लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷शतरंज के खेल में चालें महत्त्वपूर्ण होती हैं। इसमें वही खिलाड़ी जीतता है, जो प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की कम से कम चार चालें पहले से समझकर अपनी चालें निर्धारित कर सकता हो। युद्ध और राजनीति में भी ऐसा ही होता है। महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसी ही चालें सोचने और चलने के लिए जाने जाते हैं मराठा छत्रप शरद पवार।
हाल ही में एक ऐसा प्रकरण सामने आया, जिससे लोगों को राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार की शातिर चालों का एक बार फिर अहसास होने लगा है। ये प्रकरण नवंबर 2019 की एक सुबह भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार द्वारा क्रमशः मुख्यमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से संबंधित है। उन दिनों चल रही सत्ता की अनिश्चितता के बीच तत्कालीन राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने 23 नवंबर, 2019 की सुबह छह बजे ये शपथ दिलवाई थी। लेकिन यह सरकार 48 घंटे के अंदर ही धराशायी हो गई थी, क्योंकि अजीत पवार ने जल्दी ही पाला बदलकर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। इस घटनाक्रम के बाद तो देवेंद्र फडणवीस की नासमझी एवं भाजपा की सत्तालोलुपता को लेकर तमाम चर्चाएं जो शुरू हुईं, वो अभी तक थमी नहीं हैं। अब भी विपक्षी दल ‘48 घंटे की सरकार’ और ‘भोर पहर की शपथ’ के लिए फडणवीस का मजाक बनाने से नहीं चूकते। शायद खुद फडणवीस को भी उस समय समझ में नहीं आया था कि ये क्या और कैसे हो गया।
लेकिन फडणवीस गाहे-बागाहे यह आरोप लगाते रहे हैं कि 23 नवंबर, 2019 की भोर पहर में हुआ उनका और अजीत पवार का शपथ ग्रहण राकांपा सुप्रीमो शरद पवार की मर्जी से हुआ था। उनके इस आरोप पर उनके साथ ही शपथ लेनेवाले अजीत पवार ने आज तक चुप्पी साध रखी है। स्वयं शरद पवार भी लंबे समय तक कुछ नहीं बोले। लेकिन पिछले सप्ताह जब उन्होंने मुंह खोला, तो लोगों को एक बार फिर उनकी शातिराना चालों का अहसास हो गया। शरद पवार से जब पत्रकारों ने फडणवीस के आरोपों के बारे में पूछा, तो पवार ने प्रतिप्रश्न किया कि यदि वह शपथ ग्रहण न हुआ होता, तो महाराष्ट्र में लगा राष्ट्रपति शासन कैसे हटता ? और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ कैसे लेते ? पवार के इस वक्तव्य से पता चलता है कि राष्ट्रपति शासन हटवाने के लिए ही शरद पवार ने उस समय अपने भतीजे अजीत पवार को देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ दिलवाई, और 48 घंटे के अंदर त्यागपत्र दिलवाकर चंद दिनों बाद ही शिवसेना और कांग्रेस के साथ मिलकर महाविकास आघाड़ी (मविआ) की सरकार बनवा दी, जो करीब ढाई साल चली। उनकी इस चाल को तब देवेंद्र फडणवीस भी समझ नहीं पाए।
उस दौरान के घटनाक्रम को याद करें तो 24 अक्तूबर, 2019 को महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे। उससे पहले तक भाजपा और शिवसेना का गठबंधन पक्का नजर आ रहा था। लेकिन चुनाव परिणाम आते ही शिवसेना का रुख अचानक बदल गया। फडणवीस की मानें तो उद्धव ठाकरे ने उनका फोन तक उठाना बंद कर दिया था। दूसरी ओर उद्धव के सिपहसालार संजय राउत का राकांपा सुप्रीमो शरद पवार से मेलजोल दृष्टिगोचर होने लगा था। कुछ दिनों बाद इस मेलजोल में कांग्रेस भी शामिल हो गई। लेकिन इधर कांग्रेस-राकांपा-शिवसेना के बीच सत्ता की शर्तें निश्चित नहीं हो पा रही थीं, तो उधर भाजपा के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं था। इसलिए राज्यपाल के पास कोई भी सरकार बनाने का दावा लेकर नहीं पहुंच रहा था। इसलिए राज्यपाल ने चुनाव परिणाम आने के 19वें दिन, यानी 12 नवंबर, 2019 को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी।
एक बार राष्ट्रपति शासन लग गया तो लंबा खिंच सकता था। क्योंकि शिवसेना जिनके साथ सरकार बनाने का प्रयास कर रही थी, उन दलों के साथ उसका चुनावपूर्व गठबंधन नहीं था। इसके अलावा भी राज्यपाल के पास शिवसेना का दावा स्वीकार न करने के अनेक कारण हो सकते थे। राजनीति की इस बारीकी को सियासत के मंजे खिलाड़ी शरद पवार बखूबी समझ रहे थे। संभवतः इसीलिए शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा की महाविकास आघाड़ी का गठन होने और इन तीनों दलों के बीच सत्ता की शर्तें निर्धारित हो जाने के बाद पवार ने राष्ट्रपति शासन हटवाने का वह अजूबा रास्ता निकाला, जिसकी कल्पना राजनीति के धुरंधर भी नहीं कर सके। यानी 23 नवंबर की सुबह छह बजे जब पूरा महाराष्ट्र सो रहा था, उस समय देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजीत पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर भाजपा-राकांपा सरकार बनाने की घोषणा कर दी। लेकिन 48 घंटे की अंदर ही अजीत पवार ने पुनः अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, और फडणवीस की सरकार गिर गई। अब तक महाविकास आघाड़ी (मविआ) का गठन चुका था। राज्य से राष्ट्रपति शासन भी हट चुका था। मविआ के नेताओं ने राजभवन जाकर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा पेश किया, और 28 नवंबर, 2019 को शिवाजी पार्क में अपने पिता बालासाहब ठाकरे की समाधि के निकट उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। उनकी सरकार करीब ढाई साल चली, जब तक कि शिवसेना में ही बगावत नहीं हो गई।
यह तो था पवार की चालों का एक पहलू, जो देवेंद्र फडणवीस नहीं समझ सके। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, जो उनके नए-नए शागिर्द उद्धव ठाकरे भी नहीं समझ पा रहे हैं। शिवसेना और राकांपा दोनों क्षेत्रीय दल हैं। क्षेत्रवाद की मानसिकता रखनेवाला दोनों का मतदाता वर्ग भी समान है। अब तक सिर्फ विचारधारा का फर्क दोनों के मतदाताओं को अलग कर रहा था। अब वह फर्क भी समाप्त हो चुका है। अब तक राज्य की करीब 60 सीटों पर शिवसेना और राकांपा का तगड़ा मुकाबला होता रहा है। अलग-अलग लड़कर दोनों दलों में सीटों का फासला भी बहुत कम रहता आया है। अब यदि मविआ के सभी दल मिलकर अगला विधानसभा चुनाव लड़े, तो शिवसेना के हाथ कितनी सीटें आएंगी, और वह कितनी जीतेगी, इसका अनुमान उद्धव ठाकरे अभी नहीं लगा पा रहे हैं।
(लेख साभार दैनिक जागरण)

÷लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र के ब्यूरो इन चीफ हैं÷




