मन की बात~पद्मश्री उमाशंकर पाण्डेय
♂÷आज हल धर बलदाऊ जी की जयंती है शिक्षक दिवस है श्री गुरु हनुमान जी का दिन है कुछ खास सझा कर रहा हूं।
समाज की सभी समस्याओं का समाधान हल में है, हल का फल किसान की फसल, शादी में हल की पूजा होती थी हल चलाना साधना है, तपस्या है। हल ने गांव बसाया समाज को जोड़ा श्री कृष्ण के बडे भाई बलराम का हथियार है हल ने समाज को भोजन दिया जहां तक इतिहास की पहुंच है।
हल था, हल लकड़ी का होता है हर किसान का सबसे मजबूत पुराना धोखा ना देने वाला मित्र है। मानव जब आदि मानव से मनुष्य बना भोजन की तलाश में निकला तो उसे प्रकृति ने लकड़ी की एक डाल दी और प्रकृति ने कहा कि, हे मानव तेरी सभी समस्याओं का समाधान इस लकड़ी में है इससे हल बना। अपनी सभी समस्याओं का समाधान होगा इच्छाओं का नहीं इसका नाम हल रखा मानव ने उस लकड़ी का हल बनाया। हल ने गाय को जोड़ा, गाय ने बैल को जोड़ा, बैल ने विकास का रास्ता खोला। हल ने गांव बसाया, समाज बसाया, हल ने बढ़ाई जोड़ा हल ने लोहार सहित 17 प्रकार के परिवारों के समाज को जोड़ा पशुधन जोड़ा हल भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ का हथियार है।
बलदाऊ एक ऐसे योद्धा हैं जिनका हथियार हल है,हल पहले लकड़ी का होता था सागौन, साखु, बेरी की लकड़ी से हल बनता था किसान अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी लकड़ी का हल बना सकता है।
मनुष्य ने जैसे-जैसे विकास किया परंपरागत हल छोड़कर वैज्ञानिक हल लिया और उस हल का नाम है कल्टीवेटर बैल की जगह ट्रैक्टर से चला समाज ने जब से हल का तिरस्कार किया उसका दंड हलधर के साथ पूरा समाज भोग रहा है। हल ने गाय को छोड़ा गाय ने बैल को छोड़ा बैल ने बैलगाड़ी को छोड़ा जीवन की गाड़ी जो चक्र थी चलायमान थी रुक गई।
मेरे पिताजी उनके पिताजी उनके पिताजी मेरे पूर्वज किसान थे, हल चलाते थे खेती,हल बैल से होती थी बचपन में मेरे परिवार में चार हल चलते थे हल चलाना गौरव की बात थी। मैंने परंपरागत लकड़ी के खेती, बैलगाड़ी, हल, बखर, जुआ पाहटा, पांचा, टट्टा, पाखरी, परंपरागत कृषि औजारों को तथा लोहे के परंपरागत सहयोगी कृषि औजार जैसे फवड़ा, कुदाली, हसिया, कुल्हाड़ी, संबल, गड़ासा, गेती, खुरपी, धुरमुट, जैसे 27 औजारों को मैंने देखा है। शायद आने वाली पीढ़ी कृषि के इन परंपरागत औजारों को संग्रहालय में देखेगी पैसे से टिकट खरीद कर हरी छठ को हल पूजा होती है।
पहले पूजा खेत में होती थी गोबर से छोटा सा तालाब बनाया जाता है अब घर में पहले हल हरीश को साक्षी मानकर विवाह होता था वर वधु दोनों तालाब, कुआं, आटा, चक्की, ओखली, मूसल, बैल की पूजा के बाद अपने घर पर कदम रखते थे। मेरी अम्मा ने मुझे यह जानकारी 45 वर्ष पहले बताई थी जब मैं छोटा था। लकड़ी के मंडप मैं विवाह के पूर्व विधि विधान से हल की पूजा होती थी क्योंकि ग्रस्त जीवन की सभी समस्याओं का समाधान हल को करना था। वर्तमान में मंडप शादी के दिनों में कई बार लोहे के छोटे से टीन में इधर उधर रिक्शे में कई इलाकों में घूमता रहता है।बड़े होटल में लाज में शादी करना गौरव की बात समझते हैं घर में जगह ही नहीं है। घर में शादी करने वाला पिछड़ा माना जाएगा जैसे मंडप घूमा है वैसे समाज घूम रहा है। जिसने हल को छोड़ा, हल ने छोड़ा हल से जोति बोई गई, जमीन मे उर्वरक क्षमता अधिक होती है खेत की भूमि को कष्ट नहीं होता ,बैल से निकले गोबर से खाद मिलती है। कल मैंने कुछ अंग्रेजी पढ़ने वाले बच्चों से हल खेती के बारे में पूछा उन्होंने कहा कि हमने हल देखा ही नहीं है उनकी गलती भी नहीं उन्हें बताया ही नहीं गया मुझे लगा कि विचार साझा करना चाहिए हल के बारे में युवा पीढ़ी जाने,30 बरस पहले हर युवा को 2 माह गांव में रहना पड़ता था खेती किसानी में परिवार के सदस्यों का हाथ बटाना पड़ता था तब ट्रैक्टर नहीं था।
कटाई, मड़ाई कच्चे मकानों के लिए खपरे लगते थे। घर का हर सदस्य मेहनत करता था गांव में पंखा बिजली नहीं थी फ्रिज, कूलर, भी नहीं था शायद आज की युवा पीढ़ी को सुविधाएं तो सब चाहिए गांव ना जाना पड़े हल ना चलाना पड़े धूप ना लगे इसलिए उसे खेत खलिहान गांव गली चौपाल परंपराएं कुछ भी नहीं पता है। सब किताबों से सीखता है मैं विषय का विशेषज्ञ नहीं हूं कुछ गलत हो तो क्षमा करें जो लोग ट्रैक्टर से खेती करते हैं करें कुछ लोग समय की बचत मान सकते हैं। मजदूर नहीं मिलता गांव में सुविधाएं नहीं हैं उनका अपना मत है उनका अपना कथन उचित है क्योंकि वे आधुनिक हैं मैं गांव का पुरानी सोच का।

÷लेखक पद्मश्री उमाशंकर पाण्डेय हैं जिन्हें लोग जलयोद्धा के रूप में जानते हैं÷



