रिपोर्ट- BBC
वैटिकन में एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसे बहुत कम लोगों ने देखा है. इसकी एक प्रति बीजिंग में भी है. यह एक गुप्त संधि है जिस पर 2018 में हस्ताक्षर किए गए थे. इसे चीन और कैथोलिक चर्च के बीच अस्थायी समझौता करार दिया गया था. यह समझौता चीन के एक करोड़ तीस लाख कैथोलिकों का भविष्य तय कर सकता है. चीन का कैथोलिक समुदाय मुख्यत: तीन गुटों में बंटा है जिसमें सरकारी मान्यता प्राप्त चीनी चर्च, चाइनीज़ पेट्रियोटिक कैथोलिक असोसिएशन और भूमिगत यानि अंडरग्राउंड चर्च शामिल है.
अंडरग्राउंड चर्च के नेता इस समझौते को उनके धर्म गुरु यानी पोप द्वारा चीन के कैथोलिकों के साथ विश्वासघात की तरह देखते हैं. अब कुछ हफ्तों के भीतर वेटिकन को तय करना है कि वो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ यह अस्थायी समझौता आगे जारी रखें या नहीं. इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्या पोप फ़्रांसिस चीन के कैथोलिकों का साथ नहीं दे रहे हैं?
(दी ग्रेट वॉल)
एक प्रतिबंध के कारण चीन में 130 सालों तक कैथोलिक धर्म का कोई ख़ास वजूद नहीं रहा. थियोलॉजिस्ट(धर्मशास्त्री) मार्टिन पामर चीन में कैथोलिक धर्म के इतिहास के विशेषज्ञ हैं. उनका मानना है कि चीन के नेता शी जिनपिंग की स्थिति काफी मजबूत हो चुकी थी और पोप फ़्रांसिस के पास भी व्यापक अधिकार थे इसलिए इन दोनों के लिए यह समझौता करना काफी आसान था.
इस समझौते में पुराने मुद्दों को दरकिनार करके तय किया गया कि चीनी चर्च, चीनी रहेगा और कैथोलिक भी. वो कहते हैं चीन में कैथोलिक चर्च ने कई राजनीतिक उतार चढ़ाव देखे हैं. उन्होंने बताया कि 13वीं सदी के अंत में तत्कालीन पोप ने जॉन ऑफ़ मोंटेकोर्विनो नाम के एक धार्मिक नेता को मंगोलिया भेजा. मार्टिन पामर आगे बताते हैं, “उनका उद्देश्य धर्मयुद्ध में इस्लाम का सफाया करने के लिए कैथोलिकों का साथ देने के लिए मंगोलिया के नेताओं को राजी करना था. वो बीजिंग के आर्च बिशप बन गए और 1306 में उन्होंने एक चर्च का निर्माण किया और कई लोगों का धर्म परिवर्तन किया. लेकिन जब चीनी लोगों ने दोबारा सत्ता हथियाई तो वहां से कैथोलिक चर्च का सफाया हो गया.”
1580 में मैटियो रिची नाम के एक कैथोलिक धर्मगुरू चीन पहुंचे और चीन के कई बड़े नेताओं को कैथोलिक धर्म स्वीकार करने के लिए राज़ी करने में सफल हो गए. लेकिन 1717 में एक बड़ा नाटकीय मोड़ आया जब डोमिनिकन मिशनरियों के बीच एक सांस्कृतिक संघर्ष शुरू हो गया क्योंकि वो चीन के लोगों को यूरोपीय कैथोलिकों जैसा बनाना चाहते थे लेकिन जेसुइट मिशनरी ईसाई धर्म के चीनी प्रारूप को लागू करना चाहते थे.
मार्टिन पामर ने कहा कि साल 1717 में पोप ने फैसला सुनाया कि चीन के कैथोलिकों को अपने पूर्वजों की पूजा करना बंद करनी होगी. चीन के सम्राट को लगा कि यह चीनी संस्कृति के खिलाफ है. इसलिए उन्होंने जेसुइट मिशनरियों को छोड़ कर सभी ईसाइयों पर प्रतिबंध लगा दिया. नतीजतन अगले 130 सालों तक कैथोलिक धर्म का चीन में कोई ख़ास वुजूद नहीं रहा. हां, वहां कुछ भूमिगत चर्च ज़रूर मौजूद रहे.
