लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार के हाथ से शिवसेना पार्टी और उसका चुनाव चिह्न धनुष-बाण छिन जाना इस मराठीभाषी राज्य के लिए एक बड़ी घटना है। यह भले ही एक पार्टी के दो गुटों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का मामला हो, लेकिन ठाकरे परिवार के हाथों से पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न छिनने का दुख स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे के उन सभी चाहनेवालों को हुआ है, जो आज उद्धव के समर्थक नहीं भी हैं। यह विचारणीय विषय है कि शिवसेना ऐसी दुर्गति की स्थिति में क्यों और कैसे पहुंची ?
इसका सीधा उत्तर खोजें, तो पाएंगे कि आज वह शिवसेना रही ही नहीं, जिसका नेतृत्व करीब एक दशक पहले तक इसके संस्थापक बालासाहब ठाकरे करते आ रहे थे। वह बालासाहब ठाकरे की शिवसेना थी, जिसने खुद एक क्षेत्रीय दल होने के बावजूद भाजपा जैसे एक राष्ट्रीय दल से अपनी शर्तों पर गठबंधन किया और उसे करीब 25 साल तक निभाया भी। कभी भाजपा नेताओं को खरी-खोटी सुनाई तो कभी उन्हें गले भी लगाते रहे। लेकिन वह विचारों का महत्त्व समझते थे, इसलिए उन्होंने कभी वैचारिक पाला नहीं बदला।
बालासाहब महाराष्ट्र की सत्ता तो चाहते थे। वह हमेशा मंत्रालय पर भगवा फड़काने का नारा भी देते थे। लेकिन स्वयं कुर्सी पर बैठने का मोह उन्होंने कभी नहीं पाला। यही कारण था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके इशारों पर नाचती थी, और उनका ‘रिमोट कंट्रोल’ पूरे देश में मशहूर था। देश में रामजन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत के बाद बालासाहब ने देश की नब्ज पहचानी, और अपनी मराठी माणुस के नेता की छवि से ऊपर उठकर प्रखर हिंदुत्व का नारा बुलंद किया और पूरे देश के चहेते बन बैठे। यहां तक कि उस आंदोलन का सारा ढांचा खड़ा करनेवाली विश्व हिंदू परिषद और भाजपा पीछे रह गईं, और बाबरी ढांचा गिराने की जिम्मेदारी भी सीना ठोंककर बालासाहब ठाकरे ने ली। ये उनके व्यक्तित्व की खूबी थी कि वह अपनी कही बात से कभी पीछे नहीं हटते थे। और इसीलिए लोग उन्हें पसंद करते थे। बालासाहब ठाकरे की शिवसेना में उनकी अपनी टीम थी। उस टीम में मनोहर जोशी, सुधीर जोशी, सुभाष देसाई सरीखे कई परिपक्व नेता थे, जिन्होंने शिवसेना को गढ़ने में शुरुआत से ही बड़ी भूमिका निभाई थी। बालासाहब अपने इन्हीं रत्नों से विचार-विमर्श करते हुए आगे बढ़ते गए, और महाराष्ट्र की विधानसभा से लेकर लोकसभा और राज्यसभा तक अपने लोगों को पहुंचाते गए। खुद मातोश्री में रहकर ही वह बेताज बादशाह बने रहे।
अब आते हैं उनके पुत्र उद्धव ठाकरे पर। 2019 का विधानसभा चुनाव होने के बाद उद्धव ठाकरे ने जिस तरह से पाला बदला, उसकी कल्पना तो उनकी पार्टी के लोगों ने भी नहीं की थी। अपनी नासमझी भरी कार्यशैली से अपने ही पांच पर कुल्हाड़ी मारना तो क्या, वह तो खुद ही कुल्हाड़ी पर कूद गए लगते हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव से चंद दिनों पहले तक पूरी पार्टी भाजपा के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही थी। भाजपा के साथ मंच साझा कर रही थी। मंच पर एक ओर भाजपा का, तो