लेखक~मुकेश सेठ
फ़िल्म में नन्दिनी की भूमिका में अनिन्द्य सुन्दरी ऐश्वर्या राय नें अपने अभिनय के सम्मोहन से दर्षकों को बांध लिया तो आदित्य करिकालन की भूमिका में विक्रम नें जादू सा चलाया
♂÷फिल्मकार मणिरत्नम किसी परिचय के मुँहताज़ नही हैं सिने जगत में।
उन्होंने दक्षिण की भाषा व हिंदी में एक से बढ़कर एक अद्भुत फिल्में बनाई हैं जो कि दर्शकों के दिलों दिमाग़ में अमिट छाप छोड़ चुकी है।
पहले PS फिल्म के ज़रिए दर्शकों व दुनियाभर में ख़ूब तारीफ़ की अपने फ़िल्मांकन व कलाकारों से जीवन्त अभिनय कराकर तो अब एक बार पुनः बिग बजट की PS 2 लेकर दर्शकों के सम्मुख हाज़िर हैं ।
दर्शकों का इतना भर भर कर इस अद्भुत कथानक,फ़िल्मांकन,सम्वाद व उस चोल साम्राज्य के दौर को हूबहू उतार देने के साथ कलाकारों ने किरदार में डूबकर अभिनय किया कि मानो पर्दे पर चोल साम्राज्य का वक्त चल रहा हो।
तारीफ़ तो यह है सिनेमाहाल मे बड़ो के साथ बच्चे देखे जा रहे हैं। लोग अपने बच्चों को इस देश के एक हिस्से के गौरवपूर्ण इतिहास जो इतिहासकारों के द्वारा छिपा दिए गए थे उससे रूबरू कराना चाहते हैं । पता नहीं बच्चे फिल्म को, राजनैतिक छल-छद्मों को, भयंकर मार-पीट को, नागपत्तनम बौद्ध विहार की नीरव शान्ति को कितना समझ पाएंगे पर जितना भी समझेंगे अच्छा ही होगा ।
पूरी फिल्म देखने के बाद कह सकता हूँ कि यह फिल्म तो एक प्रेमकथा होनी चाहिए थी । आदित्य करिकालन और नंदिनी की प्रेमकथा ।
एश्वर्या राय अनिन्द्य सुन्दरी लगी हैं अपनी भूमिका में और एक मानिनी स्त्री जिसे अपने प्रेम के तिरस्कार का बदला लेना है । वही आदित्य करिकालन की भूमिका में विक्रम एक कठोर, निर्दयी और रुक्ष प्रकृति के राजकुमार लगते हैं जिसे हिमालय तक चोल साम्राज्य का विस्तार करना है ।
जब मैं यह कहता हूँ कि इस फिल्म एक ऐतिहासिक राजवंश की कथा सुनाने वाली फिल्म की जगह एक विशुद्ध प्रेमकथा वाली फिल्म होना था तो इसके पीछे के मेरे अपने तर्क है ।
नंदिनी जिसके प्रेम को चोल राजवंश महज इसलिए स्वीकार नहीं करता क्योंकि उसके कुल का पता नहीं है तो वह समूचे चोल वंश के निर्मूलन का संकल्प ले लेती है । उस चोल वंश के निर्मूलन का संकल्प जिसमे उसका प्रेमी आदित्य करिकालन भी है । कभी वह समय था जब आदित्य और नंदिनी के प्रेम की महक समूचे कावेरी घाटी को सुवासित करती थी और अब उसमे जगह ले ली है प्रेम के तिरस्कार से उपजे नफरत की दाह नें । मान,अपमान और नफरत की विषबेल कुछ ऐसी पनपी कि समूचे चोल वंश से लिपटकर उसे सुखा देना चाहती है । फिल्म के मध्यांतर के बाद का एक दृश्य है जिसमे नंदिनी और आदित्य करिकालन का आमना-सामना होता है । नंदिनी अपने संकल्पों में बंधी हुई है और उसे आदित्य को समाप्त करना है, आदित्य भी जीवन से प्रेम के चले जाने के बाद ऐसा विरक्त हो चला है कि उसे अब अपनी प्रेयसी के हाथों मरने में ही मुक्ति दिखती है । जब दोनों सामने होते हैं तो नफरत की दीवारे गिर जाती हैं । आँखे अश्रुपूरित होकर बीते दिनों को याद करने लगती हैं । एक-एक संवाद, एक-एक दृश्य आपको प्रेम में टूट जाने के गहरे मर्म समझाता है । आदित्य करिकालन जिसे दुनिया एक भयंकर और वीर योद्धा के तौर पर जानती है वह अन्दर से कितना टूटा हुआ है यह बस चंद मिनटों के दृश्यों में पता चल जाता है ।