(नए अध्याय का आरंभ)
उन्नीसवीं सदी के मध्य में एंग्लो चाइनीज़ युद्ध में ब्रिटेन ने चीन को पराजित कर दिया जिसके बाद वहां एक नया अध्याय शुरू हुआ. चीन ने ब्रिटेन को हांगकांग सौंप दिया. इसके बाद वहां फ्रांसीसी लोग पहुंचे और उन्होंने मांग की चीन में कैथोलिक मिशन शुरू किए जाएं और किसी भी विवाद का हल फ्रांस और वेटिकन के कानूनों के अंतर्गत हो.
मार्टिन पामर कहते हैं कि 2018 के समझौते को देखें तो ऐसा ही फ्रांस ने किया था. वो तय करते थे कि चीन का आर्चबिशप कौन होगा. इस पर वो वेटिकन की राय नहीं लेते थे. 1924 में शंघाई में कैथोलिक नेताओं की परिषद में चीन के धर्मगुरु को बिशप नियुक्त किया गया. मार्टिन पामर के अनुसार, “इसी के साथ चीन के चर्च का पुनर्गठन शुरू हुआ. उसके बाद 1949 में चीन में कम्युनिस्ट सरकार के आते ही तनाव फिर बढ़ गया क्यों कि सरकार कैथोलिक चर्च को उपनिवेशवादी संस्था की तरह देखने लगी.”
चीन में 1957 में सरकार ने पेट्रियोटिक कैथोलिक एसोसिएशन की स्थापना की जिसने वेटिकन से सभी संबंध तोड़ लिए. इसकी वजह से भूमिगत चर्चों का आंदोलन शुरू हुआ जो गुप्त रूप से पोप के संपर्क में रहते थे और उनके बिशप और दूसरे धार्मिक नेताओं को वेटिकन मान्यता भी प्रदान करता था. इस कारण चीन सरकार उन्हें विद्रोही मानती थी. उसके बाद चेयरमैन माओ द्वारा शुरू की गयी सांस्कृतिक क्रांति से केवल कैथोलिक संस्थाओं को ही नहीं बल्कि हर चीज़ को नुकसान पहुंचा. चीन के इतिहास का सबसे बड़ा अकाल भी सांस्कृतिक क्रांति की वजह से पड़ा.”
इस कहानी का अगला महत्वपूर्ण साल था 2013. उस साल 13 मार्च को रोम में फ़्रांसिस पोप चुने गये. इसके एक दिन बाद बीजिंग में शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति चुने गये.
(गुप्त समझौता)
वैटिकन और चीन के बीच संबंध सुधारने के लिए 1960 से बात चल रही है. इस विषय में बीबीसी ने बात की फ़ादर जेरोम हेंड्रिक्स से जो बेल्जियम के रहने वाले है मगर उन्होंने लंबे अरसे तक चीन के चर्च के साथ मिशनरी और पादरी के तौर पर काम किया है. वो 1960 से पोप और चीन के बीच संबंध सुधारने के लिए चल रही वार्ताओं पर नजर रख रहे हैं. उनका मानना है कि पोप फ़्रांसिस के कार्यकाल में इन वार्ताओं में सबसे ज्यादा प्रगति हुई है.
फादर जेरोम कहते हैं, “पोप पॉल छठें के कार्यकाल के दौरान चीन सरकार के साथ वार्ताओं की शुरूआत हुई. पॉप जॉन पॉल द्वितीय के कार्यकाल में बात आगे बढ़ी. पोप बेनेडिक्ट ने भी वार्ताएं जारी रखीं लेकिन सबसे बड़ी सफलता पोप फ्रांसिस ने हासिल की. वो चीन में चर्च को एकजुट करना चाहते हैं. इस समय चीन के सभी बिशप और अन्य धर्मगुरुओं को पोप की मान्यता प्राप्त है. यह चीन में कैथोलिक चर्च के लिए बड़ी अच्छी बात है.” वेटिकन के सूत्रों का कहना है कि 2018 के समझौते के तहत चीन में कैथोलिक बिशप की नियुक्ति में पोप की राय ली जाएगी मगर समझौते की शर्तों को गुप्त रखा जाएगा. सवाल यह है कि इसे गुप्त रखने की क्या ज़रूरत है?
(गुप्त क्यों रखा गया है ये समझौता )
इस पर फादर जेरोम हेंड्रिक्स ने कहा कि, “ यह पेचीदा समझौता है और मौजूदा हालात में काफी विवादस्पद भी हो सकता है. चीन की सरकार के हाथों कैथोलिकों का जो उत्पीड़न हुआ है उसे ध्यान में रखते हुए ऐसी सरकार से खुला संवाद काफ़ी विवादास्पद हो सकता है.” मगर समझौता होने के बाद भी चीनी प्रशासन ने पोप से मशवरा किए बिना बिशप की नियुक्ति की है. इस पर फादर जेरोम हेंड्रिक्स का कहना है कि चीन और वैटिकन के बीच वार्ताएं आदर्श स्थिति तक तो नहीं पहुंची हैं.
