लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂}महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज एवं उनके परिवार को लेकर विवाद खड़ा होना कोई नई बात नहीं है। छठे-छमासे इस तरह के विवाद खड़े होते ही रहते हैं। कुछ ही दिनों पहले महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज पर कहे गए कुछ शब्दों को लेकर विवाद चल रहा था, तो अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेताओं द्वारा छत्रपति संभाजी महाराज पर की गई टिप्पणियां विवाद का कारण बन रही हैं।
पिछले सप्ताह ही राकांपा नेता एवं महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजीत पवार ने विधानसभा में बोलते हुए कहा कि हम हमेशा छत्रपति संभाजी महाराज को ‘स्वराज रक्षक’ कहकर संबोधित करते हैं। लेकिन कुछ लोग उन्हें ‘धर्मवीर’ कह रहे हैं, जो गलत है। संभाजी महाराज कभी किसी एक धर्म के लिए नहीं लड़े। उनका बलिदान एवं काम राष्ट्रहित के लिए रहा है। अजीत पवार के इस बयान पर जब भाजपा एवं मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट आक्रामक होने लगा तो राकांपा के ही दूसरे विधायक जीतेंद्र आह्वाड उनके बचाव में प्रेस कान्फ्रेंस करने उतरे। जिसमें बोलते हुए वह कह गए कि औरंगजेब यदि हिंदू विरोधी होता, तो जहां उसने छत्रपति संभाजी महाराज की आंखें निकलवाकर उनकी हत्या करवाई, उसके निकट ही एक विष्णु मंदिर भी था। उसे उसने क्यों नहीं तोड़ा ? यानी जीतेंद्र आह्वाड अपने वक्तव्य से यह सिद्ध करना चाहते थे कि औरंगजेब का हिंदुओं के प्रति द्वेष नहीं था। वह जो कुछ भी कर रहा था, सिर्फ अपने राज्य विस्तार के लिए कर रहा था। इन्हीं जीतेंद्र आह्वाड का एक और वक्तव्य उस अफजल खान को लेकर याद आता है, जिसका वध छत्रपति शिवाजी महाराज ने सातारा के प्रतापगढ़ किले के नीचे बघनखा घोंपकर कर दिया था। अफजल खान बीजापुर सल्तनत के आदिलशाही वंश का सेनापति था। आह्वाड ने कुछ ही दिनों पहले उसे भी हिंदू द्वेषी न होने का प्रमाणपत्र देते हुए कहा था कि अफजल खान का हिंदुओं से कोई बैर नहीं था। वह तो सिर्फ अपनी सीमाओं के विस्तार के लिए शिवाजी महाराज के राज्य की सीमाओं तक आ पहुंचा था। हां, रास्ते में कुछ मंदिर उसने अवश्य तोड़ दिए थे। वास्तव में जीतेंद्र आह्वाड ‘तथाकथित सहृदय’ अफजल खान द्वारा जिन ‘कुछ मंदिरों’ को तोड़े जाने की बात कर रहे थे, वे मंदिर महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा पूज्य तुलजा भवानी और भगवान विट्ठल के मंदिर थे, जिनके सामने पूरा महाराष्ट्र शीश झुकाने जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज की तो कुलदेवी ही तुलजा भवानी थीं।
देश में प्रचलित इतिहास की मानें तो मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज एवं उनके कवि मित्र कवि कलश को संगमेश्वर से बंदी बनाकर औरंगजेब के सामने पेश किया था। संभाजी महाराज को अपने सामने बंदी के रूप में देखकर औरंगजेब बहुत प्रसन्न हुआ। उसे लगा कि दक्खन पर कब्जे का जो स्वप्न वह अपने पूरे जीवनकाल में पूरा नहीं कर सका, वह अब पूरा होने जा रहा है। उसने संभाजी से रिहाई के बदले तीन शर्तें मानने को कहा। ये शर्तें थीं पूरा मराठा साम्राज्य और खजाना उसके हवाले करना। सारे मुगल गद्दारों के नाम बताना। और संभाजी महाराज द्वारा इस्लाम कुबूल करना। जब