लेखक-अरविंद जयतिलक
एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर कानून की मांग कर रहे किसानों का अराजकता की हद पर उतर आना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। भारत एक संवैधानिक व लोकतांत्रिक देश है। यहां हर नागरिक, संगठन व समुदाय को अपनी बात सकारात्मक ढंग से रखने और जनतांत्रिक तरीके से विरोध व आंदोलन करने का अधिकार है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि आंदोलन की आड़ में देश की गरिमा और लोकतंत्र की मर्यादा को ही धूल धुसरित कर दिया जाए। याद रखना होगा कि पिछली बार किसान आंदोलन के दौरान देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी। उद्योग चैंबर एसोचैम के मुताबिक किसान आंदोलन से देश को हर दिन 3500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यह नुकसान लाॅजिस्टिक लागत बढ़ने, श्रमिकों की कमी तथा टुरिज्म जैसी कई सेवाओं के न खुल पाने की वजह से हुआ। अगर आंदोलन खत्म नहीं हुआ तो पुनः वैसे ही हालात बन सकते हैं जो कि देशहित में नहीं होगा। उचित होगा कि किसान संगठन के प्रतिनिधि सरकार के समक्ष अपनी जायज मांगों को रखें और बातचीत के जरिए समाधान निकालें। विचार करें तो किसान संगठन एमएसपी पर कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं जो कि पूर्णतया अव्यवहारिक है। संभव ही नहीं है कि सरकार देश के सभी किसानों की सभी फसलों को शत-प्रतिशत एमएसपी पर खरीद सके। इतनी खरीद के लिए तकरीबन 20 लाख करोड़ रुपए की जरुरत होगी। अगर सरकार इसे स्वीकारती है तो उसे अर्थसंकट में फंसना होगा। अर्थात अपने कुल बजट का आधा से अधिक खर्च करना होगा। फिर इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास के काम ठप्प पड़ जाएंगे। कल-कारखाने के पहिए थम जाएंगे। शिक्षा-स्वास्थ्य और सुरक्षा पर आवंटित राशि में कटौटी करनी होगी। क्या यह देशहित में होगा? गौर करें तो मौजूदा समय में केंद्र सरकार 22 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। हां, यह सच्चाई है कि धान और गेहूं को छोड़ दिया जाए तो इनमें से अधिकांश फसलों का एमएसपी के बजाए बाजार मूल्य पर ही खरीद होती है। इससे किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता। किसान चाहते हैं कि उनकी सभी फसलों की एमएसपी पर ही सरकारी खरीद हो। उचित होगा कि किसान संगठनों के प्रतिनिधि और सरकार बातचीत कर इस दिशा में आगे बढ़े। ऐसा नहीं है कि सरकार किसानों से मुंह फेर रखी है जैसा कि किसान संगठनों द्वारा प्रतीति कराया जा रहा है। गौर करें तो वर्ष 2013-14 में तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए के उपज की एमएसपी पर खरीद होती थी। लेकिन आज यह खरीद बढ़कर ढ़ाई लाख करोड़ रुपए हो गई है। मतलब साफ है कि मौजूदा सरकार किसानों की आय बढ़ाने को लेकर संवेदनशील है। ध्यान देना होगा कि वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद कृषि क्षेत्र में आमूलचुल परिवर्तन का युग प्रारंभ हुआ है। कृषि और किसान सरकार की शीर्ष प्राथमिकता में शामिल हुए हैं। सरकार ने सबसे पहले देश का भाग्य संरचनात्मक रुप से कृषि और किसानों से जोड़ा और उसके सकारात्मक परिणाम मिलने-दिखने शुरु हो गए। यह तथ्य है कि कृषि विकास औद्योगिक विकास की तुलना में दोगुनी तेजी से गरीबी को कम करता है और विकास को रफ्तार देता है। उदाहरण के लिए कृषि उत्पादन में एक प्रतिशत की वृद्धि औद्योगिक उत्पादन में 0.5 प्रतिशत और राष्ट्रीय आय में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि करती है। इसे ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत के मुकाबले डेढ़ गुना कर किसानों के हित में ऐतिहासिक फैसला लिया। जो सबसे अच्छी बात रहीे वह यह कि सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना करते समय ए2$ एफएल फाॅर्मूला को अपनाया। सरकार ने कृषि उत्पादन के नकद व अन्य सभी खर्चों समेत किसान परिवार के श्रम के मूल्य को भी जोड़ दिया। साथ ही मजदूरी, बैलों अथवा मशीनों पर आने वाला खर्च, पट्टे पर ली गयी जमीन का किराया, बीज, खाद, तथा सिचाई खर्च भी इसमें जोड़ा। यानी