मर्माहत मन~मुकेश सेठ
♂÷मन अश्रान्त है, हृदय विदीर्ण है और विवेक शून्य सा महसूस हो रहा है, क्योकि सारे जगत के प्रत्यक्ष देव भगवान भास्कर के दिवस रविवार को मेरे नन्ही सी देह में प्राण प्रकाश प्रज्ज्वलन करने वाले मेरे आत्मज,मेरे पिताजी स्मृतिशेष हो गए,हैं से था हो गए।
आदिदेव महादेव के त्रिशूल पर बसी विश्व की प्राचीन नगरी काशी,मोक्ष की नगरी काशी,विश्व की इकलौती ऐसी न्यारी-प्यारी-भोले भक्तों की दुलारी मोक्षदायिनी काशी,जहां लोग इस आस और विश्वास में आकर बसतें भी हैं और अपनी मृत्यु को महादेव को सौंपने भी आते।
कि जब महाकाल के प्रिय स्थान मणिकर्णिका घाट पर काष्ठ से सजी चिताओं में श्रान्त-प्राणवायु विहीन ,अपनी जीवन यात्रा को सम्पूर्ण कर इस आस में पुत्र,पौत्रों या रक्त सम्बन्धियों से काष्ठ सर्जित प्रज्वलित होकर जैसे महादेव को प्रणाम के लिए उठती लप-लप लपटें निष्काम मानवदेह को अग्निदेव, महादेव के आदेश पर उस देह को मानो लपटों के रूप में नृत्य करते हुए शनै-शनै भस्मीभूत करना प्रारम्भ कर देते हों।
हा बिल्कुल इस प्रकार से मेरे आत्मज,मेरी छोटी सी देह में अपनी प्राणवायु देकर इस संसार में आगत करनें वाले मेरे पिता जी,अशेष स्मृता श्री पन्नालाल सेठ जी को पार्वती पतये के द्वारा पंचतत्व से बने देह को भस्मीभूत होने पर अपने अंक में समेट शिवधाम चले गए।
तीसरी बार हृदयाघात के शिकार होकर महाकाल की मोक्षनगरी काशी में अपनी आत्मा को नाथों के नाथ विश्वनाथ में विलीन कर उनके बन गए।

रविवार के दिन ही एक तरफ़ ऊपर गगन से मेरे आत्मज का शिवलोक गमन पर नीर-क्षीर ढलकाते हुए
प्रफुल्लित हृदय से स्वागत कर रहीं थी तो दूसरी तरफ़ काशी नगरी ही नही बल्कि भोलेनाथ के भक्तों के अनन्तिम प्रिय स्थान चौबीसों घण्टे प्रज्ज्वलित चिताओं के अद्भुत तेज़ -ताप और प्रकाश में काशी की नगरवधुएं संगीत मय समर्पित नृत्य गीत महादेव को समर्पित कर रही थी।
लगता था कि जैसे महादेव ने मेरे पिताजी को अपनी अँकवार में भरकर ले जाने के लिए ही यह विशेष दिवस और मोक्षनगरी काशी में इलाज़ के लिए जौनपुर से अपनी नगरी में बुला लिए हो।वहीँ माँ आदिशक्ति स्वरूपा नवदुर्गा माता का भी शक्तिपूजन दिवस भी प्रारम्भ है।शिव और शक्ति प्रिय पिताजी मेरे स्मृतियों में मेरे अनन्तिम साँस तक बसें रहेंगे।
मन तो बहुत ही विचलित है,स्मृतियों के पल और पन्ने पलटते जाते हैं पीछे की तरफ़।याद आते हैं उनके सबक-सीख और संत्रास भी साथ ही वह लाड़ दुलार प्यार भी।वह पहली टॉफी,पहली चॉकलेट, पहली तीनपहिया सायकिल और वह पहले जूते भी।जिसे पहनकर मैं आसमां नापने को निकल पड़ता था।
75 वर्ष में अचानक शिवधाम चले गए पिताजी को परमपिता अपने श्रीचरणों में स्थान दें,मोक्ष दें।
÷लेखक शिवलोकधाम वासी स्मृतिशेष श्री पन्ना लाल सेठ जी के अग्रज सुपुत्र हैं
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