संभाजी महाराज ने इन तीनों शर्तों के बदले अपनी एक शर्त औरंगजेब की बेटी से शादी करने की रखी, तो उसे सुनकर औरंगजेब आगबबूला हो गया। संभाजी द्वारा इस्लाम स्वीकार न करने पर औरंगजेब ने संभाजी एवं उनके साथी कवि कलश को तरह-तरह की यातानाएं दीं। उनकी जीभ कटवाकर कुत्ते के सामने फिंकवा दी। उनकी दोनों आंखें निकलवा दीं। नगर में ऊंटों से बांधकर परेड निकलवाकर उनकी बेइज्जती की। फिर उनके हाथ-पैर कटवा दिए। यही नहीं, उनका सिर कटवाकर किले पर टंगवा दिया। चूंकि संभाजी महाराज ने इस्लाम कुबूल करने के बजाय औरंगजेब की प्रताड़ना सहना और जान देना बेहतर समझा, इसलिए उन्हें महाराष्ट्र में एक बड़ा वर्ग धर्म के लिए जान देनेवाला ‘धर्मवीर’ मानता है।
लेकिन सिर्फ ‘राज’ के लिए राजनीति करनेवाले मराठा नेताओं को छत्रपति संभाजी महाराज की यह छवि रास नहीं आती। इसलिए वे उनकी व्याख्या ‘स्वराज रक्षक’(यानी अपने राज का रक्षण करनेवाला) तक ही सीमित रखना चाहते हैं। ताकि उनके प्रतिबद्ध वोटबैंक को कोई क्षति न पहुंचे। व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ये मसला गंगा-जमुनी तहजीब के पैरोकारों एवं भारत की हिंदू परंपरा के पक्षधरों के बीच छिड़ी जंग का भाग है। इसी कारण से ये नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू के उसी ‘नैरेटिव’ (दृष्टिकोण) को आगे बढ़ाना अपने लिए सुविधाजनक मानते हैं, जो वह अहमद नगर की जेल में लिखी अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में लिख गए हैं। नेहरू ने इस पुस्तक में छत्रपति शिवाजी महाराज का उल्लेख ‘मिसगाइडेड पैट्रियाट’ कहकर किया है। यही कारण है कि उन्हें औरंगजेब के दबाव में इस्लाम स्वीकार न करनेवाले संभाजी महाराज को ‘धर्मवीर’ कहने पर आपत्ति होती है। यही कारण है कि तुलजा भवानी और विठोबा के मंदिरों का ध्वंस करनेवाले अफजल खान को हिंदू द्वेषी करार देने में उन्हें असुविधा होती है। ये राजनीतिज्ञों का वही वर्ग है, जो बहुत बड़ी संख्या में हिंदुओं का धर्मांतरण करवानेवाले टीपू सुल्तान को इतिहास का हीरो बताते हुए गर्व की अनुभूति करता है और हिंदुत्व की दोटूक व्याख्या करनेवाले सावरकर को माफीवीर कहने में धन्यता का अहसास करता है।
महाराष्ट्र में इस वर्ग के राजनीतिज्ञों का वर्गीकरण भी कई प्रकार का दिखाई देता है। यह वर्ग छत्रपति शिवाजी महाराज को ‘मराठावाद’ के इतने बड़े चश्मे से देखता है कि वह छत्रपति शिवाजी महाराज को शास्त्र और शस्त्र की शिक्षा देनेवाले गुरु दादोजी कोंडदेव एवं उन्हें आध्यात्मिक शिक्षा देनेवाले गुरु समर्थ रामदास का छत्रपति के जीवन में योगदान सिर्फ इसलिए नकार देता है, क्योंकि ये दोनों मराठा नहीं थे। यहां तक कि छत्रपति शिवाजी महाराज पर गहन शोध करने एवं ‘जाणता राजा’ जैसा नाट्य लिखनेवाले इतिहासकार बाबासाहब पुरंदरे को भी राजनीतिज्ञों का यह वर्ग इतिहासकार नहीं मानता। क्योंकि वे मराठा नहीं थे। वास्तव में यह वर्ग छत्रपति शिवाजी महाराज एवं छत्रपति संभाजी महाराज की एक ऐसी छवि ही गढ़ना चाहता है, जो उनकी मराठावाद की राजनीति करने में तो सहायक हो, लेकिन उससे अल्पसंख्यकों के वोट पर आंच न आने पाए। इसीलिए वह छत्रपति संभाजी महाराज को ‘धर्मवीर’ कहने और मानने से कतराता रहता है।
(साभार दैनिक जागरण)

÷लेखक दैनिक जागरण के महाराष्ट्र ब्यूरो इन चीफ़ हैं÷




