★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
8 मार्च 1921 को लुधियाना में जन्में साहिर लुधियानवी पाकिस्तान बनने के बाद लाहौर से तबके बॉम्बे वर्ष 1950 में आ गए
लाहौर के कॉलेज में अपनी शेरो शायरी व नज़्म से प्रसिद्ध होने पर लेखिका अमृता प्रीतम को उनसे हुआ इश्क़,अमृता के पिता नें निकलवाया कॉलेज से
1950 में उन्होंने हिंदी फ़िल्म”आज़ादी की राह पर”में लिखा अपना पहला गीत”बदल रही है जिंदगी”
कालजयी फिल्मकार गुरुदत्त की फ़िल्म”प्यासा”में लिखे उनके गीत”जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं”को मिनर्वा टॉकीज में दर्शकों की मांग पर तीन बार दिखाया-बजाया गया
♂÷हॉलीवुड के बाद विश्व में सबसे ज्यादा फ़िल्मो का निर्माण करने वाला बॉलीवुड कहिए, फ़िल्म इंडस्ट्री कहिए,फ़िल्मी दुनियां कहिए या चित्रपट नगरी कहिए इसने अपने उस आदमक़द शायर व हर दिल अज़ीज गीतकार को उनके जन्मतिथि पर भव्यता पूर्ण ढंग से तो छोड़िए,याद करने की भो ज़हमत नही उठाई।क्योंकि बॉलीवुड में ऐसा कोई श्रधांजलि व स्मृति कार्यक्रम लोंगो के दिलों दिमाग़ में अपनी शायरी व अमर गीतों के ज़रिए बसे मरहूम साहिर लुधियानवी साहब के सम्मान में होते दिखा।
साहिर लुधियानवी साहब नें अपने दौर में शायरी व फ़िल्मी गीतों को उस गगनचुंबी ऊँचाई पर पहुँचा चुके थे कि उनके आगे तमाम शायर और गीतकार उनकी परछाई भी न बन पाए।
8 मार्च वर्ष 1921 में लुधियाना शहर के एक जमींदार परिवार में जन्मे साहिर की जिन्दगी काफी उतार चढ़ाव वाली संघर्षों के बीच बीती । मैट्रिक तक की पढाई लुधियाना के खालसा स्कूल में पूरी की । इसके बाद वह हिंदुस्तान के अखण्ड हिस्से रहे और अब पाकिस्तान के लाहौर चले गए जहां उन्होंने आगे की पढाई सरकारी कालेज में पूरी की ।
उनको स्कूली दिनों से ही शेरो शायरी लिखने का नशा पनपता गया और आगे चलकर साहिर लुधियानवी कालेज के कार्यक्रमों में वह अपनी गजलें और नज्में पढकर सुनाया करते थे जिससे उन्हें काफी शोहरत मिली ।
इसी बीच जानी मानी पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम कालेज में साहिर के साथ पढती थी जो उनकी गजलों और नज्मों की मुरीद हो गई और उनसे इश्क़ करने लगी। लेकिन कुछ समय बाद साहिर को कालेज से निष्कासित कर दिया गया।
इसके पीछे माना जाता है की अमृता के प्रभावशाली पिता को साहिर और अमृता के रिश्ते पर ऐतराज था । लाहौर पहुंचकर उन्होंने अपनी पहली उर्दू पत्रिका “तल्खियां”लिखी ।साहिर ने प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से जुडकर “आदाबे लतीफ” , “
शाहकार” और “सवेरा” जैसी लोकप्रिय उर्दू पत्रिकायें निकाली ।
हिंदुस्तान के दो टुकड़े होने के बाद पाकिस्तान बनने के बाद साहिर वर्ष 1950 में आज की मुंबई तब के बॉम्बे आ गए । 1950 में फिल्म ‘आजादी की राह पर ‘ में अपना पहला गीत ‘बदल रही है जिन्दगी ‘ लिखा ।
वर्ष 1951 में संगीतकार एस डी बर्मन की धुन पर फिल्म “नौजवान”में लिखे अपने गीत ‘ ठंडी हवाएं लहरा के आए ‘ जबरदस्त रूप से सुपरहिट रहा और स्रोताओं के मनो मस्तिष्क में गहरे तक जा बसा।
इसके बाद साहिर लुधियानवी साहब अपनी गीतों के बूते हर संगीतप्रेमी के दिलों पर राज करने लगे और क़ामयाबी के आसमान पर विराजते गए। ।
साहिर साहब ने संगीत की दुनियां में किवदंती बन चुके संगीतकार खय्याम साहब के संगीत निर्देशन में 1958 में फिल्म ‘ फिर सुबह होगी ‘का गीत ‘ वो सुबह कभी तो आयेगी ‘ से प्रसिद्धि का वह मुक़ाम हासिल किया जो शायद ही किसी-किसी को मिली होगी।।
लीजेंड माने जाने वाले फ़िल्मनिर्माता-निर्देशक-अभिनेतागुरूदत की फिल्म “प्यासा”साहिर साहब के सिने कैरियर की अहम फिल्म साबित हुई ।फिल्म के प्रदर्शन के दौरान अद्भुत मंजर सामने आया ।मुंबई की मिनर्वा टाकीज में जब यह फिल्म दिखाई जा रही थी तब जैसे ही साहिर का लिखा क्रान्तिकारी गीत “जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं ” बजा तब सभी दर्शक अपनी सीट से उठकर खड़े हुए और गाने की समाप्ति तक तालियां बजाते रहे ।बाद में दर्शकों की मांग पर इसे तीन बार पर्दे पर दिखाया बजाया गया।फिल्म इण्डस्ट्री के इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ ।
लगभग तीन दशक तक हिन्दी सिनेमा को अपने रूमानी गीतों से सराबोर करने वाले साहिर साहब 59 साल की उम्र में 25 अक्टूबर 1980 में इस दुनियां को अलविदा कह गए मगर उनके अमर गीत,शायरी,नज्में आज भी उनके अमरत्व को प्राप्त करने की कहानी कहती रहती है।
साहिर साहब के कुछ अत्यंत लोकप्रिय गीत निम्न हैं –
- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ
२. मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला
३. न मुँह छुपा के जिओ
४. उड़े जब जब जुल्फें तेरी
५. मेरे दिल में आज क्या है
६. तोरा मन दर्पण कहलाये
७. मैं पल दो पल का शायर हूँ
८. तेरा मुझ से पहले का नाता कोई।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बॉलीवुड नें अपने उस आदमक़द गीतकार शायर को उनके जन्मतिथि पर उनकी फिल्मी जगत को दिए गए अमर गीतों के योगदान को याद करने के लिए कोई भी बड़ी फ़िल्मी हस्तियों नें इस शख्शियत के चित्रों पर श्रधांजलि के दो फूल भी चढ़ाने की ज़हमत नही उठाई।
शायद बॉलीवुड में यह चलन होता जा रहा है कि यहां पर कार्यक्षेत्र में चढ़ते सूरज के पावों की धूल माथे पर मलने के लिए फ़िल्मी हस्तियां लाइन में लगी रहती हो।




