लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷भारत और चीन की सेनाओं के बीच अरुणाचल प्रदेश के तवांग में टकराव को लेकन कांग्रेस नेता राहुल गांधी का यह बयान कि चीनी सैनिकों द्वारा एलएसी पर भारतीय सैनिकों की पिटाई की जा रही है, न सिर्फ देश के जवानों का मनोबल तोड़ने वाला है बल्कि देश की साख से खिलवाड़ भी है। दुनिया के किसी भी देश में शायद ही ऐसा परिदृश्य उभरा हो जब मुख्य विपक्षी दल का शीर्ष नेता अपनी सियासत को चमकाने के लिए देश और सेना की साख से खिलवाड़ करे। दुनिया को पता है कि तवांग में भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों की जमकर कुटाई-पिटाई की और उन्हें भागना पड़ा। लेकिन आश्चर्य है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अपने ही सैनिक मार खाते नजर आए। बेशक राहुल गांधी को अधिकार है कि वह सरकार की नीतियों की आलोचना करें। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि देश व सेना की छवि और अस्मिता के परखच्चे उड़ा दें। उन्हें समझना होगा कि देश की साख और मर्यादा की रक्षा की जिम्मेदारी जितना सेना और सरकार की है उतना ही विपक्ष और उसके नेताओं की भी। लेकिन शायद राहुल गांधी इससे सहमत नहीं हैं। यह पहली बार नहीं है जब विपक्षी दलों द्वारा सेना को नीच दिखाने की कोशिश हुई हो। याद होगा जब सेना ने पाकिस्तान संरक्षित आतंकी समूहों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया तब भी सैनिकों की सफलता पर सवाल दागा गया। तब विपक्षी दल सेना की हौसला आफजाई करने के बजाए शत्रु देश के दुष्प्रचार के साथ कंधा जोड़ते नजर आए। तब वे कहते सुने गए कि अगर सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया है तो सरकार उसका प्रमाण क्यों नहीं दे रही है? तब आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो मैसेज जारी कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सर्जिकल स्ट्राइक के प्रमाण पत्र मांगे थे। कांग्रेसी नेता संजय निरुपम ने कहा था कि हर भारतीय पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक चाहता है पर फर्जी नहीं। कुछ इसी तरह के विचार पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी रखे थे। जबकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों दल इस तथ्य से भलीभांति अवगत थे कि सर्जिकल स्ट्राइक सेना ने की है। लेकिन उन्हें लगा कि इसका श्रेय सरकार को मिल सकता है ऐसे में वे सरकार पर सवाल दागने के साथ-साथ सेना की साख से भी खेलना शुरु कर दिए। इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। गौर करें तो तवांग में भारतीय सैनिकों की बहादुरी का वीडियो वायरल हुआ और उनकी चतुर्दिक प्रशंसा शुरु हुई तो शायद कांग्रेस के मन में डर सताने लगा कि इसका श्रेय सरकार को न मिल जाए। लिहाजा वे सरकार की आलोचना के साथ सैनिकों की भी बेइज्जती शुरु कर दिए। समझना कठिन है कि कांग्रेस को सेना और सैनिकों की बहादुरी से इतनी नफरत क्यों है? बेशक कांग्रेस और राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार से चिढ़ने का हक है। लेकिन सेना से चिढ़ और चीन के साथ कंधा जोड़ने की मजबूरी कैसी। याद होगा जब डोकलाम के मसले पर भारत-चीन के बीच टकराव बढ़ा तब भी कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने सरकार पर हमला बोलकर सेना के मनोबल को तोड़ने की कोशिश की। यह धारणा फैलाया गया कि चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों पर भारी पड़ रहे हैं। लेकिन नतीजा क्या निकला? अंततः डोकलाम के मसले पर चीन को अपनी हठधर्मिता के केंचुल से बाहर आना पड़ा। जल्द ही चीन के समझ में आ गया कि मौजूदा भारत 1962 का भारत नहीं है। चीन की धमकी के बावजूद भी भारत 72 दिन तक अपने इस रुख पर कायम रहा कि डोकलाम से डोका ला तक सड़क निर्माण का मसला महज चीन-भूटान तक सीमित नहीं है बल्कि यह भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने वाला है और भारत इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। तब चीन द्वारा बार-बार भारत को युद्ध की धमकी देकर उकसाने की कोशिश की गई लेकिन भारत ने धौंसबाजी का जवाब कुटनीति से दिया। चीन को पीछे हटना पड़ा और अमेरिका व जापान