लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷देश के स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही पश्चिम भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर एक समाज सुधार आंदोलन भी चल रहा था। इस आंदोलन में उन दिनों दो नाम उभर कर आए थे। पहला, डा.भीमराव आंबेडकर और दूसरा केशव सीताराम ठाकरे। डा.भीमराव आंबेडकर बाद में संविधान सभा के अध्यक्ष बने और उन्हें लोग सम्मानपूर्वक ‘बाबासाहब’ कहकर पुकारने लगे। इसी प्रकार समाज सुधार से संबंधित अपने लेखों एवं प्रखर वक्तव्यों के कारण चर्चा में आए केशव सीताराम ठाकरे ‘प्रबोधनकार’ के नाम से विख्यात हुए।
बाबासाहब आंबेडकर के पुत्र यशवंतराव आंबेडकर एवं प्रबोधनकार ठाकरे के पुत्र बालासाहब ठाकरे हुए। यशवंतराव उर्फ ‘भैया साहेब’ तथा बालासाहब ठाकरे में बालासाहब ठाकरे अपना विशेष मुकाम बनाने में सफल रहे। उन्होंने शिवसेना की स्थापना तो की ही, अपनी साफगोई एवं खरी जुबान के कारण एक राज्य में रहते हुए भी राजनीतिक क्षेत्र में अपनी देशव्यापी धाक भी जमाने में कामयाब हुए। उन्होंने स्वयं महाराष्ट्र के बाहर गिने-चुने बार ही कदम रखा। लेकिन एकलव्य की भांति उन्हें गुरु और नेता मान अनेक राज्यों में लोगों ने अपने आप शिवसेना की स्थापना कर ली थी। भाजपा के साथ गठबंधन कर वह केंद्रीय राजनीति में भी अपनी भूमिका निभाते रहे।
अब बारी है दो यशस्वी बाबाओं के दो पोतों की। स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे की 97वीं जन्मतिथि पर बाबासाहब आंबेडकर के ज्येष्ठ पौत्र प्रकाश आंबेडकर की पार्टी से हाथ मिलाते हुए अपने दादाओं का जिक्र खुद उद्धव ठाकरे ने निकाला। वह प्रबोधनकार ठाकरे के पौत्र और बालासाहब ठाकरे के सबसे कनिष्ठ पुत्र हैं। उन्होंने कहा कि उनके और प्रकाश आंबेडकर के दादा समकालीन थे, और एक-दूसरे की सराहना करते थे। दोनों ने ही सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए काम किया। अब हम यह सुनिश्चित करने के लिए एकजुट हुए हैं कि लोकतंत्र बरकरार रहे। यह ‘नया रास्ता और नया रिश्ता’ है। उद्धव ने इस अवसर पर ‘शिव शक्ति – भीम शक्ति’ के एक होने की बात भी कही।
उद्धव ठाकरे का दलित नेता प्रकाश आंबेडकर से हाथ मिलाते हुए उनके और अपने पूर्वजों को याद करना प्रासंगिक हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र बचाने के नाम पर प्रकाश आंबेडकर के साथ राजनीतिक सफर तय करना और उसमें सफलता हासिल करना उनके लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि अपने यशस्वी दादाओं के पोते अपने जीवनकाल में आज तक तो ऐसा कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए हैं, जिनसे यह आभास हो कि वे अपने पूर्वजों की कीर्ति को और ऊंचाई पर ले जा सकेंगे। उद्धव ठाकरे जिस शिवशक्ति-भीमशक्ति के एक होने की बात कर रहे हैं, उसकी हवा तो उनके इस वक्तव्य के कुछ ही घंटों बाद उन्हीं की पार्टी के एक पूर्व नेता नारायण राणे ने निकाल दी। राणे ने इन दोनों शक्तियों के अस्तित्व पर ही सवाल उठाया दिया है। उनका कहना है कि जब चुनकर आए 56 में से 16 विधायक ही आपके पास बचे हैं, तो शिवशक्ति रही कहां ? यही नहीं, उन्होंने भीम शक्ति के अस्तित्व पर भी यह कहते हुए सवाल खड़ा किया कि आज तक प्रकाश आंबेडकर ने कितने दलितों का घर बसाने का काम किया है ?
