हैप्पी बर्थडे पिथौरागढ़
लेखक~नीरज सिंह
♂÷राजशाही की नफासत और चीन व नेपाल की चाल की नजाकत को करीब से देखने और समझने वाला मैं पिथौरागढ़ हूं। 1960 में आज ही के दिन जिले के रूप में स्थापित हुआ। अब मैं 63 साल का हो गया। इन वर्षो में मेरे कई गांव नगर का रूप धारण कर लिए। मेरा तेजी से विस्तार हुआ। चीन व नेपाल से तनाव के बीच राष्ट्रीव व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मैं चर्चा में रहा। चर्चाओं, चुनौतियों, विभूतियों व उपलब्धियों के बीच मेरी पूरी कहानी खुद की जुबानी।
पड़ोसी देश चीन के साथ कटुता के बाद उत्त्तराखंड की चीन सीमा से लगे अति दुर्गम, दूरस्थ और उच्च हिमालयी क्षेत्र में आज ही के दिन तीन जिलों ने जन्म लिया था। 62 वर्ष गुजरने के बाद भी अस्तित्व में आए पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी की तकदीर और तस्वीर में विशेष अंतर नहीं आया है। विकास के नाम पर तो बहुत कुछ हुआ है जो जन भावनाओं के अनुरू प नहीं होने से धरातल पर समस्याओं का अंबार है। तीनों जिलों की तस्वीर में अंतर आ चुका है, परंतु पनिशमेंट का दाग बरकरार है।
आज से 63 साल पूर्व भारत की पड़ोसी देश चीन के साथ कटुता आने लगी थी । जिसे देखते हुए 24 फरवरी 1960 को चीन सीमा से लगे पिथौरागढ़, चमोली और उत्त्तरकाशी जिलों का गठन किया गया था। जिला बनने के बाद पिथौरागढ़ में सेना ब्रिगेड का हेडक्वार्टर भी स्थापित किया गया। यहां पर सरकारी विभागों की संख्या बढ़ने लगी। पिथौरागढ़ में जिला मुख्यालय बनने से लोगों को अल्मोड़ा जाने से मुक्ति मिल गई थी। वर्तमान में पिथौरागढ़ हवाई सेवा से जुड़ चुका है और ऑलवेदर सड़क भी मिल चुकी है। चीन सीमा तक सड़क बन चुकी है।
~आज ही के दिन पिथौरागढ़ का हुआ था गठन♀
जिला गठन के बाद भी सीमांत की जनता की उम्मीदें अधूरी हैं। आज भी जिले के 10 फीसद से अधिक गांव सड़क से वंचित हैं। सीमा छोर के 22 से अधिक गांव अभी भी बिजली का दर्शन नहीं कर सके हैं। शिक्षा और चिकित्सा अभी भी बेहाल है। हजारों की आबादी पर भी एक चिकित्सक उपलब्ध नहीं है। दर्जनों माध्यमिक विद्यालय प्रधानाचार्य विहीन हैं। आर्थिक रूप से जिला अति पिछड़े जिलों में शामिल हैं। उद्योग धंधों के नाम पर शून्य है।
चीन और नेपाल सीमा से लगा पिथौरागढ़ जिले के अस्तित्व में आने के दो वर्ष बाद भारत चीन युद्ध हो गया। जिसका सर्वाधिक परिणाम चीन सीमा से लगे गांवो में पड़ा। गुलजार रहने वाले गांव खाली हो गए। गांवों तक विकास नहीं पहुंचने से गांव खाली होते जा रहे हैं। गांवों से पलायन की गति काफी तेज है। जिस कारण जिले में खेती का रकबा घटता जा रहा है। गांव केवल लाचार, बुजुर्ग और असहाय लोगों के होकर रह चुके हैं।

÷लेखक दैनिक जागरण लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं÷




