लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट की उन उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है, जो वह पिछले 11 महीने से पाले बैठी थी। उद्धव गुट के लिए यह फैसला न उगलते बन रहा है, न निगलते। संविधान पीठ ने अपने फैसले में भले ही राज्यपाल पर कई तीखी टिप्पणियां की हों, उनकी भूमिका को कटघरे में खड़ा किया हो, मुख्य सचेतक की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हों, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के पांच सर्वोच्च न्यायमूर्तियों की वह पीठ भी उद्धव ठाकरे का कुछ भला नहीं कर सकी। उलटे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे एवं उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार को मुस्कुराने के कई कारण जरूर दे दिए हैं।
महाविकास आघाड़ी का एक प्रमुख घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी है। इसके नेता अजीत पवार और छगन भुजबल पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं, और अभी भी कह रहे हैं कि कोर्ट या विधानसभाध्यक्ष के निर्णय से शिंदे गुट के 16 या पूरे 40 विधायकों की सदस्यता रद्द भी हो जाए, तो भी वर्तमान सरकार की स्थिरता पर कोई असर नहीं पड़नेवाला है। वास्तव में संविधान पीठ के फैसले से एकनाथ शिंदे सरकार और मजबूत और स्थिर ही हुई है। संस्कृत की एक उक्ति है – आशानां मनुष्याणां काचिदाश्चर्य श्रृंखला, यया बद्धा प्रधावंती मुक्तास्तिष्ठन्ति पंगुवत्। अर्थात, आशा एक ऐसी आश्चर्यजनक प्रक्रिया है, जिससे बंधा हुआ व्यक्ति दौड़ने लगता है, और इससे मुक्त व्यक्ति सामान्यतः किसी अपाहिज की तरह एक ही स्थान पर जकड़ा हुआ पाया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से एकनाथ शिंदे सरकार में जगी उम्मीद के कारण निकट भविष्य में अब ऐसे ही परिवर्तन महाराष्ट्र में भी देखने को मिलेंगे। जून 2022 में तो महाविकास आघाड़ी की एक चलती हुई स्थिर सरकार थी। इसके बावजूद उस सरकार के 50 विधायक (इनमें 40 शिवसेना के और 10 निर्दलीय थे) सरकार का साथ छोड़कर सूरत और गुवाहाटी की यात्रा पर निकल गए थे। पूरी तरह अनिश्चित भविष्य सामने होने के बावजूद इन विधायकों ने तब उद्धव का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ जाना स्वीकार कर लिया था। अब तो शिंदे सरकार की स्थिरता पर मुहर लग गई है। इसका असर जल्दी ही नजर आएगा। न सिर्फ शिवसेना उद्धव गुट के बचे-खुचे विधायक, बल्कि कांग्रेस और राकांपा का भी बड़ा हिस्सा अगले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव तक अपने-अपने दलों से पलायन की स्थिति में आ जाए तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। निकट भविष्य में निचले स्तर के संगठन से लेकर संसद सदस्य तक बड़े पैमाने पर पलायन की श्रृंखला देखने को मिल सकती है।

पिछले साल शिंदे-फडणवीस सरकार के शपथग्रहण के बाद एक कामचलाऊ 20 सदस्यीय मंत्रिमंडल को ही शपथ दिलाई गई थी। तब से वही कामचलाऊ मंत्रिमंडल काम करता आ रहा है। अब शिंदे सरकार के विस्तार का रास्ता साफ हो गया है। महाराष्ट्र सरकार के मंत्रिमंडल में मंत्रियों की कुल संख्या 43 तक रखी जा सकती है। इसलिए शिंदे-फडणवीस जल्दी से जल्दी न सिर्फ अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे, बल्कि राज्य सरकार के निगमों – महामंडलों में नियुक्तियों का कोटा पूरा करेंगे। ताकि साथ आए निर्दलीय विधायकों एवं कार्यकर्ताओं को संतुष्ट कर भविष्य की राजनीति का रास्ता साफ किया जा सके। इसके अलावा आनेवाले कुछ ही महीनों में राज्य की 13 महानगरपालिकाओं सहित कई और नगर निगमों के चुनाव होने हैं। इनमें शिवसेना उद्धव गुट के लिए महत्त्वपूर्ण समझी जानेवाली मुंबई महानगरपालिका भी शामिल है। समझा जा रहा है कि अब शिंदे सरकार ये चुनाव जल्दी करवाने के लिए और गंभीर प्रयास करेगी। इतने बड़े पैमाने पर होनेवाले स्थानीय निकायों के चुनाव लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक मिनी चुनाव का आभास देंगे। यदि इन चुनावों में शिंदे गुट की शिवसेना और भाजपा मिलकर महाविकास आघाड़ी को टक्कर देने में सफल रहे, तो इसका सीधा असर लोकसभा और उसके छह माह बाद होनेवाले विधानसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। जाहिर है, भाजपा इसमें कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
शिंदे सरकार बनने के बाद से विकास के मोर्चे पर अभी कोई बड़ी उपलब्धि सामने नहीं आ सकी है। उलटे टाटा एयरबस एवं वेदांता फाक्सकान जैसी बड़ी कंपनियों के महाराष्ट्र से पलायन ने विपक्ष को ही बोलने का मौका दिया है। अब लोकसभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र में कई बड़ी योजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन की उम्मीद की जा रही है। ताकि डबल इंजन की सरकार के लाभ आम जनता को दिखाए जा सकें। इनमें मुंबई को नागपुर से जोड़नेवाला 701 किलोमीटर लंबा हिंदू हृदय सम्राट बालासाहब ठाकरे समृद्धि महामार्ग का पूरी तरह खोला जाना, मुंबई महानगर में कई मेट्रो लाइनों की शुरुआत, और मुंबई के कोस्टल रोड का एक हिस्सा शुरू होने अलावा कई और बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास भी शामिल होगा। राज्य और केंद्र सरकार की पूरी कोशिश रहेगी कि वह कोंकण की मेगा रिफाइनरी के लिए भी कोई ऐसा भूखंड खोज ले, जहां बिना स्थानीय विरोध के जल्दी काम शुरू किया जा सके। क्योंकि अभी इस रिफाइनरी के लिए उद्धव सरकार द्वारा प्रस्तावित भूखंड का विरोध तो खुद उद्ध की पार्टी ही करने लगी है।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का कोई सीधा लाभ भले उद्धव ठाकरे को न हुआ हो, लेकिन फैसले में राज्यपाल को लेकर की गई टिप्पणियों को भुनाने में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी का भी भावनात्मक दोहन शुरू कर दिया है कि यदि उन्होंने स्वयं त्यागपत्र नहीं दिया होता तो सर्वोच्च न्यायालय उन्हें पुनः मुख्यमंत्री के रूप में बहाल कर देता। उद्धव चाहेंगे कि महाराष्ट्र का मराठी मानुष इन मुद्दों पर उन्हें सहानुभूति की नजर से देखे। लेकिन ऐसी सहानुभूति तो उस समय उनके चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ भी थी, जब उन्होंने अपने ताऊ बालासाहब ठाकरे की उपेक्षा से त्रस्त होकर शिवसेना छोड़ी थी। लेकिन उद्धव की तुलना में अधिक भीड़ जुटाऊ नेता होने के बावजूद वह आज तक इस सहानुभूति का लाभ नहीं उठा सके। इसलिए जनता की सहानुभूति का कितना लाभ उद्धव ठाकरे उठा पाएंगे, इसका अनुमान लगा पाना अभी कठिन है।

÷लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र के ब्यूरो इन चीफ हैं÷
(लेख साभार दैनिक जागरण)




