लेखक~डॉ.के. विक्रम राव
♂÷भारत राष्ट्र-राज्य का समाज और शासन किसी स्मृति के अनुसार अथवा शरीया के मुताबिक अनुपालित नहीं होगा। केवल गणतंत्रीय संविधान ही एकमात्र पथ और दिशा निर्देशक है और रहेगा। अतः धारा 44 के तहत आदेशित समान नागरिक संहिता ही दिशा सूचक होगी। उत्तराखंड की पुष्कर धामी सरकार ने प्रस्ताव में तो समान संहिता का उल्लंघन करने वाले को मताधिकार से वंचित कर दिया जाएगा। उत्तराखंड राज्य की भांति अन्य भाजपा-शासित राज्य सरकारी द्वारा समान नागरिक संहिता पर विधानमंडल द्वारा कानून बनाने के अधिकार वाले मसले को तो सर्वोच्च न्यायालय ने 9 जनवरी 2023 को स्पष्ट कर दिया कि “संविधान की धारा 162 के अनुसार ऐसा राज्यों का कानूनी अधिकार है।” यूं भी चंद माह बाद होने वाले लोकसभा के आम चुनाव के पूर्व तक सत्तारूढ़ भाजपा को अपना तीसरा वादा पूरा करना होगा। दो हासिल कर लिए गए हैं। पहला था अयोध्या में राम मंदिर का जो तैयार हो रहा है। दूसरा, कश्मीर में 370 का खात्मा कर दिया गया है। समान संहिता के मसले को विवादग्रस्त बनाने के लिए मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी के सांसद सैयद तुफैल हसन के ताजा बयान (20 जून 2023) ने धार तेज कर दी है। इस सपा सांसद ने कहा कि : “समान नागरिक संहिता कानून भाजपा का चुनावी हथकंडा है। भाजपा समाज में दूरियां बढ़ाने के लिए यह कानून लाना चाहती है लेकिन हम मुसलमान शरीयत को ही मानेंगे। इस प्रकार के कानून को स्वीकार नहीं करेंगे। कुरान पाक के हुक्म पर मुसलमान शरीयत के अनुसार काम करता है। इससे कोई मुसलमान समझौता नहीं करेगा। दूसरी शादी भी मजबूरी में लोग करते हैं। किसी की पत्नी बीमार हो गई या बच्चे नहीं हो रहे हैं। इस मामले में पहली पत्नी की इजाजत ली जाती है।” नरम रुख अपनाते हुये जमीयत उलेमा ए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि समान नागरिक संहिता का सड़कों पर उतरकर नहीं बल्कि संविधान के दायरे में रहकर विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मौलिक अधिकारों के खिलाफ है, इसीलिए अस्वीकार्य है।
इन भारतीय मुल्लाओं को याद दिला दें कि इस्लाम के सहारे क्या किया जा चुका है। शरीयत का भोंडा मखौल उड़ाया था हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र और जनहित कांग्रेस पार्टी के उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन ने। उन्होंने अपनी प्रेमिका अनुराधा बाली से शादी करके करने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया और रातों-रात चांद मोहम्मद बन गए। इस्लाम के बहुविवाह-प्रथा का बेजा उपयोग किया। कुछ समय बाद तीन बार तलाक बोल कर पत्नी को छोड़ दिया। तब तक अनुराधा भी श्रीमती फिजा बन गई थी। उसने गम में दम तोड़ दिया था। पंखे से लटक गई थी। तब इस्लाम के सारे ठेकेदार चुप थे।
इस समान नागरिक संहिता का तत्कालिक प्रभाव तो यह पड़ेगा कि संयुक्त हिंदू परिवार को जो कर में रियायत मिलती थी वह सब समाप्त हो जाएगी। मुसलमानों की बहुविवाह प्रथा भी खत्म कर दी जाती। यूं सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक प्रथा का अंत तो कर ही दिया है। सामाजिक एकता के लक्ष्य की दिशा में यह अति महत्वपूर्ण कदम है। एक राष्ट्र में दो कानूनी प्रणालियां तार्किक रूप से भी अमान्य और अवैध हैं। इस्लामी विद्वान असगर अली इंजीनियर ने तो लिखा था कि “कुरान की आयात (4.35) स्पष्ट तौर पर मनमानी तलाक प्रणाली को निषिद्ध करार देती है। तीन तलाक से तो पत्नी को प्रताड़ित ही किया जाता रहा है।” (अमृत बाजार पत्रिका, कोलकता : 4 जनवरी 1996)।
वजनदार और श्रेष्ठतम तर्क समान संहिता के पक्ष में यही है कि एक नागरिकता, एक राष्ट्र, एक कानून परस्पर जुड़े मसले हैं। सेक्युलर गणराज्य में सभी नागरिक कानून के समक्ष सब समान हैं। फिर दृष्टिकोण की ऐसी विषमता क्यों ? जाहिर है कांग्रेस और उसके अन्य कुछ पार्टियां मुसलमानों के वोट बैंक बनाकर बधुवा श्रमिक जैसा रखना चाहते हैं।
इस संहिता के इस मुद्दे पर संविधान सभा (1947-49) में हुई बहस का उल्लेख हो। तब मुस्लिम विधायक मोहम्मद इस्माइल, नसीरुद्दीन अहमद महबूब अली बेग, बोडकांडी पोकर (केरल) आदि ने मुसलमानों को ऐसी समान संहिता से मुक्त रखने का सुझाव दिया था। तब तक इस्लाम पर आधारित राष्ट्र पाकिस्तान बन चुका था। मुसलमानों के सामने अविभाजित भारत में स्पष्ट विकल्प था कि दारुल इस्लाम (पाकिस्तान) में रहे या सेक्युलर भारत भी जहां अब मजहब के आधार पर समाज और राष्ट्र दुबारा नहीं बटेगा।