समेत दुनिया के सभी देश भारत के समर्थन में आ खड़े हुए। उन्होंने चीन के विस्तारवादी नीति की आलोचना की। तवांग के मसले पर भी दुनिया भारत के साथ है। फिर समझना कठिन है कि कांग्रेस और उसके नेता सेना और सरकार पर सवाल दागकर बार-बार चीन को मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने पर आमादा क्यों हैं? कांग्रेस और राहुल गांधी को समझना होगा कि आज अगर भारत-चीन के बीच सीमा पर विवाद है तो इसके लिए देश में दीर्घकाल तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ही जिम्मेदार है। कांग्रेस की कमजोरी के कारण ही चीन 1962 में लड़े गए युद्ध को भारत की हठधर्मिता की उपज मानता है न कि अपनी गलती। गत वर्ष पहले उसने ग्लोबल टाइम्स के एक लेख में कहा कि पचास साल पहले भारतीय सरकार स्वार्थी हितों में अंधी हो गयी थी और चाहती थी कि चीन काॅलोनियल शक्तियों की तय की गयी सीमा को स्वीकार करे। वह यह भी आरोप लगा चुका है कि भारत की नेहरु सरकार अमेरिका और सोवियत संघ के उकसावे में आकर 1959 से 1962 के बीच भारत-चीन सीमा पर समस्याएं खड़ा की थी। मौंजू सवाल यह है कि चीन के इस आरोप का कांग्रेस पार्टी ने करारा जवाब क्यों नहीं दिया? इतने संगीन आरोप के बावजूद भी राहुल गांधी का चीन से प्रेम क्यों है? याद होगा 2009 में चीनी सैनिकों ने दक्षिण-पूर्वी लद्दाख में प्रवेश कर सड़क निर्माण रुकवाया और 2012 में भारतीय सीमा में घुसकर चट्टानों पर चीन-9 लिखा। नवंबर 2012 में चीन अपनी नई ई-पासपोर्ट व्यवस्था में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चीन के कुछ क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताया था। तब तत्कालीन कांग्रेस की नेतृत्ववाली मनमोहन सरकार चुप रही। नतीजा चीन का हौसला बढ़ता गया। सच कहें तो चीन की बढ़ती सनक के लिए कांग्रेस पार्टी की नीति ही जिम्मेदार है। जानना आवश्यक है कि भारत-चीन के बीच सर्वाधिक विवाद पश्चिमी (लद्दाख) और पूर्वी (अरुणाच लप्रदेश) सेक्टर को लेकर है। पश्चिमी सेक्टर में भारत को चीन के कब्जे वाले अक्साई चीन पर लगभग 3800 वर्ग किमी का दावा है। चीन अगर अरुणाचल प्रदेश, ब्रहमपुत्र बांध और जम्मू व कश्मीर को लेकर वितंडा खड़ने की कोशिश करता है या पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी पर अपना दावा करता है तो उसके लिए सत्ता में रहते हुए कांग्रेस पार्टी का लचर रवैया ही जिम्मेदार रहा है। अगर चीन तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा के अरुणाचल प्रदेश के दौरे को लेकर नौटंकी दिखाया या अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा के अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को लेकर आगबबूला हुआ तो उसके लिए भी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की चीनपरस्त नीति ही जिम्मेदार है। आज अगर तवांग पर चीन की कुदुष्टि लगी है और वह बार-बार तनाव पैदा कर रहा है तो उसके लिए भी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की कुटनीति ही जिम्मेदार है। अगर समय रहते कांग्रेस की सरकारें सीमा विवाद को सुलझा ली होती या चीन को उसी की भाषा में जवाब दी होती तो आज चीन दुस्साहस नहीं दिखाता। याद होगा गत वर्ष पहले चीन ने सिक्किम के मसले को तूल देकर भारत को घेरने की कोशिश की। उसने सिक्किम के सवाल पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोला। लेकिन मौजूदा भारत की सरकार की सख्ती और जुझारु सैनिकों के कड़े तेवर के आगे उसकी एक नहीं चली। चीनी सैनिकों को उल्टे पांव भागना पड़ा। डोकलाम और तवांग से भी चीनी सैनिकों को भागना पड़ा। दरअसल चीन 2014 के बाद भी भारत को 1962 वाला भारत ही समझने की गलती कर रहा है। लेकिन गत वर्ष पहले पूर्व विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और पूर्व रक्षा मंत्री अरुण जेटली दोनों ने एक सवाल के जवाब में चीन को चेता-समझा दिया कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है। उसे एक इंच भारतीय जमीन हड़पने की भारी कीमत चुकानी होगी। उचित होगा कि चीन की तरह कांग्रेस पार्टी भी समझ ले कि चीन की पक्षधरता करके उसे सत्ता हासिल होने वाला नहीं है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