किसान जो मांग कर रहे हैं उसे शत-प्रतिशत पूरा करने की कोशिश की है। वर्ष 2014 तक जो कृषि बजट 25000 करोड़ से भी कम हुआ करता था सरकार के प्रयास से बढ़कर 1.27 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। सरकार कृषि बाजार को मजबूती देने के लिए कृषि बजट में लगातार वृद्धि कर रही है। आज फसलों का रिकार्ड उत्पादन और निर्यात हो रहा है। भारत का कृषि निर्यात 50 बिलियन डाॅलर की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच चुका है। सरकार कृषि ऋण के लक्ष्य को पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन से जोड़ दिया है। इसका परिणाम है कि आज किसान कृषि के साथ-साथ समानान्तर आमदनी का नया जरिया विकसित कर रहा है। सरकार ने मोटे अनाज को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष घोषित किया है। गौर करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2016 में ही देश के किसानों की आय दोगुनी करने का नेक इरादा जाहिर किया था। उसे ध्यान में रखते हुए ही सरकार ने किसानों के हित में कई दर्जन योजनाओं को मूर्त रुप दिया। आज की तारीख में केंद्र सरकार ने किसान क्रेडिट कार्य योजना की सुविधा उपलब्ध कराकर किसानों की तात्कालिक पैसे की समस्या का निवारण किया है। किसानों को सस्ती ब्याज दरों पर लोन की सुविधा उपलब्ध है। आज किसान क्रेडिट कार्ड की मदद से एक वर्ष में तीन फसलों का उत्पादन कर अपनी आय को दोगुना कर रहा है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को आच्छादित कर किसानों की चिंताएं हरने की कोशिश की है। गौर करें तो इस योजना के तहत किसानों को अपनी फसल का बीमा करवाना होता है। रबी फसलों का बीमा करवाने के लिए 1.5 प्रतिशत, खरीफ फसलों का बीमा करवाने के लिए 2 प्रतिशत तथा बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत की दर से अंशदान देना होता है। देश के किसान इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं। पिछले वर्षों में किसानों ने फसल बीमा का जो प्रीमियम दिया है उससे पांच गुना राशि उन्हें मुआवजे के तौर पर मिली है। विगत वर्षों में किसानों ने तकरीबन 30000 करोड़ रुपए का प्रीमियम भरा है जबकि उन्हें 1.35 लाख करोड़ रुपए का मुआवजा मिला है। यानि देखें तो इस योजना से किसानों का नुकसान कम हुआ है। केंद्र सरकार किसानों के कल्याण के प्रति कितना संवेदनशील है, इसी से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को हर वर्ष 6000 रुपए की आर्थिक मदद दी जा रही है। यह मदद 2000 रुपए की तीन समान किस्तों में दी जाती है। किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले इसके लिए सरकार कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के लिए तत्पर है। इस तत्परता का नतीजा है कि कृषि क्षेत्र में निजी निवेश 9.3 प्रतिशत से अधिक है। विदेशी पूंजी प्रवाह से कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि हुई है और देश एक प्रमुख कृषि उपजों के निर्यातक के रुप में स्थापित हुआ है। केंद्र सरकार बजट कृषि-प्रौद्योगिकी स्टार्ट पर फोकस कर रही है जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। गौर करें तो वर्ष 2014 से पहले कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप की संख्या शुन्य थी जो अब बढ़कर 3000 से अधिक हो गयी है। नतीजा देश के किसानों की आय और खुशहाली दोनों बढ़ रही है। ऐसे में किसान संगठनों को इस नतीजे पर पहुंच जाना कि सरकार किसान विरोधी है उचित नहीं है। किसान संगठनों को समझना होगा कि उनकी मांग पर ही सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों को वापस लिया गया। अब भी सरकार उनकी जायज मांगों को स्वीकारने को तैयार है। लेकिन इसके लिए उन्हें उग्र आंदोलन और हिंसा के वातावरण को त्यागकर सकारात्मक माहौल निर्मित करना चाहिए। किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को समझना होगा कि उनके हिंसक आंदोलन से न सिर्फ देश में ही बल्कि वैश्विक जगत में भी देश की छवि को बट्टा लग रहा है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