राणे के ये सवाल प्रथमदृष्ट्या कड़वे लग सकते हैं। लेकिन इसकी सच्चाई की परख थोड़ा अतीत में जाकर की जा सकती है। यह तो सच है कि उद्धव ठाकरे अपने पिता बालासाहब ठाकरे द्वारा स्थापित एवं मजबूती के साथ आगे बढ़ाई शिवसेना को एकजुट नहीं रख सके। यहां तक कि उद्धव अपने पिता के विचारों के साथ भी खड़े नहीं रह सके। 2019 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद वह उन्हीं पार्टियों की गोद में जा बैठे, जिनका आजीवन विरोध बालासाहब ठाकरे करते रहे थे। इसी कारण से उनके विधायक और सांसद उनका साथ छोड़ गए। क्योंकि उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में आज भी उसी कांग्रेस और उसी राकांपा से लड़ना है, भाजपा से नहीं। अब स्थिति यह है कि उद्धव के पास अपने पिता की शिवसेना का चुनाव चिह्न भी नहीं बचा है। उसके लिए वह चुनाव आयोग के सामने संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं।
रही बात दूसरे पोते प्रकाश आंबेडकर की। तो वह तो अपने दादा की विरासत को कभी संभाल नहीं पाए। सच कहा जाए, तो खुद बाबासाहब आंबेडकर भी चुनावी राजनीति में कभी सफल नहीं रहे। 1952 का पहला लोकसभा चुनाव बाबासाहब आंबेडकर ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के बैनर से लड़ा था। उनकी मृत्यु के बाद तीन अक्तूबर, 1956 को रिपब्लिकन पार्टी का गठन किया गया। लेकिन जल्दी ही इसकी शाखाएं, उपशाखाएं और गुट निकलते चले गए। इसके नेता बी.सी.कांबले, बैरिस्टर खोब्रागड़े, दादा साहेब रूपवते और आर.डी.भंडारे अपनी-अपनी सुविधानुसार अपने मार्ग तलाशते गए। इन शाखाओं-उपशाखाओं में चुनाव के समय एकता का उबाल भी आता रहा। लेकिन कुछ समय बाद फिर अपनी ढपली – अपना राग का किस्सा चरितार्थ होने लगता।
महाराष्ट्र में ऐसी कई विधानसभा सीटें हैं, जहां दलित मतदाता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन अब तक तो दलित मतों का बिखराव ही देखने को मिलता रहा है। पिछले चार दशक की अपनी राजनीति में प्रकाश आंबेडकर भी बाबासाहब आंबेडकर की भारी-भरकम विरासत साथ होने के बावजूद दलित मतों या दलित नेताओं को एकजुट करना तो दूर, इसका प्रयास तक करते दिखाई नहीं दिए। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पार्टी वंचित बहुजन आघाड़ी का गठबंधन असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ किया था। इसका फायदा ओवैसी को मिला और वे शिवसेना को हराकर औरंगाबाद सीट जीत गए। ये बात संभवतः बालासाहब ठाकरे को कभी पसंद नहीं आती। कुछ माह पहले तक उद्धव ठाकरे जिन शरद पवार के साथ सरकार चलाते रहे, प्रकाश आंबेडकर उनके भी प्रखर आलोचक रहे हैं। ऐसे में प्रकाश आंबेडकर को साथ लेने के बाद किस वैचारिक आधार पर उद्धव ठाकरे की नई महाविकास आघाड़ी आगे बढ़ेगी, यह समझ से परे है।
साभार दैनिक जागरण

(लेखक दैनिक जागरण के महाराष्ट्र राज्य के ब्यूरो इन चीफ़ हैं)




