लेखक~सुभाषचंद्र
♂÷धारा 370 पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने केंद्र सरकार की मांग पर मोहम्मद अकबर लोन को कहा कि “वे अपने उन बयानों के लिए माफ़ी मांगते हुए हलफनामा दायर करें, जिनमें उन्होंने पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए थे , लोन को कहा गया कि वे हलफनामे में लिख कर दें जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और वे भारत के संविधान के प्रति पूर्ण निष्ठां रखता हूं”
इस हलफनामे की मांग केंद्र सरकार की तरफ से Solicitor General तुषार मेहता ने की थी कि लोन को हलफनामा देना होगा कि वह भारत के संविधान के प्रति निष्ठा रखते हैं और जम्मू कश्मीर देश का अभिन्न अंग मानते हैं, और अलगाववादी ताकतों और आतंकवाद का विरोध करते हैं।
मैं समझता हूं कि तुषार मेहता और सुप्रीम कोर्ट के हलफनामा मांगने के निर्णय उचित नहीं है। मोहम्मद अकबर लोन जम्मू कश्मीर विधानसभा का अध्यक्ष और वहां की सरकार में मंत्री भी रहा है और वर्तमान में वह लोकसभा का सांसद भी है।
सर्वोच्च न्यायालय का लोन से हलफनामा मांगने का मतलब साफ़ है कि कोर्ट और केंद्र सरकार यह स्वीकार करते हैं लोन की संविधान के प्रति निष्ठा संदेह के दायरे में है और वह जम्मू कश्मीर को भी भारत का हिस्सा नहीं मानता।
हर व्यक्ति सांसद बनने के लिए ईश्वर की शपथ लेता है कि “मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, देश की संप्रभुता और एकता बनाए रखूँगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ, उसके कत्तर्व्यां का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगा”
लोन द्वारा जम्मू कश्मीर में मंत्री होने के नाते भी संविधान के प्रति निष्ठा के साथ गोपनीयता की शपथ भी ली गई होगी जिसका निर्वहन करना भी पाकिस्तान प्रेम के कारण संदेह के दायरे में माना जाएगा, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे केवल एक बार नहीं लगाए होंगे बल्कि वह उसकी निरंतर सोच का परिणाम था जो आज भी जारी है क्योंकि उसी सोच की वजह से ही तो वह 370 ख़तम करने के फैसले के खिलाफ याचिका ले कर खड़ा हुआ है।
इसका मतलब साफ़ है कि मोहम्मद अकबर लोन ने संविधान और देश की संप्रभुता के प्रति निष्ठा ना रखने का अपराध किया है जिसकी सजा के तौर पर उसकी सांसदी ख़त्म करनी चाहिए ,ऐसा हलफनामा लेकर क्या उसके अपराधों पर पर्दा डालने का काम नहीं किया जा रहा,क्या हलफनामा देकर भी वह संविधान, देश और संप्रभुता के लिए निष्ठावान हो जाएगा और क्या उसका पाकिस्तान प्रेम ख़त्म हो जाएगा।
इसलिए हलफनामा बेमानी है क्योंकि जब कोई व्यक्ति संविधान और संप्रभुता के प्रति शपथ उठा कर संसद, विधानसभा या मंत्री की कुर्सी पर बैठे तो उसके बाद तो अदालत को केवल यह देखना चाहिए था कि क्या उसने शपथ तोड़ी और तोड़ी तो दंड देना चाहिए, हलफनामा लेकर तो उसके अपराध पर पर्दा डल जाएगा।
क्या सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज बनते हुए कोई व्यक्ति संविधान के प्रति शपथ ग्रहण करने के बाद कोई हलफनामा भी देता है कि वह संविधान के प्रति निष्ठा रखता है शपथ अपने आप में ही एक ऐसा हलफनामा है जिसके उल्लंघन की सजा मिलनी ही चाहिए।
मोहम्मद अकबर लोन के अलावा कार्रवाई तो कपिल सिब्बल पर भी सुप्रीम कोर्ट को करनी चाहिए कि वह कैसे एक देश विरोधी नेता का मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गया ।
यदि कोर्ट लोन के देश विरोधी आचरण पर Convinced है तो कपिल सिब्बल का आचरण भी संदेह के दायरे में है,लोन ने कितनी फीस कपिल सिब्बल को दी और फीस के लिए पैसा कहां से आया, इसकी जांच होनी चाहिए और सच देश के सामने लाने का काम सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)



