लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷यह उचित है कि भारत ने 1960 के सिंधु जल समझौते में संशोधन के लिए पाकिस्तान को नोटिस थमा ताकीद कर दिया है कि वह संशोधन के लिए 90 दिन में बातचीत शुरु करे। भारत का यह कड़ा रुख इसलिए भी आवश्यक है कि सिंधु जल आयोग की बीती पांच बैठकों (2017 से 2022) में संशोधन का मुद्दा उठाए जाने के बाद भी पाकिस्तान सुनने को तैयार नहीं है। जबकि सच्चाई है कि 1960 के सिंधु जल समझौते के तहत भारत अपने हिस्से का पूरा पानी इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। भारत जब भी अपने हिस्से का जल इस्तेमाल करने की कोशिश करता है पाकिस्तान रुकावट पैदा करता है। याद होगा वर्ष 2015 में पाकिस्तान ने भारत की किशनगंगा और पन बिजली परियोजनाओं को लेकर कड़ी आपत्ति जतायी थी और आपत्तियों को मध्यस्तता अदालत में ले जाने का प्रस्ताव किया। अब भारत का स्पष्ट रुख है कि सिंधु जल संधि के दौरान विगत 62 साल में मिले अनुभवों को शामिल कर इसमें संशोधन किया जाए। पाकिस्तान इसे मानने को तैयार नहीं है। वह इस मुद्दे को वल्र्ड बैंक की चैखट तक खींच ले जाने की धमकी देता है। अब सवाल यह है कि अगर पाकिस्तान सकरात्मक रुख नहीं दिखाता है तो भारत के सामने क्या विकल्प होगा? क्या भारत सिंधु जल समझौते के तहत अपने हिस्से के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकेगा? फिलहाल भारत के पास इससे इतर कोई विकल्प नहीं है। उल्लेखनीय है कि सिंधु जल समझौते के मुताबिक सतलुज, ब्यास और रावी नदी का पानी भारत को मिला है जबकि चेनाव, झेलम और सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान के हिस्से में है। इन नदियों के कुल 16.8 करोड़ एकड़-फुट पानी में से भारत को उसके लिए आवंटित तीनों नदियों से 3.3 करोड़ एकड़-फुट पानी मिलता है, जो कुल जल का 20 प्रतिशत है। भारत अपने हिस्से का करीब 93-94 प्रतिशत पानी उपयोग करता है और शेष पानी बहकर पाकिस्तान में चला जाता है।

भारत अपने हिस्से के जल का इस्तेमाल करने के लिए पंजाब के शाहपुर कांडी बांध परियोजना, सतलुज-ब्यास की दूसरी लिंक परियोजना और जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित उज्ज बांध परियोजना को जल्द पूरा करने की कोशिश में है। अगर ये तीन परियोजनाएं पूरी हो जाती हैं तो भारत अपने हिस्से के जल का पूरा उपयोग करने लगेगा और पाकिस्तान को अतिरिक्त जल मिलना मुश्किल हो जाएगा। सिंधु दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से है और इसकी लंबाई तकरीबन 3000 किलोमीटर से भी अधिक है। पाकिस्तान सिंचाई एवं अन्य कार्यों में जल के उपयोग के लिए इस पर कई बांध बना रखे हैं जिससे बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन होता है। पाकिस्तान की 2.6 करोड़ एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई इन नदियों के जल पर ही निर्भर है। सिंधु जल संधि सद्भावना पर आधारित है। यह जल संधि आधुनिक विश्व के इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा संधि है और यह भारत की उदार रवैए के कारण ही संभव हुआ। जानना जरुरी है कि विश्व बैंक की मध्यस्थता से ही 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को आकार दिया गया। सिंधु जल संधि समझने के लिए दो बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। एक, यह कि सिंधु नदियों की व्यवस्था राजनीतिक विभाजन की दृष्टि से नहीं बनायी गयी थी। इसीलिए भौगोलिक दृष्टि से विभाजन के उपरांत पाकिस्तान को 18 मिलियन एकड़ भूमि सिंचाई योग्य मिली और भारत को 5 एकड़ मिलियन सिंचाई वाली भूिम उपलब्ध हुई। तब सिंधु नदी क्षेत्र में भारत की 20 मिलियन जनसंख्या रहती थी जबकि पाकिस्तान की इस प्रकार की आबादी 22 मिलियन थी। दूसरा, यह कि इस सिंधु नदी क्षेत्र में कुल सात नदियां सम्मिलित थी जिसमें से सिंधु स्वयं पश्चिम में थी तथा काबुल एवं उसकी पांच सहायक नदियां-झेलम, चिनाब, रावी, सतलुज और व्यास पूर्व में स्थित थी। इनमें से काबुल को छोड़ सिंधु, झेलम और चिनाब मुख्य रुप से पाकिस्तान में बहती हैं तथा ये सिंधु क्षेत्र में लगभग 80 फीसद