लेखक-राघवेन्द्र पाठक
आप यह कहकर नहीं बरी हो सकते कि नीट या अन्य परीक्षा मामले में जांच कराएंगे। यह कहना भी ठीक नहीं है कि कांग्रेस नीत विपक्ष आंदोलनकारियों से मिला हुआ है।
इसमें हुआ भर इतना है कि हमेशा मौके की ताक में रहने वाले विपक्ष ने आंदोलन को सपोर्ट कर हवा दे दी है। इससे आंदोलन बिकराल रूप लेता दिखाई दे रहा है।
भाजपा की सीटें घटने से विपक्षी पार्टियां और उनके कार्यकर्ता उत्साह से लबरेज हैं। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया। लेकिन आपने छींका टूटने क्यों दिया? उसे समय रहते दुरुस्त क्यों नहीं किया?
जनता ने जनमत आपको दिया है तो सवाल भी आपसे पूछे जाएंगे। गत वर्षों में एनडीए और इंडिया शासित राज्यों में समान रूप से पेपर लीक की घटनाएं हुईं हैं। और ये बराबर हो रहीं हैं। विद्यार्थियों का आक्रोश स्वाभाविक है।
फूल प्रूफ व्यवस्था नहीं बन पा रही है और सिस्टम में कदाचार की गंभीर समस्या बनी हुई है। लोगों का आक्रोश तब और भड़क उठता है जब सरकार की तरफ से रटा-रटाया जवाब आता है। गुस्सा तब और भड़क जाता है जब विपक्ष के आक्रामक तेवरों का जवाब बजाय विनम्रता से हैंडल करने के आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया जाए।
काफी समय से कदाचार की इन घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पा रहा है और गाहे-बगाहे विपक्ष के सवालों पर आक्रामक रुख भी अपनाया जाता रहा है। इससे जनता भड़क उठी है। विपक्ष इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
फिर सवाल वही है, आपने मौका क्यों दिया? किसी की भी यह मांग नाजायज नहीं है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर आउट क्यों हो रहे हैं? कम से कम केंद्रीय परीक्षाओं और एनडीए शासित राज्यों में तो ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए।
आखिर आप किस नज़ीर के सहारे तुम्हारी शर्ट से मेरी शर्ट सफेद है, का दावा करेंगे..! समाधान की दरकार तो है। कड़े और ठोस कदमों के साथ बेहतर परीक्षा सिस्टम समय की मांग है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
आने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले न केवल सरकार को इसका समाधान निकालना होगा वरन जनता को भी संतुष्ट करना होगा तभी एनडीए को बेहतर परिणाम की उम्मीद करना चाहिए।
सरकारी मेडिकल या अन्य कालेजों में सीटें सीमित हैं। इसी तरह सरकारी नौकरियों की संख्या एक सीमा तक ही है। उस पर रिजर्वेशन.! तिस पर विपक्ष का भ्रामक प्रचार कि भाजपा सरकार में आएगी तो संविधान बदल देगी, आरक्षण खत्म कर देगी। इस अफवाह को सरकार ठीक से हैंडल नहीं कर पाई और भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई। लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं में कदाचार एक सच्चा और गंभीर मुद्दा है इस पर गंभीरता दिखाई ही नहीं देना चाहिए वरन सच्चे मन से इसके लिए गंभीर कोशिशें भी होनी चाहिए तभी देश में विश्वास बहाली का माहौल बन सकेगा। अभी उसका अभाव ही दिख रहा है!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