यही तो होता है, अगर आदमी के जीवन से प्रेम गायब हो जाए तो एक अजीब सी शुष्कता भर जाती है,दुनिया बेमानी लगने लगती है और वह बेहिसाब धन-दौलत इकट्ठा करने के बाद भी चैन नहीं पाता है । प्रेम के एक-एक पल उसे बेतरह याद आते हैं चाहे वह युद्ध भूमि में हो या निर्जन वन में । क्रूर विक्रम के चेहरे के भाव देखकर एक दर्शक के तौर पर मै वाह-वाह करने लगा था । आदित्य करिकालन जब अपनी प्रेमिका से कहता है कि भुलाया नहीं जा सकता तो माफ़ तो किया ही जा सकता है ना ? तो वह सच में सबकुछ हारा हुआ लगता है । पश्चाताप करता हुआ वह कहता है कि तुमने एक ही चीज़ तो मांगी थी मैं वह भी ना दे सका और फिर अपनी जिन्दगी को नियति के भरोसे छोड़ देता है । यह दृश्य पूरे फिल्म की जान है और इसी दृश्य में आदित्य करिकालन भी मारा जाता है ।
बाकी जयम रवि और कार्थी सुरेश ने भी अपनी भूमिकाओं का अच्छा निर्वहन किया है । त्रिशा, चोल राजकुमारी के रूप में अच्छी लगती है । बौद्ध विहार, कावेरी के तट की सुन्दरता, चोलो और पांड्यो की शिवभक्ति मन मोहती है ।
फिल्म की कमियों की बात करें तो फिल्म में कई कहानियाँ एक साथ चलती हैं जिससे कई बार बहुत कुछ समझ में नहीं आता । अगर चोलों, पांड्यो, राष्ट्रकूटों का इतिहास नहीं पढ़ा है तो एकसाथ इतनी कहानियां जोड़कर समझने में काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है । फिल्म के क्लाइमेक्स में ही इतना दिखा दिया गया है जिसपर एक अलग से भी फिल्म बन सकती है, गाने भी कुछ खास अच्छे नहीं है जबकि सङ्गीत ऑस्कर प्राप्त संगीतकार अल्लाह रक्खा रहमान ने दिया है।
इतने के बाद भी मै कहूँगा कि फिल्म देखनी चाहिए,विश्वसुंदरी एश्वर्या राय और विक्रम के शानदार,जानदार अभिनय के लिए,दक्षिण के चोलों के राजनैतिक उत्थान को समझने के लिए मौका मिले तो देखिए जरुर।
आज दक्षिण की अधिकतर फिल्में सुपर डुपर हिट होकर देश दुनियां भर में पैसा बटोरने का साथ भारतीय सभ्यता,संस्कृति,गौरवपूर्ण इतिहास की राजदूत बनती जा रही हैं तो वहीं बॉलीवुड को यह मनन करने की आवश्यकता है कि आज के चालीस वर्ष पूर्व की फिल्में दुनियां भर में खासी लोकप्रिय होती थी,करोड़ो कमाती थी।हा हॉलीवुड भी बॉलीवुड के पीछे था।
फ़िर ऐसा क्या हुआ या क्या बनने लगा कि आज बॉलीवुड साऊथ की मूवी के सामने पासंग भर भी नही ठहर पा रहे हैं।
बॉलीवुड के दिग्गजों को यह सोचना पड़ेगा,वरना देर होनी शुरू हो चुकी है क्योंकि अब बॉलीवुड की बड़ी फिल्मों में भी साऊथ के कलाकारों को अपने साथ पर्दे पर दिखाने की मजबूरी बनती जा रही है लागत निकालने व फ़िल्म को हिट कराने के लिए।
÷लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं÷
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