लेखक: दर्शन सिंह
ऑपरेशन सिंदूर’ पर ट्रंप ने बोला ‘झूठ’, भारत ने दिया ‘करारा जवाब’!
दुनिया आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां किसी भी दिशा में उठाया गया कदम वैश्विक संतुलन को हिला सकता है। भारत, जो कभी ‘गुटनिरपेक्ष’ कहे जाने वाले रास्ते पर मजबूती से चलता था, अब उस दौर से कहीं आगे निकल चुका है।
21वीं सदी का भारत रणनीतिक रूप से सतर्क, सैन्य रूप से सशक्त और कूटनीतिक रूप से स्वतंत्र होकर अपनी शर्तों पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नया आकार दे रहा है।
लेकिन जब सामने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे आक्रामक, अप्रत्याशित और खुद को वैश्विक निर्णायक मानने वाले नेता हों, तब ये कूटनीतिक संतुलन नाजुक हो जाता है। ट्रंप का दूसरा कार्यकाल केवल अमेरिका की अंदरूनी राजनीति में हलचल नहीं ला रहा, बल्कि भारत जैसे साझेदार देशों को भी असहज कर रहा है। खासकर तब जब ट्रंप भारत को चीन और पाकिस्तान के साथ एक ही श्रेणी में रख कर टिप्पणी करते हैं, और ऑपरेशन सिंदूर जैसे निर्णायक सैन्य अभियानों का क्रेडिट भी खुद लेने लगते हैं।
रूस द्वारा RIC (रूस-भारत-चीन) समूह को फिर से ज़िंदा करने की पहल, वैश्विक राजनीति में एक ऐसा कदम है जिसे अमेरिका सीधे तौर पर ‘चीन समर्थक ध्रुवीकरण’ मानता है। लेकिन भारत के लिए यह केवल चीन या रूस से निकटता बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि एक बड़ी कूटनीतिक बिसात है, जिसमें वह अमेरिका की ‘मॉनोपॉली डिप्लोमेसी’ को खुली चुनौती देता दिख रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को बार-बार चेतावनी दी है कि वह रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की डील को रद्द करे, और चीन से दूरी बनाए। लेकिन भारत ने न केवल इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया बल्कि RIC जैसी बहुपक्षीय पहल में फिर से भागीदारी दिखाकर एक स्पष्ट संदेश दिया”हम किसी के दबाव में नहीं, अपनी रणनीति से चलेंगे।”
जब 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमला हुआ और भारत ने जवाबी कार्रवाई में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया, तो पूरी दुनिया ने भारत की निर्णायक सैन्य क्षमता को महसूस किया। पाकिस्तान की सीमा में घुसकर 100 से ज्यादा आतंकियों को खत्म करना न केवल रणनीतिक मास्टरी थी, बल्कि भारत के बदलते स्वरूप की झलक भी थी। लेकिन ट्रंप ने इस सैन्य सफलता पर पानी फेरने में देर नहीं लगाई। उन्होंने दावा किया कि अगर उन्होंने बीच में हस्तक्षेप न किया होता, तो भारत और पाकिस्तान के बीच ‘पूरी तरह युद्ध’ हो गया होता।
उन्होंने यहां तक कहा कि उन्होंने मोदी और शरीफ को फोन करके शांति के लिए मजबूर किया, व्यापार बंद करने की धमकी दी, और “दोनों लीडर्स को समझाया”। भारत ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया। लेकिन ट्रंप के इस रवैये ने एक बार फिर ये स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका भारत को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्वीकार करने में असहज है। ट्रंप के शब्दों में ‘India is a great friend’, लेकिन उनके बयानों में बार-बार ‘India must comply’ का भाव छिपा होता है।
