लेखक -संजय राय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार दिल्ली की सत्ता संभालने के बाद 8 से 10 जुलाई, 2024 को रूस और ऑस्ट्रिया का दौरा किया।
प्रधानमंत्री के इस दौरे पर अमेरिका और यूरोप और मध्य-पूर्व के देशों सहित पूरे विश्व की नजर थी। लगभग 40 साल बाद यूरोप में नए देशों के साथ संबंधों के दायरे में विस्तार के लिए भारत का कोई प्रधानमंत्री ऑस्ट्रिया के दौरे पहुंचा था। दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ उच्च स्तरीय बैठकों के अलावा मोदी ने वहां के भारतीय समुदाय के लोगों के साथ भी मुलाकात की।
रूस लंबे अरसे से रूस भारत का स्वाभाविक निकट सहयोगी देश है और फिलहाल यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसा हुआ है। वास्तविकता यह है कि यूक्रेन युद्ध का मैदान बनकर रह गया है। रूस की असली लड़ाई अमेरिका और नाटो में शामिल यूरोपीय देशों के बीच चल रही है। दरअसल, अमेरिका और नाटो को भारत-रूस की करीबी कभी रास आई ही नहीं। यूक्रेन के साथ युद्ध छिड़ने के बाद से ही ये लोग भारत पर रूस से पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद बंद करने के लिये दबाव बना रहे हैं। भारत ने इन लोगों की दोहरी नीति का हवाला देकर विश्वमंच पर डंके की चोट पर इनके दबाव में आने से इनकार कर दिया है और रूस के साथ रणनीतिक एवं कारोबारी रिश्तों को लगातार मजबूत करने में जुटा हुआ है। रूस को अलग-थलग करने की इन देशों की रणनीति में भारत ने कभी भी अपने कंधे का इस्तेमाल नहीं होने दिया। मोदी के इस बार के रूस दौरे ने भारत की रूस के प्रति इस नीति पर एक ऐतिहासिक मुहर लगाने का काम किया है।
भारत और रूस के बीच लंबे समय से यह सहमति बनी हुई कि दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष दो साल में एक बार दिल्ली और मास्को में उच्च स्तरीय बैठक करके आपसी रणनीतिक संबंधों की समीक्षा करेंगे। रूस-यूक्रेन युद्ध और कोविड-19 महामारी के कारण इसमें बाधा आ गयी थी। लेकिन अब प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे ने पुरानी व्यवस्था के तहत चल रहे सिलसिले को फिर से शुरू करने की उम्मीद जगा दी है।
मोदी के रूस दौरे को लेकर अमेरिका की तिलमिलाहट सामने आई है, क्योंकि इस दौरे से पुतिन को नैतिक मजबूती मिली है। इस समय अमेरिका, ब्रिटेन और नाटो के अन्य देश तिलमिलाने के अलावा भारत पर अलग से दबाव बनाने की स्थिति में नहीं हैं। प्रधानमंत्री के रूस दौरे से अमेरिका और यूरोप की कोशिशों को जो झटका लगा है, उसकी गूंज चीन में भी सुनायी दे रही है। चीन ने भारत की विदेशनीति की प्रशंसा की है। दरअसल भारत की इस कूटनीति ने एकधु्रवीय विश्व व्यववस्था कायम करने की अमेरिका की कोशिशों को नाकाम करने का काम किया है। स्वाभाविक रूप से चीन को भारत का यह रुख अपने हितों के अनुकूल दिख रहा है।
यूक्रेन में बच्चों के अस्पताल पर रूस के हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में हमले में मारे गये लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की। लेकिन अमेरिका, यूक्रेन और यूरोप उनके बयान से इसलिये नाराज हैं कि रूस के हमले निंदा नहीं की। प्रधानमंत्री मोदी पुतिन से पहले भी कह चुके हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है और इस बार वियना में भी उन्होंने इस कथन को दोहराया है। अगर अमेरिका और यूरोप के देश चाहते हैं कि भारत अपने हितों की बलि देकर रूस पर दबाव बनाये और यूक्रेन के साथ लड़ाई बंद करवाये, तो यह कुछ ज्यादा अपेक्षा हो, जो हरगिज संभव नहीं है। भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और इस तरह के दबाव के आगे बदलने वाली नहीं है।
गौर करने वाली बात यह है कि जिस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मास्को में थे, उसी समय अमेरिका में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की भी थे। अमेरिका में नाटो देशों के 32 सदस्य देश भी वार्ता की मेज पर थे। इस बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की सहमति के साथ नाटो देशों ने यूक्रेन को सैन्य सहायता जारी रखने और इसे बढ़ाने का निर्णय लिया। यूक्रेन को एफ-16 फाइटर जेट, पैट्रिएट जैसी प्रतिरक्षी मिसाइल और अन्य देने का भरोसा दिया।
भारत और रूस के बीच रक्षा संबंध काफी प्रगाढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा ने इसे और मजबूती दी है। रूस ने भारतीय सैन्य बलों के लिए आयातित रूसी हथियार और साजो सामान के लिए उसके कल पुर्जे की निर्बाध आपूर्ति पर सहमति जताई है। इससे रूस के तकनीशियनों और हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड के प्रयास से भारत में तकनीकी हस्तांतरण प्रक्रिया के सेवा में शामिल सुखोई-30 एमकेआई फाइटर जेट को चुस्त दुरुस्त रखने में मदद मिलेगी। साथ ही रक्षा क्षेत्र के अन्य साजो सामान का भी रख-रखाव हो सकेगा। दोनों देशों के बीच में परमाणु उर्जा के क्षेत्र में भी बड़ी सहमति बनी है। रूस कई और परमाणु संयंत्रों की स्थापना, आपरेशन में विशिष्ट सहयोगी रहेगा। इसके अलावा, विज्ञान, तकनीकी, अंतरिक्ष समेत अन्य क्षेत्रों में भी दोनों देशों में सहमति बनी है।
इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को सम्मानित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से नवाजा। पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल’ से नवाजा। यह रूस का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। इस सम्मान से नवाजे जाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ये भारत के 140 करोड़ लोगों का सम्मान है।
कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का रूस दौरा वैश्विक स्तर पर कूटनीति की दिशा को संतुलित करने की दृष्टि से बेहद सफल रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन ने भी वैश्विक कूटनीतिक मंच पर भारत की भूमिका को तहे दिल से स्वीकार करके सराहा है। उम्मीद की जा सकती है कि दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों को कम करने के लिये जारी प्रयासों को गति मिलेगी।
जहां तक प्रधानमंत्री के आॅस्ट्रिया दौरे की बात है, इसे फिलहाल बस इसी संदर्भ में सफल देखना उचित रहेगा कि अमेरिका और नाटो की सैन्य गुटबंदी से दूर रहकर भारत ने यूरोप में फ्रांस, इटली और जर्मनी जैसे कई देशों के साथ प्रगाढ़ संबंध बना रखे हैं। इस सूची में ऑस्ट्रिया भी शामिल हो गया है।

(लेखक “आज” अखबार के नेशनल ब्यूरो इन चीफ के पद पर दिल्ली में कार्यरत हैं)




