शब्दकार: हिमांशु मिश्र
एक पाती महबूब आलम बलरामपुर विधायक के नाम के नाम
पप्पू यादव अब कांग्रेस में हैं। पूर्णिया से चुनाव लड़ेंगे। खासबात यह है कि उन्हें वाम दलों का भी समर्थन मिलेगा,वाम दल मतलब भाकपा, माकपा, भाकपा माले, पुरानी घिसी—पिटी राजनीति होगी।
वाम दल सांप्रदायिक ताकतों से मुकाबला के नाम पर पप्पू यादव का समर्थन करेगी। वही पप्पू यादव जिन्होंने वाम दल के सबसे चर्चित और ईमानदार नेता अजित सरकार की हत्या की। इसी हत्या के मामले में सालों जेल में रहे। वैसे वाम दलों के साथ यह रोग बेहद पुराना है। इस पार्टी ने शहाबुद्दीन का भी समर्थन किया था, जिस पर वाम दल से ही जुड़े और जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर की हत्या का आरोप है। इनके परिजनों का पुराना साक्षात्कार देखें और सुनें, सालों पुरानी घटना के बावजूद आपका दिल दहल जाएगा। आप पूछेंगे कि वाम दलों के पतन का कारण क्या है? इन्हीं दो घटनाओं में आपको इसका जवाब मिल जाएगा। वैसे उदाहरण अनगिनत हैं। सवाल है कि क्या महबूब आलम यह घोषणा कर सकते हैं कि वह पप्पू यादव का समर्थन नहीं करेंगे? घोषणा तो दूर आप इन्हें चुनाव प्रचार में इनका झंडा उठाते देखेंगे। वामपंथ के नाम पर ऐसा दोगलापन तो इसे खत्म क्यों नहीं हो जाना चाहिए? वैसे मुझे यह सवाल पूछना ही नहीं चाहिए। वह इसलिए कि विधायक जी का भी अपना आपराधिक रिकॉर्ड है। हमारे क्षेत्र के इनके कार्यकर्ता पांचो वक्त का नमाज पढ़ते हैं, मगर इनकी पार्टी धर्म को अफीम मानती है।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। बिहार में और भी बहुत कुछ हुआ है। जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता और उनकी पार्टी नीतीश कुमार के विरोध में भाजपा के साथ आई। आरसीपी सिंह जैसे कई नेताओं ने पाला बदल किया। अब नीतीश कुमार भाजपा के आंखों के तारे हैं। इतने करीबी कि इन्होंने उपेंद्र, मांझी की अधिक सीटें झटकने की उम्मीद पर पानी फेर दिया। नीतीश के संदर्भ में इनकी टिप्पणी का वीडियो देखिये, फिर विचार करिए। वैसे भाजपा—जदयू के गठबंधन के बाद ये सवाल राजनीतिक तौर पर बेमानी हो गए हैं। चूंकि राजनीति है इसलिए भाजपा के खांचे में फिट बैठने वाले चिराग पासवान उनके चाचा पशुपति की जगह भाजपा के आंखों का तारा बने। वह चिराग आंखों का तारा बने, जिसे भाजपा ने दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर किया था। हालांकि यह मक्खी अब नीतीश जी को भी निगलनी पड़ रही है। उन नीतीशजी को जिन्होंने कभी पार्टी में बगावत के लिए पशुपति के कंधे पर हाथ रखा था।
मामला महज बिहार तक सीमित नहीं है। पंजाब में अकाली दल—भाजपा गठबंधन की सुगबुगाहट जो करीब करीब तय है, आंध्रप्रदेश में टीडीपी—भाजपा गठबंधन जो हो चुका है। इनके अतीत के पन्ने पलटें। सारी तस्वीर साफ हो जाएगी।
अहम सवाल है कि हम, आप और वह सियासी दलों की निगाह में बस वोट हैं। जब तक वोट रहेंगे, तब तक यह सिलसिला जारी रहेगा। वोट की जगह विचारवान बनिये। दल अपने आप सुधर जाएंगे। समस्या वोट बैंक बनने की है। वोट देते समय जिस दिन व्यक्ति बन जाएंगे, उसी दिन से हालात बदलने की शुरुआत होगी।
मुश्किल क्या है?
हम हत्यारे, दुष्कर्मी, भ्रष्ट लोगों को भी जाति का सहारा देते हैं।
किसानों को कुचलने वाला, लोगों की हत्या करने वाला, लूटखसोट करने वाला हमें अपराधी नजर नहीं आता। हमें इनमें अपनी जातीय स्वाभिमान और जातीय गौरव दिखता है।
मुसलमान की बस एक शर्त है, जो भाजपा को हराए वही उसका अपना है। मतलब अपनी पहचान, अपनी सोच कहीं है ही नहीं,सब गिरवी पर रख दिया है।
अन्य जातियां भी इसी आधार पर दुष्कर्मी, हत्यारे, भ्रष्ट लोगों का समर्थन करती है। इस इसलिए कि इसमें उन्हें जातीय गौरव नजर आता है।
इसके बाद कहेंगे कि सियासी दल हमें उल्लू बनाते हैं, हकीकत यह है कि हम उल्लू इसलिए बनते हैं कि हम उल्लू बने रहना चाहते हैं।

(लेखक अमर उजाला के नेशनल ब्यूरो इन चीफ़ के पद पर दिल्ली में कार्यरत हैं)