आजाद हिंदुस्तान में समान संहिता पर कई न्यायिक निर्णय बड़े दूरगामी रहे। इस पर राष्ट्रव्यापी बहस कई बार हो चुकी है। फरवरी 2015 में सर्वोच्च न्यायालय से न्यायमूर्ति सीके प्रसाद और न्यायमूर्ति पिनाकीचंद्र घोष ने कहा था कि “भारत में शरीयत आदालतों की तनिक भी कानूनी मान्यता नहीं है।” सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 12 मई 2015 को निर्देश दिया था कि विवाह के विषय पर एक संहिता रची जाए। इस खंडपीठ मे थे न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और एम. सप्रे। प्रधान न्यायाधीश वीएन खरे ने 2003 में (जान वल्लंत्तम बनाम भारत सरकार) कहा था कि संविधान की धारा 44 पर संसद ने अभी तक कानून नहीं बनाया गया। वर्तमान प्रधान न्यायधीश के स्वर्गीय पिता और तत्कालीन प्रधान न्यायधीश यशवंत वी. चंद्रचूड़ ने कहा था कि “समान संहिता से राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में तेजी आएगी।”
ऐसी जनवादी और प्रगतिशील समान संहिता से भारतीय मुसलमान आज तक वंचित रह गए जबकि कई इस्लामी देशों में विवाह और तलाक के कानून सही हैं जैसे मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्कीया, मिस्र, जॉर्डन, पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश।
यूं तो संसद में समान संहिता पर बिल विचाराधीन रहा है। (9 फरवरी 2020) में राज्यसभा में भाजपा सदस्य करोड़ीलाल मीणा ने अपना विधायक पेश किया था जो बहुमत से स्वीकार कर लिया गया था। तब इन मुस्लिम वोटार्थी दलों का सदन में कैसा रुख, क्या बयान था ? कांग्रेस, सपा, राजद, डीएमके और तमाम विपक्षी दलों ने विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की। विधेयक पेश करने का विरोध करने पर जब बहस गरमाई तो नेता सदन केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने पूछा कि इसे क्यों पेश नहीं किया जा सकता ? उन्होंने बिल पेश करने के विरोध पर एतराज जताया और कहा कि बिल पेश करना सदस्य का अधिकार है। बिल पेश करने का विरोध करते हुए सपा सांसद रामगोपाल यादव ने कहा कि सभी धर्मों की परंपरा अलग-अलग है। मुसलमान अपनी चचेरी बहन से शादी करना सबसे सही मानते हैं, क्या हिंदू ऐसा कर सकते हैं। इसीलिए सभी धर्मों की अलग-अलग परंपरा है।
आप इक्कीस्वी सदी में दसवीं सदी की बातें करना भी विफल है। अर्थहीन है। महा सुन्नी चिंतक और पुणे की मुस्लिम सत्यशोधक और भारतीय सेक्युलर सोसायटी मंडल के संस्थापक हमीद दलवाई की बात याद आती है। तब मुंबई में “टाइम्स ऑफ इंडिया” के रिपोर्टर के नाते मैं एक सभा में गया था। वहां डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ हमीद दलवाई थे। उन्हें इस मुस्लिम विचार की राय बड़ी स्पष्ट थी यदि भारत में रहना है तो मुसलमानों को गणतंत्रीय संविधान की धाराओं का पालन करना होगा। यदि वे आजादी के इतने वर्षों बाद भी ऐसा नहीं करते हैं। अगर वह अभी भी चार बीवी, तीन तलाक, हिलाला चाहते हैं तो दारुल इस्लाम में जा कर रहें। सेक्युलर भारत छोड़ दें। लीबिया, ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब के सुझाए थे। हमीद दलवाई ने तभी सुझाया था कि हिंदुस्तानी मुसलमानों को राम, शिव और कृष्ण की भूमियों (अयोध्या, काशी, मथुरा) को मूल वासियों को लौटा देना चाहिए।
उलेमाओं, दानीश्वरों, शायरों, जमातियों, अकीदतमादों, आलिमों, दानिशमंदों, मुल्लाओं, नमाजियों, फाजिल, मौलाना और मौलवियों को यहां तमिलनाडु की महिला सांसद बेगम नूरजहां रजाक की राज्यसभा में (13 अगस्त 1982) में दिए गए भाषण की चंद पंक्तियों का उल्लेख हो। इस अन्नाद्रमुक (जयललिता के नेतृत्व वाली) की नेता ने कहा था : “वक्त आ गया है जब मुस्लिम निजी कानून का सहारा हो। बहु विवाह की प्रथा खत्म हो। सभी धर्मों के अनुयायियों को कानूनन दूसरी बीवी रखने की मनाही हो। बेगम नूरजहां की मांग थी कि इंदिरा गांधी सरकार को मुस्लिम नारियों का शोषण बंद करना चाहिए। खासकर शादी, तलाक। ऐसा कानून सभी धर्मों पर लागू हो।”





