लेखक~मुकेश सेठ
वर्ष 2006 में रिलीज़ फ़िल्म को लेकर दुनियांभर में ईसाइयों ने किया था जबरदस्त प्रदर्शन तो दुनियां के तमाम देशों ने किया बैन
125 मिलियन डॉलर की बिग बजट मूवी नें इतिहास रच 800 मिलियन डॉलर की भारी भरकम कमाई के साथ ही कई प्रतिष्ठित अवॉर्ड भी किये थे अपने नाम
♂÷दुनियां में कभी-कभी ऐसी भी पटकथा पर कुछ फिल्में बनती है कि वह अपने विषय को लेकर जहाँ कट्टरपंथी ताक़तों के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है तो ऐसी फ़िल्म बनाना पूरी टीम के लिए जैसे समाज व सरकार से युद्ध लड़ने के बराबर साबित हो जाता है।
क्योंकि ऐसी फिल्में उनके द्वारा बनाये गए तमाम भ्रांतियों को तोड़ती भी हैं और मजबूत चुनौती भी देती हैं।
ऐसी ही एक फ़िल्म वर्ष 2006 में 125 मिलियन डॉलर की भारी भरकम लागत से बनी”द विंसी कोड”।
इस फ़िल्म के बारे में कहा जा सकता है कि कुछ फिल्में केवल मनोरंजन भर के लिए नहीं होतीं,बल्कि वो इतिहास भी रचती हैं और दर्शकों के नजरिये में परिवर्तन भी ला देती हैं।

“द विंसी कोड” को बनाना किसी युद्ध के लड़ने से कम नहीं रहा, यह एक ऐसी फिल्म थी जो विश्व के सबसे ज्यादा माने जाने वाले धर्म की मान्यताओं को सीधे सीधे चुनौती दे रही थी।
इस बाबत काफ़ी बाद में एक इंटरव्यू में फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले कलाकार “टॉम हैंक्स” ने बताया कि फ़िल्म से जुड़े सभी लोग जानते थे कि यह फ़िल्म करने के बाद उन सब की मुश्किलें बढ़ सकती थीं पर बावजूद इसके वे सब इस विवादास्पद प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए तैयार हुए जो एक बड़ी बात थी। 125 मिलियन डॉलर की रकम दांव पर लगी थी , एक गलती और फ़िल्म से जुड़े सारे लोग सड़क पर आ जाते।
“द विंसी कोड” फ़िल्म के रिलीज के दौरान ऐसा होता हुआ दिख भी रहा था, जब एक के बाद एक ईसाई धर्म को मानने वाले देशों में इसके खिलाफ लोग सड़कों पर उतर कर जबरदस्त प्रदर्शन करने लगे थे और विभिन्न चर्चों ने इसका खुला विरोध शुरू कर दिया था।
हालांकि रिलीज के बाद पहले ही हफ्ते इसने लागत से ज्यादा कमाई की और दुनिया भर में लगभग 800 मिलियन डॉलर का कुल कारोबार किया।
ये फ़िल्म जहाँ अपनी कहानी के चलते जबरदस्त आलोचनाओं,प्रोटेस्ट के बावजूद भी सुपर हिट रही वहीँ काफी सारे प्रतिष्ठित अवार्ड्स भी इसने जीते।
2006 में रिलीज हुई यह फ़िल्म इसी नाम के एक नावेल पर आधारित थी और वह नावेल भी अपने समय में अच्छा खासा विवादित रहा था।
कारण: वही जो अक्सर होता है, जब भ्रांतियां टूटती हैं तो उसका असर काफी लंबे समय तक देखा जाता है।
हालांकि नावेल के लेखक डेन ब्राउन और फ़िल्म के निर्देशक रॉन हॉवर्ड ने कभी नहीं स्वीकारा कि यह फ़िल्म एकदम सत्य घटनाओं पर आधारित थी पर इसमें दिखाए गए समय, जगहों और व्यक्तियों के नामों के साथ साथ इतिहास में घटी घटनाओं का जिस सजीवता से वर्णन किया है उसे देख कर कोई भी कह सकता है कि हो न हो इसमें कुछ सच्चाई तो जरूर है।
