लेखक~राजीव कुमार
♂÷ जस्टिस एएम अहमदी ने चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया वेंकटाचलैया से अपना कार्यभार 1994 में ग्रहण किया और वह 1997 तक चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया के सर्वाधिक गरिमामयी सम्मानित और न्यायिक तन्त्र में सर्वोच्च शिखर पायदान पर विराजमान रहें।
किन्तु वह अपने कार्यकाल के दौरान कई मामलों में विवादों के घेरे में रहे तो सेवानिवृत्त के बाद भी वह बहस का विषय बने रहे कि व्यक्तिगत लाभ हेतु अनेको बार उन्होनें अपने प्रभावशाली पद व पहुँच का दुरुपयोग किया। भारत ही नही बल्कि दुनियां में बड़ी त्रासदी में गिने जाने वाले भोपाल गैस काण्ड के मामले में जस्टिस अहमदी के दिये हुए फ़ैसले आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। गैस लीक मामले में आपराधिक धाराओं को कमजोर करने और अभियुक्तों को बरी करने में अहमदी साहब ने बड़ी तत्परता दिखाई थी।
भोपाल गैस त्रासदी की लम्बी सुनवाई के दौरान कुल 7 (सात) बार जजों की बेंच बदली, लेकिन आश्चर्यजनक रुप से हर बार प्रत्येक बेंच में जस्टिस अहमदी जरुर शामिल रहे (क्या गजब का संयोग है)। अहमदी साहब ने यूनियन कार्बाइड के साथ सरकार की डील को भी आसान बनाया, इसी प्रकार यूनियन कार्बाइड को “भोपाल मेमोरियल अस्पताल” बनाने के लिये 187 करोड़ रुपये भी रिलीज़ करवाये।
मालूम हो कि भोपाल गैस काण्ड काँग्रेस की बहुमत वाली केंद्र की राजीव गाँधी सरकार और मध्यप्रदेश में भी काँग्रेस की अर्जुन सिंह सरकार के दौरान हुई थी और इस भयानक त्रासदी में उस दौरान हज़ारों लोगों की तत्काल मौत हो गयी थी।यह सरकारी आंकड़ा है जबकि वास्तविक रूप से मृतकों की संख्या बहुत ज्यादे थी।दशकों तक लोग शारिरिक अक्षमता के साथ पैदा होते रहें।
रिटायरमेण्ट के तत्काल बाद अहमदी साहब, भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट अस्पताल के “लाइफ़टाइम चेयरमैन” नियुक्त हो गये, यानी उसी गैस काण्ड में हजारों की जान लेने वाली अमेरिका की यूनियन कार्बाइड कम्पनी के उसी अस्पताल में जिसकी सुनवाई उन्होंने चीफ़ जस्टिस रहते अपने कार्यकाल में बरसों तक की… (गजब का संयोग है, है ना?)
अहमदी साहब की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती… एक कारनामा और है जिसकी तरफ़ सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील प्रशान्त भूषण ने अपने एफ़िडेविट में इशारा किया है।
फ़रीदाबाद के बड़खल और सूरजकुण्ड झीलों के आसपास पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से मुख्य न्यायाधीश कुलदीप सिंह की खण्डपीठ ने 10 मई 1996 को झील के आसपास 5 किमी परिधि में सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद झील के आसपास चल रहे “कान्त एन्कलेव” नामक बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कम्पनी के सभी निर्माण कार्य रोक दिये गये, क्योंकि सूरजकुण्ड झील के पास की भूमि पंजाब लैण्ड एक्ट के तहत वन्यक्षेत्र घोषित कर दी गई थी। अब सोचिये, यह तो हो नहीं सकता कि न्यायिक क्षेत्र में उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को यह बात मालूम न हो, उन्हीं के एक सहयोगी द्वारा पर्यावरण चिंताओं के मद्देनज़र लगाये गये प्रतिबन्ध के बावजूद अहमदी साहब ने मुख्य न्यायाधीश रहते यहाँ प्लॉट खरीदे, न सिर्फ़ खरीदे, बल्कि उन पर अपने रहने के लिये मकान भी बना लिया। जैसे ही कुलदीप सिंह साहब रिटायर हुए और ये मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर काबिज हुए, इन्होंने सबसे पहले बड़खल/सूरजकुण्ड केस की पार्टी कान्त एनक्लेव की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए निर्माण पर रोक के निर्णय की समीक्षा के लिये एक बेंच का गठन कर दिया। 11 अक्टूबर 1996 को झील के आसपास 5 किलोमीटर परिधि में निर्माण पर प्रतिबन्ध की सीमा को घटाकर 1 किमी कर दिया गया। (अंदाज़ा लगाईये कि 4 किमी की परिधि की अरबों-खरबों की ज़मीन में ठेकेदारों का कितना फ़ायदा हुआ होगा), अहमदी साहब यहीं नहीं रुके… 17 मार्च 1997 को कान्त एनक्लेव की एक और याचिका पर उन्होंने झील के इस क्षेत्र में निर्माण कार्य करने से पहले प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की मंजूरी लेने का प्रावधान भी खत्म कर दिया।
कुल मिलाकर साफ़ तथ्य यह है कि जस्टिस अहमदी का “कान्त एनक्लेव” में बना हुआ बंगला पूरी तरह से अवैध है ,और पर्यावरण मानकों के खिलाफ़ बना हुआ है ……।
कमाल की बात तो ये है कि ,सन् 2010 से ही NGT यानि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना के साथ ही ये माननीय लोग , नित नई नौटंकी रचते है , कभी कलकत्ता मे बिल्डिंग गिरवाते है ,तो कभी यमुना इकोसिस्टम को हुए नुकसान की भरपाई ,श्री श्री के ट्रस्ट पर पाँच करोड का जुर्माना लगाकर करते है , कभी किसी नदी मे छठ पूजा से पहले बखेडा करते है ………
जस्टिस स्वतंत्र कुमार, के बंगलो और प्राॅप्रटी पर किसी की नजरे इनायत क्यों नही होती ????? शायद इसीलिए कि वो खुद ही NGT के सर्वेसर्वा बने हुए है ?????????

÷ये लेखक के व्यक्तिगत विचार है, लेखक राजीव कुमार प्रख्यात ब्लॉगर हैं÷




