(मुकेश शर्मा)
(ग्वालियर)
✓ सरकारी कारींदो की जेब में जा रहा करोड़ों का बजट, कागजों में होते हैं काम!
✓ कोई फ़ोटो -विडियो लेने का प्रयास मत करिए ठीक नही होगा: एसके राठौर
✓ नागवंश की राजधानी कांतिपुरी था पढ़ावली गांव,जहां पर पांडवो की माता कुन्ती का हुआ था जन्म
मध्यप्रदेश के चंबल की चर्चा यूं तो अधिकतर दस्युओं को लेकर ज्यादा होती है किन्तु आज किसी भी पार्टी की सरकार रही हो या फिर वर्तमान में बीजेपी की है लेकिन कतिपय भ्रष्ट नेता और उनके कृपापात्र अधिकारियों के चलते ऐतिहासिक पढ़ावली गांव गौरवशाली इतिहास और धरोहर मिटता जा रहा है।
मुरैना में स्थिति आज का पढ़ावली गांव देखने में तो एक सामान्य सा गाँव लगता है पर यहाँ यत्र तत्र फैले खण्डहर और पुरानी इमारतें इस बात का संकेत करती है कि इस गाँव का सम्बन्ध जरूर किसी प्राचीन धरोहर से है।
पढ़ावली, ग्वालियर शहर से उत्तर पश्चिम में 35 किमी दूर है यह गाँव कभी वैभवशाली नगर रहा है इसका प्राचीन नाम धारौन था। जहाँ से गुप्त वंश की उत्पत्ति मानी जाती है वैभव शाली धारोहर को समेटे पढ़ावली आज अपने पूरा संपदा की सुरक्षा के लिए अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। खनन माफिया की दबंगई।के चलते यहां 50 मीटर की रेंज में बेतहाशा खनन जारी है, चर्चा है कि खनन माफिया को आर. के.लोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के स्थानीय अधिकारी एस के राठौर का खुला संरक्षण प्राप्त है!क्योंकि इस खनन के धमाकों से पूरी संपदा को जो हानि होती है उसी के चलते इन साहब को लाखों का बजट सरकार से मिलता है और ये उसको हज़म कर जाते हैं।

हालांकि दिखावे के लिए मरम्मत का कार्य हमेशा चलता रहता है ।वैसे खनन के खेल में पुलिस,खनिज विभाग, राजस्व विभाग के अलावा पंचायत भी कम दोषी नहीं है। प्राचीन अभिलेखों में मिलता हैं कि पढ़ावली ,नागवंश की राजधानी कान्तिपुरी (महाभारत का कुंतलपुर पांडवों की माता कुंती का जन्म स्थान)वर्तमान गाँव कुतवार तथा पाराशर गाँव वर्तमान गाँव परौली के समीप है। कहा जाता है कि पुष्यमित्र शुंग इसी नगर की कन्या पाराशरी देवी का पुत्र था । महाकवि कालिदास द्वारा रचित मालविकाग्निमित्र , अग्निमित्र की पट्टमहिषी धारिणी देवी की जानकारी देता है जो इस नगर की दुहिता ज्ञात होती है। इस धारण नगर में कोई गुप्त परिवार रहता था । जब पुष्यमित्र शुंग ने अश्वमेघ यज्ञ किया था तब इस नगर से कोई विष्णु गुप्त विदिशा पधारे थे।
इतिहासकार कंनिघम ने पढ़ावली के गुप्तकालीन अवशेषों को देखकर अनुमान किया था कि गुप्तों के राज्यकाल में यह नगर धारौंन के नाम से जाना जाता था।
पद्मावती पवाया ग्वालियर के भव नाग राजाओ ने प्रयाग में जिस श्रीगुप्त को सामन्त नियुक्त किया था, वह धारौंन का ही था। बाद में गुप्त वंश ने नाग वंश की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह कर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया ।
श्रीगुप्त के ही वंशज समुद्र गुप्त द्वारा अपने पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय का विवाह नाग वंश की राजकुमारी कुबेरनागा से किया । कुबेरनागा की राजकुमारी वाकाटकललाम प्रभावती गुप्त ने बड़े गौरव से अपने आप को “धारण – सगोत्रा ” कहा है। इस प्रकार पढ़ावली गाँव मौर्य , शुंग , नाग और गुप्त वंश के इतिहास का साक्षी रहा है । इसके समीप स्थित बटेश्वरा , मितावली , कुतवार के अवशेष एक समृद्ध विरासत का संकेत देते है।
वर्तमान में पढ़ावली में एक गढ़ी और उससे जुड़े विशाल मंदिर के अवशेष विद्यमान है। इस गढ़ी के देवालय में मूल रूप से गर्भगृह एवं एक मंडप का ही समावेश था। इसका मुख मंडप ही शेष रह गया है। मंदिर के अवशेषों में प्राप्त एक विशाल नंदी की प्रतिमा से यह प्रतीत होता है कि ऊँचे अधिष्ठान पर निर्मित यह एक शिव मंदिर ही था।इस मंदिर के अंतः भाग पर दीवारों पर हिन्दू देवी देवताओं की प्रतिमाये उत्कीर्ण है। जिनमें ब्रम्हा , विष्णु , महेश , गणेश ,काली , सूर्य आदि प्रमुख है। मंदिर में विष्णु के बिभिन्न अवतार उनका चरित लीलाओं के साथ साथ दीवारों पर भागवत , रामायण एवं पुराणों से संबंधित प्रतिमायें उत्कीर्ण है। यह प्रतिमायें उस काल की कला ,संस्कृति को प्रतिविम्बित करती है। कला के बिभिन्न लक्षणों के अध्ययन से इस मंदिर का निर्माण 10 वी सदी में होना प्रतीत होता है।कालान्तर में इस मंदिर की सुरक्षा हेतु गोहद के जाट राणाओं द्वारा इस मंदिर को एक गढ़ी में परिवर्तित कर दिया गया।
पढ़ावली के अवशेष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किये गये है । इनके संरक्षण एवं संधारण का कार्य निरन्तर चल रहा है। यदि आपकी देश के 2000 वर्ष पूर्व के ऐतिहासिक स्थल अथवा इतिहास के छुपे रत्नों को देखने में रुचि है , तो पढ़ावली में आपका स्वागत है ।
यहाँ पढ़ावली , मितावली बटेश्वरा में दूर दूर तक फैली पुरा संपदा आपको यह सोचने को बाध्य कर देगी कि 2000 वर्ष से भी पूर्व आपकी संस्कृति कितनी समृद्ध और कितनी महान थी ? हालांकि सरकार ,प्रशासन से खनन माफियाओं की मिली भगत से आज पढावली की वैभव शाली धरोहर को भयानक नुकसान पहुंच रहा है जिला प्रशासन और ए एस आई के मुखिया क्यों मौन हैं यह बात समझ से परे है?
✓ इनका कहना हैं
आप कोई फोटो वीडियो लेने का प्रयास मत करना ठीक नहीं होगा इसके लिए आपको पहले मुझेसे या भोपाल से परमिशन लेनी पड़ेगी।
✓ एस के राठौर
पुरातत्व अधीक्षक ग्वालियर चंबल संभाग