पानी को बहा ले जाती हैं। दूसरी ओर रावी व सतलुज मुख्य रुप से तथा ब्यास पूर्ण रुप से भारत में बहती है। संधि के मुताबिक भारत को इन छः नदियों का 80 फीसद जल पाकिस्तान को देना पड़ता है जबकि भारत के हिस्से में सिर्फ 19.48 फीसद पानी आता है। उल्लेखनीय है कि पंजाब के राजनीतिक विभाजन के कारण नहरी पानी विवाद सतह पर उभरा। यह विवाद 1 अप्रैल, 1948 को तब उभरा जब भारत के पंजाब प्रांत को सरकार ने पानी की रकम अदायगी न करने के कारण पाकिस्तान जाने वाला पानी रोक दिया। परंतु दोनों सरकारों ने इसे कानूनी मुद्दा न बनाते हुए द्विपक्षीय स्तर पर 4 मई, 1948 को हुए समझौते के अंतरगत हल कर लिया। लेकिन कुछ समय बाद फिर विवाद उत्पन हो गया। पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत उसे पानी की उचित मात्रा नहीं दे रहा है। दूसरी ओर भारत ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान अपने पंजाब प्रांत के विकास हेतु अपने साधनों के द्वारा वैकल्पिक स्रोत नहीं ढुंढ़ रहा है। यहां जानना जरुरी है कि ये नहरें आर्थिक दृष्टिकोण से उस समय बनायी गयी थी जब भारत के विभाजन का विचार किसी की सोच में नहीं था। लेकिन भारत विभाजन के उपरांत नहरों के पानी का असंतुलित विभाजन उभरकर सामने आ गया। ध्यान देना होगा कि पंजाब की पांचों नदियों में से सतलज और रावी दोनों देशों के मध्य से बहती हैं। झेलम और चिनाव पाकिस्तान के मध्य से और व्यास पूर्णतया भारत में बहती है। किंतु भारत विभाजन के उपरांत भारत के नियंत्रण में वे तीनों मुख्यालय आ गए जिनसे दोनों देशों की नहरों को पानी की आपूर्ति की जाती थी। पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत सिंचाई के लिए इन नहरों पर आश्रित हैं। विभाजन के उपरांत पाकिस्तान के मन में आशंका उपजी कि भारत जब चाहे तब पानी बंद करके उसे भूखों मार सकता है। लिहाजा उसने विभाजन के बाद उसने नहरी पानी को लेकर विवाद शुरु कर दिया। इसी संदर्भ में अमेरिका के एक विशिष्ट विशेषज्ञ डेविड लिलियेन्थल 1951 में भारत का दौरा करके बताया कि सिंधु नदी जल का 20 फीसद से भी कम भाग प्रयोग में लाया गया है तथा इस नदी के संग्रह क्षेत्र में से गुजरता हुआ छः नदियों का यह पानी बिना प्रयोग किए ही अरब सागर में गिर जाता है। लिहाजा उन्होंने दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए दोनों देशों को सलाह दी कि वे इस समस्या को राजनीतिक स्तर से हटाकर तकनीकी एवं व्यपारिक स्तर पर सुलझाने का प्रयास करें। इसके लिए उसने विश्व बैंक से मदद लेने की सिफारिश की। इस संदर्भ में सितंबर 1951 में विश्व बैंक के अध्यक्ष यूजीन ब्लेक ने मध्यस्थता करना स्वीकार कर लिया लेकिन पाकिस्तान ने कुछ आपत्तियां जतायी। बावजूद इसके यूजीन ब्लेक और उसके बाद मिस्टर इल्कि के सहयोग से वर्षों तक बातचीत चलने के उपरांत 19 सितंबर, 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच जल के सवाल पर एक समझौता हो गया। इस समझौते को सिंधु जल संधि नाम दिया गया। इस समझौते पर भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए। 12 जनवरी 1961 को इस संधि की शर्तें लागू कर दी गयी और इस प्रकार दोनों देशों के बीच विवाद का अंत हो गया। लेकिन इस योजना के अनुसार भारत को केवल इस क्षेत्र में बहने वाले पानी का कुल 20 फीसद ही प्राप्त हुआ जो इसकी सिंचाई योग्य 26 एकड़ मिलियन भूमि के लिए पर्याप्त नहीं है। इस समझौते से भारत को नुकसान हो रहा है। फिलहाल भारत के लिए इस समझौते को रद्द करना संभव तो नहंी है लेकिन इसमें संशोधन जरुर किया जा सकता है। भारत साझा हल चाहता है जबकि पाकिस्तान की मंशा इसे वल्र्ड बैंक की अदालती कार्रवाई में उलझाए रखना है। अब देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान क्या रुख अपनाता है। लेकिन अगर भारत ने अपने हिस्से के पानी रोक लिया तो पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़नी तय है। वह पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेगा। कृषि, उद्योग-धंधे और पीने के पानी को लेकर हाहाकार मचेगा।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