ट्रंप ने हाल ही में BRICS और RIC जैसे मंचों पर भी तीखे हमले किए। उन्होंने साफ कहा कि अगर ये संगठन डॉलर को चुनौती देने की कोशिश करेंगे, तो उन्हें “टैरिफ की चटनी बना दी जाएगी।” भारत के लिए यह चेतावनी कम और धमकी ज्यादा थी। RIC और BRICS, दोनों मंच अमेरिका के वर्चस्व के खिलाफ वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्थाएं तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं। ये मंच विकासशील देशों को आवाज देते हैं, बहुपक्षीयता की वकालत करते हैं, और अमेरिका की एकतरफा नीतियों को चुनौती देते हैं। ऐसे में भारत का RIC में वापसी का फैसला वाशिंगटन की नींद उड़ाने के लिए काफी था।
पुतिन और मोदी के संबंध पुराने हैं। भारत-रूस के रिश्ते किसी एक दौर या सरकार के मोहताज नहीं रहे। ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर परमाणु पनडुब्बी तक, रूसी हथियारों ने भारत को हमेशा रणनीतिक मजबूती दी है। लेकिन इस बार RIC में चीन की मौजूदगी से सवाल उठते हैं-क्या भारत, चीन से सीमा तनाव खत्म होते ही एक मंच पर साथ बैठने को तैयार है? भारत की जवाबदेही है कि वह अमेरिका और क्वाड को भी साधे रखे और चीन के साथ भी एक डिप्लोमैटिक बैलेंस बनाए। इसलिए RIC का पुनर्जीवन, भले ही रूस की पहल हो, लेकिन भारत की अनुमति के बिना संभव नहीं था।
अमेरिका को डर है कि अगर भारत RIC में पूरी सक्रियता दिखाता है, और BRICS को डॉलर-विरोधी मंच बनाने में अहम भूमिका निभाता है, तो वह पश्चिमी ध्रुव से दूर चला जाएगा। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सैन्य सफलता, रूसी हथियारों की भूमिका, और चीन से तनाव के बाद भी कूटनीतिक संवाद की शुरुआत, यह सभी संकेत अमेरिका के लिए खतरनाक हैं। ट्रंप का भारत से यह कहना कि “तुम दोनों तरफ नहीं खेल सकते” एक अल्टीमेटम जैसा है। लेकिन भारत साफ कर चुका है वह ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की नीति पर चलता है, ‘या-तो-अमेरिका या-तो-रूस’ जैसी सोच पर नहीं।
ट्रंप की ‘क्लोज़-टू-इंसरजेंसी’ रणनीति
चुनाव जीतने के बाद ट्रंप ने अमेरिकी विदेश नीति को ‘इंसरजेंसी मोड’ में डाल दिया है। उन्होंने तुर्की से लेकर ईरान और भारत तक हर रणनीतिक साझेदार पर दबाव डाला है कि वे अमेरिका के नियमों पर चलें। लेकिन भारत ने इस नीति को खुलेआम चुनौती दी है। ट्रंप के लिए यह सबसे बड़ा झटका है कि जिस भारत को उन्होंने “व्हाइट हाउस में 10 लाख लोगों के साथ रैली करवाकर” अपने लिए ट्रॉफी बनाया था, वही भारत आज उनके ही हथियारों की डील को नजरअंदाज कर रूस से S-500 और ब्रह्मोस-2 जैसे हथियारों की चर्चा कर रहा है।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी, और ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने युद्ध रोका, पूरी तरह झूठा और अपमानजनक है। भारत न केवल अपनी सैन्य कार्रवाइयों का श्रेय खुद लेना चाहता है, बल्कि यह भी चाहता है कि अमेरिका जैसे देश उसकी संप्रभुता और निर्णयों का सम्मान करें। RIC में वापसी का फैसला सिर्फ कूटनीतिक संतुलन नहीं है, बल्कि एक बड़ा रणनीतिक संकेत है भारत अब ‘दबाव की राजनीति’ में यकीन नहीं करता, चाहे वह अमेरिका से हो या चीन से।
आज का भारत बदल चुका है। अब वह अमेरिका की ‘फेवर्ड नेशन’ बनने के लिए अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं से समझौता नहीं करता। ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति को और स्वतंत्र, और निर्णायक बनाया है। RIC की वापसी उसी का सबसे बड़ा प्रमाण है और यही कारण है कि वाशिंगटन अब भारत से नाराज़ है क्योंकि अब भारत न तो उसकी हाँ में हाँ मिलाता है, न ही उसकी बात पर चुप रहता है। “मोदी बोले- भारत दोस्ती चाहता है, गुलामी नहीं।
और ट्रंप सुन लें, ये 2025 है, 1947 नहीं!

(लेखक वैदेशिक मामलों के जानकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




