीं उतरती है लेकिन मृत्यु लोक के सामान्य विनाशी मनुष्यों के स्टैंडर्ड्स से धर्म के प्रति कोई अश्रद्धा नहीं दिखाई दी.
इस फिल्म में कोई वोक कॉन्टेंट नहीं है. रामकथा को पिछले कुछ समय में वामपंथियों ने जितने भी विवादास्पद प्रसंगों से दूषित किया है, चाहे फेमिनिज्म का नैरेटिव हो, चाहे आर्य-द्रविड़ कॉन्फ्लिक्ट थ्योरी हो, चाहे जाति विमर्श हो या रावण को विक्टिम बनाने या उसके चरित्र को वाइटवॉश करने के प्रयास हों, उन सबको इस फिल्म ने बिल्कुल खारिज कर दिया है. आज की तारीख में किसी फिल्म में वोक कॉन्टेंट न हो तो मैं उसे यूं ही पास मार्क्स दे देता हूं. यह खराब फिल्म मेकिंग तो है लेकिन श्रीराम के अपमान का कोई इंटेंशन मुझे नजर नहीं आया. और अगर खराब फिल्म मेकिंग एक अपराध होता तो बॉलीवुड को सदा के लिए तिहाड़ में शिफ्ट कर दिया जाना चाहिए था.
हो सकता है एक बेहतर फिल्मकार इससे अच्छा प्रयास कर सकता था, पर क्या वह करता? कोई विशाल भारद्वाज या कोई अनुराग कश्यप हो सकता है कि ओम राउत से बेहतर फिल्ममेकर हो, लेकिन वह वामपंथी है. वह हो सकता है कि दृश्यों का बेहतर फिल्मांकन करता, या बेहतर कॉस्ट्यूम बनाता, लेकिन वह रामकथा को अपने वोक नैरेटिव से दूषित कर देता. रावण को अच्छा और विक्टिम दिखा देता, या सीता का रावण प्रति आकर्षण दिखा देता. यह फिल्म ऐसे दूषित नजरिए से तो मुक्त थी. विरोध और बहिष्कार खराब नजरिए का होना चाहिए न कि खराब फिल्म मेकिंग का.
बल्कि दो एक जगह फिल्म के दृश्यांकन में जो लिबर्टी ली गई है वह रामकथा की मर्यादा के अनुकूल ही है. सीता हरण के दृश्य में रावण को सीता को पाश में बांध कर ले जाते दिखाया गया है ना कि फिजिकली उठा कर, जिसने एक तरह से एक अप्रिय प्रसंग में सीता की मर्यादा रखी है और रावण को उन्हें स्पर्श करते नहीं दिखाया है. एक अन्य दृश्य में सीता श्रीराम से स्वर्ण मृग को जीवित लाने को कहती हैं, जिससे उसे अयोध्या ले जाया जा सके, और श्रीराम मृग का आखेट करने नहीं बल्कि उसे पकड़ने गए थे. मुझे ये दोनों दृश्य दर्शकों की सेंसिटिविटी का विशेष ख्याल करके लिखे हुए लगे.
हां, जब इतने खर्च से रामकथा पर एक फिल्म बन रही है तो यह अवसर था इस कथा के सुंदरतम स्वरूप को सामने लाने का. यह अवसर निर्माताओं ने गंवा दिया. इस फिल्म ने ना तो अब तक के उपलब्ध स्वरूप के प्रति निष्ठा रखी, ना ही कोई नया इंटलेक्चुअल इनपुट दिया जो इस कथा के किसी भी अंश को किसी नए या विशिष्ट अर्थ के साथ प्रस्तुत कर सके. यह फिल्म ना तो कोई प्रचंड विरोध डिजर्व करती है ना ही एक्टिव प्रमोशन. खराब फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते और यह एक वैलिड फीडबैक है जिसे कोई फिल्ममेकर इग्नोर नहीं कर सकता.
यह एक मिस्ड ऑपर्च्युनिटी है, एक असफल प्रयास है. रामकथा के सिनेमैटिक ट्रीटमेंट के लिए इससे अधिक गंभीरता की आवश्यकता है. मैं इसे बॉलीवुड की अन्य घटिया फिल्मों की तरह की ही एक घटिया फिल्म मानता हूं. लेकिन इसका बहिष्कार करने, इसपर प्रतिबंध लगाने, इसके निर्माताओं को जेल में डालने के तालिबानी स्वरों को एक खराब फिल्म से अधिक बड़ा खतरा मानता हूं. क्योंकि एक खराब फिल्म को कल एक अच्छी फिल्म से रिप्लेस किया जा सकता है, लेकिन एक जड़ और मृत समाज को एक जीवंत और स्वतंत्र समाज से रिप्लेस नहीं किया जा सकता.

÷लेखक लन्दन में चिकित्सक हैं÷