दूसरी ओर शिवसेना का झंडा लग रहा था। एक बड़ी रैली में तो प्रधानमंत्री मोदी यह ऐलान कर रहे थे कि चुनाव बाद देवेंद्र फडणवीस को फिर से मुख्यमंत्री बनाना है, और उसी मंच पर बैठे उद्धव ठाकरे मुस्कुराते हुए प्रधानमंत्री की बात का समर्थन करते दिखाई दे रहे थे। लेकिन कुछ दिनों बाद जैसे ही चुनाव परिणाम घोषित हुए, वही उद्धव ठाकरे कभी शरद पवार तो कभी कांग्रेस के नेताओं के साथ बैठकें करते दिखाई देने लगे। क्योंकि अब उन्हें भाजपा के साथ नहीं बैठना था। उन्हें खुद मुख्यमंत्री बनना था। इसके लिए उन्होंने वैचारिक पाला भी बदल लिया। वह भाजपा से 30
साल पुराना गठबंधन तोड़ उसी कांग्रेस और राकांपा के पाले में जा बैठे, जिनसे उनके पिता बालासाहब ठाकरे आजीवन लड़ते रहे। इन दोनों दलों के साथ शिवसेना का कोई वैचारिक मेल कभी था ही नहीं। सत्ता में साथ आने के बाद भी नहीं रहा। महाविकास आघाड़ी के सरकार में रहते हुए भी कई बार कांग्रेस और राकांपा नेताओं ने उन्हीं सावरकर को भला-बुरा कहा, जिन्हें उनके पिता हमेशा आदर्श मानते रहे। उद्धव की ही सरकार के दौरान मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का वह अनुच्छेद 370 हटा दिया, जिसे हटाए जाने की मांग बालासाहब आजीवन करते रहे। लेकिन कांग्रेस और राकांपा के साथ रहने के कारण उद्धव ठाकरे केंद्र के इस कार्य की प्रशंसा भी खुलकर नहीं कर पाए। क्योंकि उनके राजनीतिक सहयोगियों को बुरा लग सकता था।
गलतफहमियां पालने में भी उद्धव का कोई जवाब नहीं रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब पहली बार शिवसेना 18 सीटें जीतकर अपने अभूतपूर्व स्कोर पर पहुंची, तो उसे लगने लगा कि यह सब उसकी अपनी मेहनत और शोहरत का नतीजा है। जबकि उस समय पूरा देश इसका श्रेय मोदी लहर को दे रहा था। लेकिन शिवसेना और उसके नेताओं ने ठीक उसी समय भाजपा से अपने संबंध खराब करने शुरू कर दिए। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेता अमित शाह को अफजल खान तक कहकर अपमानित किया गया। अपनी गलतफहमी में ही शिवसेना ने छह माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन भी तोड़ लिया। इसका नुकसान भी शिवसेना को ही उठाना पड़ा। वह सभी 288 सीटों पर लड़कर भी 63 सीट पर सिमट गई, और भाजपा उससे लगभग दोगुनी सीटें जीतने में सफल रही। 2019 के विधानसभा चुनाव में तो शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद 56 सीट से आगे नहीं जा सकी। जबकि भाजपा इस बार भी उससे दोगुने पर रही। फिर भी उद्धव ने अपनी असल ताकत का अनुमान लगाकर अपनी पुरानी सहयोगी और अपने मूलभूत विचारों का साथ देने के बजाय परंपरागत विरोधियों की गोद में जा बैठना उचित समझा। यही नहीं, उन्होंने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी कभी सम्मान देना जरूरी नहीं समझा। इस बात की शिकायत बगावत करनेवाले एकनाथ शिंदे सहित सभी विधायक करते रहे हैं। ऐसा करके उन्होंने अपना ही घर कमजोर कर लिया। आज इसी का नुकसान उन्हें उठाना पड़ रहा है, और पार्टी उनके हाथ से निकलती प्रतीत हो रही है।

÷लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र के ब्यूरो इन चीफ हैं÷
(लेख साभार दैनिक जागरण)




