लेखक-अरविंद जयतिलक
ब्रिटेन में 14 साल बाद लेबर पार्टी की सत्ता में शानदार वापसी हुई है। हाउस ऑफ कॉमन्स के कुल 650 सीटों में लेबर पार्टी को कुल 412 सीटें मिली है। ऐतिहासिक जीत के साथ कीर स्टार्मर ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री होंगे। सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी को 121 सीटों पर संतोष करना पड़ा है जो अब विपक्ष की भूमिका में दिखेगी। अब सवाल यह है कि ब्रिटेन में बदले निजाम का भारत पर क्या असर होगा? क्या कीर स्टार्मर भारत को लेकर पुरानी पॉलिसी में बदलाव लाएंगे? फिलहाल इसकी संभावना कम है। महंगाई की बोझ तले दबे ब्रिटेन को अपनी आर्थिक स्थिति और फूड सप्लाई चेन को मजबूत करना शीर्ष प्राथमिकता में है। ऐसे में उसके लिए भारत से बेहतर रिश्ते बनाए रखना आवश्यक है। किसी से छिपा नहीं है कि रुस-यूक्रेन युद्ध से ब्रिटेन की फूड सप्लाई चेन बिगड़ चुकी है। दूसरी ओर यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के बाद ब्रिटेन के पास अपने पुराने सहयोगियों के साथ बेहतर संबंध बनाए रखने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटेन एक ऐसे मोड़ पर है जहां एक ओर अवसर है तो दूसरी ओर सघन चुनौतियां भी है। इन परिस्थितियों के बीच वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभर रहे भारत को लेकर ब्रिटेन की लेबर पार्टी का नजरिया नकारात्मक रखना कुल्हाड़ी पर पांव रखने जैसा होगा। फिलहाल ब्रिटेन की ओर से सकारात्मक संकेत ही मिल रहे है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटेन के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री को बधाई दी है और बातचीत के दरम्यान दोनों नेताओं ने मुक्त व्यापार समझौते (फ्री टेªड एग्रीमेंट-एफटीए) पर आगे बढ़ने पर सहमति जताई है। ब्रिटेन की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि प्रधानमंत्री स्टार्मर ऐसा समझौता करने को तैयार हैं जो दोनों पक्षों के लिए काम करेगा। ध्यान देना होगा कि जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक द्वारा मुक्त व्यापार समझौते (फ्री टेªड एग्रीमेंट-एफटीए) की समीक्षा की गई थी। तब दोनों नेताओं ने इस महत्वकांक्षी समझौते को मूर्त रुप देने की हामी भरने के साथ व्यापार, निवेश, विज्ञान और तकनीक जैसे व्यापक क्षेत्रों में भी आपसी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया था। याद होगा जब ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे तब भी प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने उन्हें बधाई देते हुए उम्मीद जतायी थी कि दोनों देश शीध्र ही फ्री टेªड एग्रीमेंट (एफटीए) को मूर्त रुप देंगे। कीर स्टार्मर के प्रधानमंत्री बनने पर भी वैसा ही रुख अपनाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस मसले पर आगे बढ़ने की उम्मीद जताई है। गौर करें तो सैंद्धांतिक तौर पर फ्री टेªड एग्रीमेंट (एफटीए) की नींव पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 2021 में अपनी भारत यात्रा के दौरान रखी थी। उनके बाद लिज ट्रस ने इस प्रस्तावित टेªड समझौते का समर्थन कर इस दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दिया। देखना दिलचस्प होगा कि इस मसले पर ब्रिटेन के नए निजाम का रुख क्या होता है। फिलहाल गौर करें तो आज भारत और ब्रिटेन के बीच द्विपक्षीय व्यापार तकरीबन चार लाख करोड़ रुपए का है। ऐसे में प्रस्तावित टेªड समझौता मूर्त लेता है तो निःसंदेह दोनों देशों को टैक्स में बड़ी राहत मिलेगी। मुक्त व्यापार करार के तहत व्यापार में दो भागीदार देश आपसी व्यापार वाले उत्पादों पर आयात शुल्क में अधिकतम कटौती करते हैं जिसका फायदा दोनों देशों को मिलता है। अगर फ्री टेªड समझौते पर दोनों देश आगे बढ़ते हैं तो दोनों देशों के आर्थिक भागीदारी को नई ऊंचाई मिलेगी। इससे द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि होगी और बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिलेगा। फ्री टेªड समझौते पर ब्रिटेन का भारत के साथ आना इसलिए भी उम्मीद जगाने वाला है कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। भारत ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश बन चुका है। वर्ष 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन सकता है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक अर्थव्यवस्था के आकार में भारत 2027 में जर्मनी