(संजय राय)
(नई दिल्ली)
प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा स्व केंद्रित सामूहिक प्रयास से ही होगा समाज परिवर्तित
पंच परिवर्तन भारत की ही नहीं बल्कि विश्व की है आवश्यकता: प्रोफेसर टंकेश्वर कुमार
इंद्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम”भारत मंथन पर्व” में 20 विश्वविद्यालयों की भागीदारी में 200 से अधिक पढ़े गए शोधपत्र
इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र का हस्ताक्षर कार्यक्रम ‘भारत मंथन’ इस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में आयोजित किया गया। ‘भारत मंथन पर्व’ नॉन कॉलिजिएट शिक्षा बोर्ड (दिल्ली विश्वविद्यालय) जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (दिल्ली) हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वधान में 6 अप्रैल से 11 अप्रैल तक संपन्न हुआ। संगोष्ठी का विषय ‘मानव कल्याण के परिप्रेक्ष्य में पंच परिवर्तन का क्रियान्वयन- चुनौतियाँ एवं समाधान’ रहा।
6 अप्रैल को उद्घाटन सत्र से आरम्भ हुई संगोष्ठी का आज समापन सत्र रामजस महाविद्यालय में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का आरम्भ भारत माता के पूजन से हुआ। वर्ष 2025 में हुए भारत मंथन के चयनित शोध पत्रों को पुस्तकार दिया गया। जिसका शीर्षक ‘चराचर सृष्टि भारतीय दृष्टि’ रहा। उपस्थित अतिथियों ने इसका लोकार्पण किया।

प्रो. राकेश पाण्डेय (किरोड़ीमल क़ॉलेज) ने इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र की यात्रा से अवगत कराया। इस संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता जे. नंद कुमार (राष्ट्रीय संयोजक प्रज्ञा प्रवाह) रहे। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा भारत की सामाजिक संरचना की रीढ़ परिवार है। परिवार से ही समूह, राष्ट्र और विश्व का कल्याण संभव है। उन्होंने गुरु जी को उद्धृत करते हुए कहा कि स्व केन्द्रित सामूहिक प्रयास से समाज परिवर्तित होगा।
प्रो. बलराम पाणि (अधिष्ठाता दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपनी बात चीलेट रिंग के माध्यम से समझाते हुए पाँच बिन्दु मैं (स्व बोध), परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व के अंतर्संबंधो की चर्चा की। प्रो. टंकेश्वर कुमार (कुलपति हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय) ने कहा पंच परिवर्तन भारत की ही नहीं विश्व की आवश्यकता है। भारत का विकसित बनने का दृष्टिकोण संस्कृति के साथ आधुनिक बनने में है।
प्रों गीता भट्ट (ऩॉन कॉलेजिएट महिला शिक्षा बोर्ड) ने धन्यवाद ज्ञापन किया। संगोष्ठी में 400 से अधिक पंजीकरण हुए। 200 से अधिक शोध पत्र पढ़े गए। लगभग 20 विश्वविद्यालयों की भागीदारी रही। दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्य़ालयों के प्राचार्य उपस्थित रहे।