“द विंसी कोड” फ़िल्म की कहानी शुरू होती है जब यूरोपीय देश फ्रांस के एक म्यूज़ियम में वहां के सरंक्षक की गोली मार कर हत्या कर दी जाती है, गोली लगने के बाद वह अपने शरीर पर एक आकृति बना देता है और हत्या के कुछ सुराग छोड़ कर मर जाता है।
पुलिस तफ़्तीश करती है तो एक प्रतीकविद्या के प्रोफेसर जो अमेरिका से फ्रांस किसी लेक्चर के लिए गया होता है उसका नाम सामने आता है। प्रोफेसर लैंगडन के क़िरदार में सुपरस्टार टॉम हॉक्स ने अपने जीवन्त व अविस्मरणीय अभिनय से फ़िल्म को कालजयी बना दिया है।
टॉम हॉक्स को म्यूज़ियम में लाश के ऊपर उकेरे प्रतीक को देखने के लिए बुलाया जाता है कि वहां उस मृत व्यक्ति की पोती जो कि पुलिस में अधिकारी है वह आती है और टॉम को वहां से भागने के लिए तैयार करती है,क्योंकि पुलिस के अधिकारी पहले से ही कुछ शक्तिशाली लोगों के निर्देशानुसार टॉम हॉक्स को ही हत्या का आरोपित साबित करने की तैयारी कर चुके होते हैं।
दोनों लोग कैसे वहां से निकलते हैं और उससे पहले किस तरह से वे लाश और म्यूज़ियम में से हत्या के सुराग ढूंढते हैं ये सब देखना अपने आप में रोमांच का अनुभव कराता है।
यहीं से रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी की शुरुआत होती है। प्रोफेसर और वह महिला पुलिस अधिकारी कैसे ईसाई रिलीज़न के मानने वालों के ईश्वर के बेटे जीसस के आखिरी वंशज तक पहुंचते है, और फिर अकेले प्रोफेसर फ़िल्म के अंतिम क्षणों में कैसे जीसस की पत्नी की कब्र खोज लेते हैं यह देखकर सिहरन पैदा करता है यह फ़िल्म।
पूरी फ़िल्म आपको अपने आप से बांध कर रखती है, कई जगह इतना थ्रिलर दिखता है कि दर्शक सोच भी नहीं पाता कि ऐसा भी हो सकता है।
कई मोड़ों पर लगता है कि यह फ़िल्म का अन्त है पर फिर एक नया सुराग हाथ लगता है और कहानी दूसरी और मूड जाती है।
प्रोफेसर के रोल में टॉम हैंक्स ने वाकई गजब काम किया है, उनका साथ देने के लिए महिला पुलिस अधिकारी के रूप में एक बेहद खूबसूरत फ्रेंच एक्ट्रेस ऑड्रे का भी अभिनय लाज़वाब,अद्भुत है।
फ़िल्म काफी देशों में वहाँ की सरकारोँ द्वारा लंबे समय तक प्रतिबंधित कर दी गयी थी पर इसे अब नेटफ्लिक्स पर देखा जा सकता हैं।
कहना ग़लत न होगा कि इस फ़िल्म नें अमेरिका, योरोप समेत उन तमाम देशों के द्वारा आये दिन दूसरे देशों को फ़्री स्पीच,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,वह क्या देखे क्या नही देखे,मानव के मूलभूत अधिकार,खुले दिल दिमाग़ से नए-नए विचारों को स्वीकार करने की आज़ादी जैसे उनके मनपसंद हथियार की कलई खोलकर रख दी थी जब फ़िल्म के प्रदर्शन को कौन कहे बगैर प्रदर्शित हुए ही कथित सभ्य,विकसित,अत्याधुनिक और बेहद अमीर देशों नें इसे बैन कर रखा था।

÷लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं÷
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