से और 2030 में जापान से आगे निकल जाएगा। ऐसे में ब्र्रिटेन का भारत के साथ टेªड डील को लेकर गंभीर होना लाजिमी है। चूंकि भारत ने हमेशा से ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के देशों के साथ व्यापार के मामले में एक ‘मुख्य द्वार’ के रुप में देखा है ऐसे में मुक्त व्यापार समझौता न केवल ब्रिटेन बल्कि भारत के लिए भी फायदे का सौदा होगा। ब्रिटेन ने 2004 में भारत के साथ एक रणनीतिक साझेदारी शुरु की थी। इस रणनीतिक साझेदारी के तहत ब्रिटेन आतंकवाद, परमाणु गतिविधियों और नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम में भारत के साथ है। दोनों देशों द्वारा भरोसा जताया जा चुका है कि 2030 तक आपसी संबंधों को रणनीतिक साझेदारी में बदलना उनकी शीर्ष प्राथमिकता में होगा। जहां तक द्विपक्षीय व्यापार का सवाल है तो ब्रिटेन भारत का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी देश है। दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार जो 2018-19 में 16.7 अरब डॉलर, 2019-20 में 15.5 अरब डॉलर था वह अब बढ़कर 40 अरब डॉलर यानी चार लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच चुका है। इससे दोनों देशों के तकरीबन 5 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। गौर करें तो ब्रिटेन में लगभग 800 से अधिक भारतीय कंपनियां हैं जो आईटी क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इस संदर्भ में टाटा इंग्लैंड में नौकरियां उपलब्ध कराने वाली सबसे बड़ी भारतीय कंपनी का दर्जा हासिल कर चुकी है। भारतीय कंपनियों का विदेशों में कुल निवेश 85 मिलियन अमेरिकी डॉलर के पार पहुंच गया है। दूसरी ओर ब्रिटेन से भारत के बीपीओ क्षेत्र में आउटसोर्सिंग का काम भी बहुत ज्यादा आ रहा है। आउटसोर्सिंग दोनों देशों के लिए लाभप्रद है। एक ओर यह ब्रिटिश कंपनियों की लागत कम करता है वहीं लाखों शिक्षित भारतीयों के लिए रोजगार का अवसर उपलब्ध कराता है। ब्रिटेन में बड़ी तादाद में अनिवासी भारतीयों की मौजुदगी है। यह संख्या लगभग 2 मिलियन तक पहुंच चुकी है। भारतीय लोग दुनिया के अन्य देशों की तरह ब्रिटेन की आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था को भी शानदार गति दे रहे हैं। पिछले दो दशकों में आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए दोनों देशों ने कई तरह की पहल की है। नतीजा ब्रिटेन में परियोजनाओं की संख्या के मामले में भारत दूसरे सबसे बड़े निवेशकर्ता देश के रुप में उभरा है। अच्छी बात है कि आर्थिक साझेदारी को गति देने के साथ-साथ दोनों देश स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भी आगे बढ़ने पर सहमति जता चुके हैं। अब यह ब्रिटेन के मौजूदा प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर निर्भर करता है कि वह भारत के साथ आर्थिक-सामरिक रणनीतिक साझेदारी को कितना महत्व देते हैं। अगर प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर टेªड समझौते के साथ-साथ माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप समझौते पर भी अपनी स्वीकृति की मुहर लगा देते हैं तो निःसंदेह भारत के प्रशिक्षित लोगों को ब्रिटेन जाने की राह और आसान हो जाएगा। वैसे उम्मीद किया जाना चाहिए कि ब्रिटेन के नए निजाम में नरमी से भारतीयों को फायदा मिलना तय है। उम्मीद है कि नए प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पुरानी पॉलिसी पर ही आगे बढेंगे जो कंजर्वेटिव सरकार के समय थी। वैसे देखें तो कंजर्वेटिव सरकार इमिग्रेशन कानून को लेकर ज्यादा सख्त थी। उसका खामियाजा भारतीय मूल के लोगों को भुगतना पड़ा। चूंकि कीर स्टार्मर चुनाव के दरम्यान इस मसले पर नरमी के संकेत दे चुके हैं ऐसे में माना जा रहा है कि भारतीय मूल के लोगों को इस मसले पर राहत मिलनी तय है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो आतंकवाद से निपटने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी का समर्थन, पर्यावरण, रक्षा उपकरणों व अत्याधुनिक हथियारों का साझा उत्पादन तथा अफगानिस्तान के हालात जैसे कई अन्य मसलों पर भी दोनों देशों की सोच एक जैसी है। कई वैश्विक मंचों के जरिए दोनों देश अनेकों बार अपने-अपने विचार साझा कर चुके हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिटेन के नए निजाम कीर स्टार्मर भारत के साथ दोस्ती को कितना परवान चढ़ाते हैं।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




