लेखक-अरविंद जयतिलक
गत वर्ष कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन द्वारा यह खुलासा किया गया था कि यौन शोषण के शिकार बच्चों में से औसतन चार को प्रतिदिन न्याय नहीं मिल रहा। फाउंडेशन के मुताबिक पोक्सो के तहत दर्ज हजारों मामले जांच के बाद भी न्यायालय तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जिससे प्रतिदिन चार पीड़ित बच्चों को न्याय नहीं मिल पा रहा। यह सच पोक्सो एक्ट-2012 के तहत केसों और उनके निपटाने के तौर-तरीके के अध्ययन के बाद उजागर किया गया। चूंकि ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो में वर्ष 2017 और 2019 के बीच दर्ज केसों के अध्ययन के आधार पर जुटाए गए लिहाजा इनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता। इसमें कहा गया कि वर्ष 2017 और 2018 के मुकाबले 2019 में करीब 43 फीसद मामले सुबूतों के अभाव में बंद कर दिए गए।
सजा मिलने की दर महज 30 प्रतिशत से 64 प्रतिशत के बीच है। चूंकि ज्यादा पीड़ित कमजोर तबके से आते हैं लिहाजा उनकी पैरवी ठीक ढंग से नहीं हो पाती, ऐसे में सुबूतों के अभाव में उनके केस बंद कर दिए जाते हैं। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने देश में बच्चों से दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं को रोकने और ऐसे मामलों की जल्द जांच और ट्रायल सुनिश्वित करने के लिए विशेष जिला अदालतें बनाने का निर्देश दिया था। तब अदालत ने कहा था कि जिन जिलों में पोक्सो में 100 से ज्यादा मामले दर्ज हैं ऐसे हर जिले में बाल यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून यानी पोक्सो के तहत विशेष अदालत गठित की जाए। सर्वोच्च अदालत ने यह भी था कहा कि दो महीने के भीतर विशेष अदालतों को गठित करने का समय तय किया जाए। ये अदालतंे सिर्फ पोक्सो के मुकदमें सुनेगी और अदालतों के गठन का पूरा खर्च केंद्र सरकार द्वारा उठाया जाएगा। बच्चों का यौन उत्पीड़न न हो इसके लिए अदालत ने जागरुकता कार्यक्रम शुरु करने का भी निर्देश दिया था। लेकिन बिडंबना है कि इसके बावजूद भी बच्चों का यौन शोषण थमने का नाम नहीं ले रहा। गत वर्ष पहले तत्तकालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने बच्चों से बढ़ती दुष्कर्म की घटनाओं पर अखबारों और पोर्टल की रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले को जनहित याचिका में तब्दील करते हुए न्यायालय की मदद के लिए वरिष्ठ वकील वी गिरी को अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया था। तब उम्मीद किया गया था कि शायद सर्वोच्च अदालत की इस सक्रियता से दुष्कर्म से जुड़े लंबित मामले निपटाने में मदद मिलेगी।
दोषियों को उनके किए का दंड मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। जबकि पोक्सो के तहत बच्चों का यौन शोषण करने वाले दोषियों को 20 साल कैद से लेकर मौत तक की कड़ी सजा के प्रावधान है। लेकिन इसके बावजूद भी 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक दोषी दंड से बच निकल जा रहे हैं। नतीजा यौन शोषण के मामले घटने के बजाए बढ़ रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर 6 घंटे में एक बच्चे के साथ दुष्कर्म होता है। ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं। अधिकांश मामले में तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज ही नहीं करती है। याद होगा गत वर्ष पहले दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सर्वोच्च अदालत को कहना पड़ा था कि देश में ‘लेफ्ट, राइट, सेंटर’ सब जगह दुष्कर्म हो रहे हैं। तब सर्वोच्च अदालत ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संरक्षण गृहों में यौन उत्पीड़न की घटनाएं रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों की भी जानकारी मांगी थी। किसी से छिपा नहीं है कि देश के कई राज्यों में संरक्षण गृहों से यौन उत्पीड़न की घटनाएं सूर्खियां बटोर चुकी हैं। यहां ध्यान देना होगा कि बच्चे-बच्चियां सिर्फ कार्यस्थलों, संरक्षणगृहों, सड़कों, स्कूलों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं हैं बल्कि अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करेें तो रिश्तेदारों द्वारा यौन उत्पीड़न किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 प्रतिशत मामलों में बच्चे दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं लेकिन उसके खिलाफ अपना मुंह खोलने से डरते हैं। शायद उन्हें भरोसा ही नहीं होता कि कानून इन गुनाहगारों की गर्दन दबोच पाएगा।
बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाओं को देखते हुए गत वर्ष पहले महिला अधिवक्ता एसोसिएशन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर मांग की गयी थी कि शीर्ष कोर्ट कानून मंत्रालय को निर्देश दे कि बच्चों से दुष्कर्म करने के दोषियों को नपुंसक बना दिया जाए। गौर करें तो दुनिया के कई देशों मसलन रुस, पोलैंड, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, यूएस, न्यूजीलैंड और अर्जेंटीन में बच्चों से रेप करने वालों को नपुंसक बनाने का प्रावधान है। याचिका में आग्रह किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ‘पेरेंस पेट्रिया’ क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर अभिभावक के रुप में बच्चों के मानवाधिकार का संरक्षण करे जिनके साथ आए दिन यौन दुर्व्यवहार हो रहा है। महिला अधिवक्ता एसोसिएशन ने मांग की थी कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण का 2012 में लाया गया कानून में बदलाव किया जाए क्योंकि यह नाबालिग बच्चों को यौन दुष्कर्म से बचाने में विफल साबित हो रहा है। तब महिला अधिवक्ता एसोसिएशन ने एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि देश में हर 30 मिनट में एक बच्चे के साथ यौन दुर्व्यवहार हो रहा है।
एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में बच्चों से दुष्कर्म की घटनाओ में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। गौर करें तो बच्चे शिक्षा के मंदिरों में भी सुरक्षित नहीं हैं। गत वर्ष पहले प्रकाशित यूनिसेफ की रिपोर्ट पर गौर करें तो 65 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं। इनमें 12 वर्ष से कम उम्र के लगभग 41‐17 प्रतिशत, 13 से 14 साल के 25.73 प्रतिशत और 15 से 18 साल के 33.10 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं। यह सच्चाई हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद को हिला देने वाली है। रिपोर्ट पर विश्वास करें तो स्कूलों में बच्चों को जबरन अंग दिखाने के लिए बाध्य किया जाता है। उनके नग्न चित्र लिए जाते हैं। दुषित मनोवृत्ति वाले अधम शिक्षकों द्वारा बच्चों को अश्लील सामग्री दिखायी जाती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि शिक्षण संस्थाओं में बढ़ रहा यौन शोषण समाज को विखंडित कर सकता है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में ही 68.88 प्रतिशत मामले छात्र-छात्राओं के शोषण से जुड़े पाए गए थे। गौर करें तो ये आंकड़े समाज को शर्मिंदा करने वाले हैं। स्कूलों के अलावा अन्य स्थलों पर मसलन दुकानों, सिनेमाहालों एवं अन्य कारोबारों में जुड़े मामलों में भी बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं देखने-सुनने को मिलती हैं। गत वर्ष पहले गृह मंत्रालय की ओर से जारी 2016 के आंकड़ों से उद्घाटित हुआ था कि बच्चों के अपहरण की घटनाएं कम होने के बजाए बढ़ रही है और अपहरण किए जा रहे अधिकतर बच्चों का इस्तेमाल बाल मजदूरी और देह व्यापार जैसे धंधों में किया जा रहा है। यही नहीं माफिया तत्व अत्यंत सुनियोजित तरीके से बच्चों का इस्तेमाल हथियारों की तस्करी और मादक पदार्थों की सप्लाई में कर रहे हैं।
आतंकवाद और नक्सलवाद से जुझ रहे भारत के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक है। याद होगा गत वर्ष पहले लापता हो रहे बच्चों के मामले में अदालत ने सरकार से नाराजगी जाहिर करते हुए जानना चाहा था कि डेढ़ दशक गुजर जाने के बाद भी जेजे एक्ट के तहत एडवाइजरी बोर्ड का गठन क्यों नहीं किया गया। अदालत ने यह भी पूछा था कि ऑपरेशन स्माइल के तहत कितने बच्चों को बचाया गया। सच कहें तो बच्चों पर होने वाले अत्याचार की घटनाएं समाज को विचलित करने के साथ ही लोकतांत्रिक भारत के माथे पर कलंक जैसी हैं।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