इसके लिए चीन में वैटिकन का दफ़्तर होना चाहिए ताकि दोनों पक्षों के बीच सीधा संपर्क कायम रहे. वो कहते हैं कि पोप समझौते के बाद की स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट तो नहीं हैं लेकिन फिलहाल दोनों पक्षों के बीच कोई संघर्ष नहीं जो कि एक सकारात्मक बात है इसलिए वो इस समझौते को आगे बढ़ा सकते हैं. मगर सभी कैथोलिक नेता इससे सहमत नहीं हैं. हांगकांग के पूर्व बिशप और भूमिगत चर्च के कार्डिनल जोसेफ ज़ैन इस समझौते का विरोध कर रहे हैं. वो मानते हैं कि पोप ने चीन के कैथोलिकों के साथ विश्वासघात किया है.
इस पर फादर जेरोम हेंड्रिक्स ने कहा कि, “हम दोनों लंबे समय से दोस्त रहे हैं लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ. उन्होंने पहली बार इन शब्दों का इस्तेमाल किया कि पोप ने चाइनीज़ चर्च के साथ विश्वासघात किया है. पोप ने विश्वासघात नहीं किया. वो स्थिति को भली-भांति समझते हैं. यह एक मुश्किल वार्ता है मगर इसमें कुछ गलत नहीं है.”
(‘समझौता एक बड़ी चूक’)
कैंपेन फॉर हांगकांग के अध्यक्ष सैम्युएल चू कहते है कि चीन के साथ संबंध सुधारने की महत्वाकांक्षा के लिए वेटिकन द्वारा 2018 में चीन के साथ अस्थाई समझौता किया गया जो एक मूर्खतापूर्ण कदम है. कैंपेन फॉर हांगकांग, हांगकांग में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करता है. सैम्युएल चू ने कहा कि, “हांगकांग के पूर्व बिशप जोसेफ ज़ैन साफ़ कह चुके हैं कि यह समझौता एक बहुत बड़ी गलती है और यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सामने घुटने टेकने के समान है जिसका कोई अच्छा नतीजा नहीं आएगा.
”सैम्युएल चू को लगता है कि वेटिकन ने चीनी सरकार की मान्यता प्राप्त चर्च और भूमिगत चर्च को एकजुट करने की कोशिश में उस चर्च का साथ छोड़ दिया है जिसने चीनी प्रशासन के हाथों उत्पीड़न झेला है. उन्होंने कहा कि, “भूमिगत चर्च को अपनी गतिविधियां छुप कर करनी पड़ती हैं. पिछले दस सालों से भूमिगत चर्च को प्रार्थना या उपासना करने के लिए फैक्ट्री या कार्यालयों में छिप कर मिलना पड़ता था. अब इन सब पर सरकार की निगरानी है. खुल कर सामने आने से इनके लिए उत्पीड़न का खतरा और बढ़ जाएगा.”
पिछले साल सैम्युएल चू रोम जाकर वेटिकन के अधिकारियों से मिले और इस समझौता पर सवाल किए. वो कहते हैं कि उन्हें कहा गया कि आपने समझौता नहीं देखा है. वो कहते हैं कि आख़िर इस समझौते में ऐसा क्या है जिसे जाहिर करने से वेटिकन डरता है. वो कहते हैं कि इस अस्थाई समझौते के बल पर चीन ने वहां कैथोलिक चर्च पर पूरा कब्जा जमा लिया है. वैटिकन इस दावे का खंडन करता है. मगर क्या यह समझौता एक बेहतर विकल्प नहीं है क्यों कि इससे पहले बिशप की नियुक्ति के पूरे अधिकार चीनी सरकार के हाथ में थे?
सैम्युएल चू का जवाब था कि, “मेरे हिसाब से तो यह भूमिगत चर्च का हाथ छोड़ने जैसी बात है. इस समझौते के ज़रिए भूमिगत चर्च को कहा जा रहा है कि अब वो उन बिशप के नेतृत्व को स्वीकार करें जिनकी नियुक्ति चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा की गयी है. आपके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है.” वे कहते हैं कि ये भूमिगत चर्च के उन लाखों कैथोलिकों के साथ विश्वासघात है जिन्होंने वर्षों तक अपने धर्म के पालन के लिए निडरता से उत्पीड़न का जोखिम उठाया.
(लंबा खेल)
वैटिकन के मामलों पर रिपोर्टिंग करने वाली इटली की एक ऑनलाइन समाचार वेबसाइट क्रक्स के संपादक जॉन एलन कहते हैं कि लंबे समय से वेटिकन की यही नीति रही है कि चीन के साथ संबंध सुधारे जाएं. जॉन एलन कहते हैं, “वैटिकन सभी देशों के साथ अच्छे संबंध चाहता है लेकिन दुनिया की एक महाशक्ति के साथ संबंध और भी महत्वपूर्ण है. पोप फ़्रांसिस के नेतृत्व के चलते एक बदलाव यह आया है कि वह पहले पोप हैं जो एक विकासशील देश से आये हैं इसलिए वो वैटिकन को पश्चिमी संस्था के बजाय एक ऐसी वैश्विक गुटनिरपेक्ष संस्था के रूप में ढालना चाहते हैं जिसकी विदेश नीति भारत और ब्राजील जैसे देशों से मेल खाती हो. चीन के साथ संबंधों को इसी वजह से महत्व दिया जा रहा है.”
लेकिन चीन के मानवाधिकार रिकार्ड की अक्सर आलोचना होती रही है. तो ऐसे देश में वहां के लगभग एक करोड़ तीस लाख कैथोलिक किस प्रकार अपने धर्म का पालन कर पाएंगे? इस पर जॉन एलन ने कहा कि, “ कैथोलिक वहां रविवार को चर्च जा सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं. साथ ही दूसरी धार्मिक गतिविधियों में भाग ले सकते हैं. पश्चिमी देशों में धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब है कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर खड़े हो कर यह कह सकता है कि चीन को सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर और अमल करना चाहिए,
ख़ास तौर पर अल्पसंख्यकों के मामले में. लेकिन पोप और उनके विदेश नीति के सलाहकारों ने तय किया है कि वो सार्वजनिक तौर पर चीन के साथ टकराव वाली नीति नहीं अपनाएंगे. कुछ लोग इसे कूटनीतिक समझदारी मानते हैं तो कुछ लोगों के अनुसार यह नैतिक कायरता है. यह दोनो धारणाएं कैथोलिक चर्च के भीतर भी हैं और बाहर भी.”
(चीन की कैथोलिक आस्था)
जॉन एलन की राय है कि पोप की चुप्पी से पता चलता है कि उन्हें चीन के कैथोलिकों की चिंता है. वे कहते हैं कि ये कोई आदर्श समझौता नहीं है लेकिन कोई भी समझौता न, हो, इससे तो यह बेहतर है त्रुटिपूर्ण ही सही लेकिन कोई समझौता तो हुआ है. उनकी दलील है कि लंबे समय में यह चीन के कैथोलिकों के लिए अच्छा होगा और चीन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ वार्ताओँ में जोड़े रखने के लिए भी यह लाभदायक साबित होगा. वे कहते हैं, “मुझे विश्वास है कि यह अस्थायी समझौता आगे बढ़ा दिया जाएगा और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा. और हो सकता है आगे वेटिकन और चीन के बीच कूटनीतिक संबंध और घनिष्ठ हो जाएं.”
अगर यही वेटिकन की सोच रही तो इस अस्थायी समझौते की मियाद कम से दो साल और बढ़ा दी जाएगी और चीन का कैथोलिक चर्च वहां ईसाई धर्म को चीनी संस्कृति के अनुरूप ढालता जाएगा. जॉन एलन कहते हैं कि यह चीन में कैथोलिक आस्था के लिए अच्छा होगा. तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- क्या पोप फ़्रांसिस चीन के कैथोलिकों के साथ ‘विश्वासघात’ कर रहे हैं?
इस मुद्दे पर चीन के कैथोलिकों में भी सहमति नहीं है. भूमिगत चर्च के कई लोग सरकारी मान्यता प्राप्त चर्च में शामिल हो गए हैं. मगर अन्य लोगों को लगता है कि उनके साथ पोप ने विश्वासघात किया है. पोप के लिए यह समझौता चीन के कैथोलिक चर्च के धड़ों को एकजुट करने का व्यावहारिक तरीका है. वहीं चीनी सरकार के लिए यह ऐसा कदम है जिससे वो कैथोलिकों को साझा चीनी संस्कृति के दायरे में ला पाएगी और किसी विद्रोही भूमिगत समुदाय के खतरे को भी टाल सकेगी. यह अस्थायी समझौता चीन के लाखों कैथोलिकों के लिए बेहतर भविष्य का रास्ता बन पाएगा या नहीं इसका जवाब तो समय ही देगा.
(सौजन्य- बीबीसी हिंदी २ सितंबर २०२४ की रिपोर्ट)




